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फ़ितने के समय आम इंसानों और उलमा की ज़िम्मेदारी

फ़ितनों और बिदअतों के ज़ाहिर होने के समय आलिम को मैदान में उतरना चाहिए, अगर ख़ामोश रहा तो वह इब्ने लबून नहीं बल्कि लानत का हक़दार होगा, इसलिए जो भी ऐसे मौक़ों पर यह सोच कर ख़ामोश बैठे हैं कि हम इब्ने लबून हैं तो याद रखें कि वह इब्ने लबून नहीं बल्कि पैग़म्बर स.अ. के फ़रमान के मुताबिक़ लातन के हक़दार हैं।

विलायत पोर्टलः इमाम अली अ.स. फ़ितनों के नुक़सान बताते हुए फ़रमाते हैं कि, फ़ितनों में दीन की बुनियादें सुस्त हो जाती हैं, ईमान के सुतून कमज़ोर हो जाते हैं, हक़ीक़त और ख़ुराफ़ात आपस में घुल मिल जाते हैं, ज़ुल्मत और अंधेरों से निकलने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, हिदायत के चिराग़ बुझ जाते हैं और बसीरत का नूर ख़त्म हो जाता है, ख़ुदा की मासियत और ना फ़रमानी आम हो जाती है, ख़ुदा के दीन का विरोध ज़ोर पकड़ लेता है, शैतान की इताअत आम बात हो जाती है, समाज में इलाही और इंसानी वैल्यूज़ की बुनियादें गिर जाती हैं, दीनी वैल्यूज़ और ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया जाता है, दीनी तालीमात को अनदेखा किया जाता है, लोगों की हालत बे लगाम जानवरों के झुंड जैसी हो जाती है, शैतानी हरकतें बढ़ जाती हैं, समाज से सुकून और चैन ख़त्म हो जाता है, ग़म और दुख का साया समाज पर छा जाता है, और उस समाज जहां फ़ितने के बादल मंडलाने लगें वहां उलमा किनारे बैठ जाते हैं और उनके मुंह पर लगाम लग जाती है, जाहिल आज़ाद रहते हैं और उनकी ज़ुबानें तेज़ी से चलती हैं, इसका मतलब यह है कि जिस समाज में फ़ितने फैलने रहे हों और वहां उलमा उन मसाएल और उन विषय पर ख़्यालात का इज़हार न करते हुए ख़ामोश रहते हैं और नादान और जाहिल लोग अपनी राय देना शुरू कर देते हैं, और इसका मतलब यह भी हो सकता है कि ऐसे हालात में लोग उलमा से हक़ीक़त को पूछने के बजाए जाहिलों से पूछते हैं।

 सबसे पहला क़दम फ़ितनों को पहचानने का है और यही सबसे सख़्त और मुश्किल क़दम है, क्योंकि शुरुआत के समय फ़ितना पहचान में नहीं आता जैसाकि इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि फ़ितने जब आते हैं तो लोगों को शक में डाल देते हैं, यानी लोग उन्हें आसानी से समझ नहीं समझ सकते और इसी वजह से कभी कभी फ़ितनों का ख़ुद खड़े हो कर स्वागत भी करते हैं और न समझने की वजह से उनका हिस्सा बन जाते हैं।

फ़ितनों की पैदाइश की वजह

फ़ितने पैदा होने की शुरुआत वह नफ़्सानी ख़्वाहिशें होती हैं जिसकी पैरवी की जाती है और अल्लाह का किताब के ख़िलाफ़ गढ़े हुए अहकाम और बिदअतें होती हैं, बिदअतों के प्रचार के लिए कुछ लोग दूसरों के साथी बन जाते हैं और अल्लाह के दीन से अलग हो जाते हैं, अगर बातिल में हक़ की मिलावट न होती तो हक़ अपने तलबगार के लिए छिपा न होता और अगर हक़ में बातिल की मिलावट न होती तो हक़ के साथ दुश्मनी रखने वालों की ज़ुबानें बंद हो जाती, लेकिन होता यह है कि कुछ इधर से लिया जाता है और कुछ उधर से और दोनों को मिला दिया जाता है, ऐसे मौक़े पर शैतान अपने साथियों और दोस्तों पर हावी हो जाता है और ऐसी सूरत में वही लोग नजात पा सकते हैं जिन्हें अल्लाह की तरफ़ से तौफ़ीक़ और इनायत पहले से हासिल होती है। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुतबा 50)

नफ़्सानी ख़्वाहिशें

इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि फ़ितनों की शुरुआत नफ़्सानी ख़्वाहिशों से होता है, नफ़्सानी ख़्वाहिश पैदा होने वाले उन दिली रुजहान को कहा जाता है जो नफ़्से अम्मारह की वजह से इंसान में पैदा होते हैं और हमेशा अल्लाह के हुक्म और अक़्ल के ख़िलाफ़ होते हैं, जैसे दुनिया की ख़्वाहिश, माल व दौलत की ख़्वाहिश, पोस्ट और पद की ख़्वाहिश, शारीरिक संबंध की ख़्वाहिश और स्वार्थी वग़ैरह होना।

जिसकी तरबियत न हुई हो जब उस इंसान में ख़्वाहिश हद से ज़्यादा उभर आती हैं तो वह उन्हें पूरा करने के लिए हर वसीले का सहारा लेता है, लोगों के दिल और दिमाग़ में शक पैदा कर के उनके दिल और दिमाग़ को परेशानी में डाल देता है, दूरियां पैदा कर के अपनी मुराद को हासिल करता है, लड़ाई झगड़े द्वारा पद तक पहुंचता है, अपनी शोहरत की ख़ातिर हक़ को बातिल से मिला देता है।

बिदअतें

दूसरी वजह जिससे फ़ितने पैदा होता हैं बिदअतें हैं, ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए ख़्वाहिश परस्त हर क़दम उठा सकता है यहां तक कि अगर उसे दीन में बिदअत भी ईजाद करनी पड़े तो वह संकोच नहीं करता, फ़ितने का माहौल ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए सबसे मुनासिब होता है, बिदअत फैलाने वाला न केवल नए अहकाम गढ़ लेता है बल्कि नए मज़हब भी बना लेता है, हर वह चीज़ जो दीन का हिस्सा न हो और समाज की ज़रूरत न हो वह बिदअत है, नए टोले बनाना, ग़ैर ज़रूरी सेंटर खोलना, नई फ़िक्र को फैलाना यहां तक कि अगर मस्जिदे ज़ेरार भी बनाना पड़ जाए तो वह बना लेते हैं, हर वह काम जिसके द्वारा अल्लाह के हुक्म का विरोध हो उसका अंजाम देना बिदअत है।

फ़ितनों में साथ देना

इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि इस काम में फ़ितने की फ़िराक़ में रहने वाले एक दूसरे की मदद भी करते हैं, बिदअतों और फ़ितनों को फैलाने के लिए एक दूसरे की मदद करना उनका काम होता है बल्कि मौजूदा दौर में फ़ितने खड़े करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोग एक दूसरे के कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाते हैं, एक देश या गिरोह फ़ितने का नक़्शा प्लान बनाते हैं, दूसरा माली मदद करता है, तीसरा अपनी इलाक़ा (प्लेटफ़ार्म) हवाले करता है और चौथा टेक्निक द्वारा मदद करता है।

बातिल में हक़ की मिलावट

इमाम फ़रमाते हैं कि अगर बातिल एकदम शुद्ध और ख़ालिस हो तो कभी फ़ितना हो ही नहीं सकता क्योंकि हक़ की पैरवी करने वाले तुरंत बातिल को पहचान लेते हैं और उसे बे नक़ाब कर देते हैं, इसलिए बातिल को हक़ के साथ मिलाया जाता है या बातिल को हक़ से सजाया जाता है जिस से वह दिखने में हक़ जैसा दिखने लगता है और हक़ की पैरवी करने वाले धोखा खा जाते हैं, कभी ख़ालिस बातिल के द्वारा फ़ितना खड़ा नहीं किया जा सकता बल्कि जब भी फ़ितने की साज़िश रची जाती है तो थोड़ा सा हक़ और थोड़ा सा बातिल मिला कर फ़ितना खड़ा किया जाता है।

शैतान की पैरवी

फ़ितनों की पैदाइश की एक वजह शैतान की पैरवी है, जो शख़्स नफ़्सानी ख़्वाहिशों का क़ैदी बन जाए वह यक़ीनन शैतान की पैरवी करने वाला बन जाता है और शैतान नफ़्स की पैरवी करने वालों का बेहतरीन रहबर और राहनुमा है, वह ऐसे लोगों को फ़ितने के मशविरे देता है, रास्ते दिखाता है, फ़ितनों के ज़रियों का बंदोबस्त करता है और साथी का भी इंतेज़ाम करता है।

कट्टरता

फ़ितनों के पैदा होने का एक अहम कारण कट्टरता है, कट्टरता का मतलब किसी चीज़ के गहरा संबंध होना और उसके लिए ग़ैर माक़ूल और उसका तर्कहीन समर्थन करना, जैसे राष्ट्रीय कट्टरता, मज़हबी कट्टरता, इलाक़ाई (क्षेत्रीय) कट्टरता, ज़बान को लेकर कट्टरता दिखाना, नस्लीय कट्टरता वग़ैरह, कट्टरता के माहौल में फ़ितना खड़ा करना बहुत आसान हो जाता है, जिस समाज के लोगों के अंदर जाहिलाना कट्टरता हो वहां फ़ितना खड़ा करना बहुत आसान हो जाता है, जिस चीज़ को लेकर भी लोगों में कट्टरता हो उसी को विषय बना कर कुछ अफ़वाहों से फ़ितना खड़ा किया जा सकता है बल्कि कट्टरपंथी क़ौमों में फ़ितना फैलाने के लिए फ़ितना फैलाने वालों को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती, केवल कट्टरता के ईंधन को चिंगारी दिखाने की ज़रूरत होती है बाक़ी काम कट्टरपंथी ख़ुद अंजाम देते हैं, कट्टरता चूंकि इंसानों को अंधा और बहरा बना देती है और फ़ितना खड़ा करने और फैलाने वालों को ऐसे ही इंसानों की ज़रूरत होती है, इसीलिए कट्टरता ऐसे समर्थन को कहते हैं जिसमें इंसान अंधेपन के साथ हर चीज़ को बल्कि हक़ को भी क़ुर्बान कर देता है।

ग़फ़लत और जल्दबाज़ी

फ़ितनों की पैदाइश में ग़फ़लत का भी अहम रोल है, कुछ इंसान किसी हक़ से ग़फ़लत या किसी विषय से ग़फ़लत की वजह से फ़ितना खड़ा कर देते हैं या किसी फ़ितने का हिस्सा बन जाते हैं, इसी तरह जल्दबाज़ी भी फ़ितना खड़ा करने में काफ़ी हद तक असर रखती है, इसी लिए रिवायतों में है कि जल्दबाज़ी शैतानी अमल है, इसका मतलब यह है कि इंसान बिना सोंचे समझे, बिना हालात और माहौल को परखे किसी भी तरह का क़दम उठाना, और याद रखिए अधिकतर देखा गया है कि ऐसे उठाए जाने वाले क़दम का अंजाम फ़ितनों ही का कारण बनते हैं, क़ुर्आन ने भी इंसानों की इस कमज़ोरी की तरफ़ इशारा किया है इरशाद होता है व कानल इंसानो अजूला।

फ़ितने के समय अहम रोल

फ़ितनों के अंदर अनेक तरह के लोगों का अलग अलग किरदार होता है, कुछ लोग फ़ितनों की बुनियाद रखने वाले होते हैं, कुछ लोग फ़ितनों में मददगार का रोल अदा करते हैं, कुछ लोग फ़ितने की आग भड़काने के लिए चिंगारी का रोल निभाते हैं, कुछ लोग ईंधन का काम करते हैं, कुछ उसकी लपटों को और ख़तरनाक बनाने के लिए हवा देते हैं और कुछ लोग फ़ितने को जानलेवा बनाने के लिए उस पर तेल छिड़कते हैं।

फ़ितने की सवारी

इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि तुम फ़ितने की बुनियाद रखने वाले मत बनो और फ़ितनों का हिस्सा भी मत बनो, इंसान दो तरह से किसी फ़ितने का हिस्सा बन सकता है या उसे अपने कंधे पर बिठा कर सवारी दे या उसे दूध पिलाए, सवारी देने का मतलब यह है कि तुम्हारे कंधों पर फ़ितना सवार न होने पाए यानी तुम उसका सहारा मत बनो, तुम्हारा सहारा लेकर फ़ितना फैलाने वाला फ़ितना और फ़साद न फैलाए, कुछ लोगों का फ़ितनों में रोल इस तरह होता है कि अगर वह किनारे हो जाएं तो फ़ितना ख़ुद ब ख़ुद ख़ामोश हो जाता है उसमे आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं होती, जो फ़ितनों को अपने कंधों पर लाद कर इधर उधर घुमाते हैं उनकी मिसाल उस गधे के जैसी है जिसे अपनी पीठ पर लदे हुए सामान का पता ही नहीं होता।

कुछ लोग फ़ितनों को दूध पिलाने में बिज़ी होते हैं और अपने ख़्यालों की दुनिया में सोंचते हैं कि बहुत बड़ी ख़िदमत अंजाम दे रहे हैं, फ़ितने को जानवर की तरह पनपने के लिए खान पान की ज़रूरत होती है अगर खान पान समय समय पर उसे मिलता रहे तो वह आगे बढ़ता रहता है और अगर बंद हो जाए तो अपनी मौत आप मर जाता है।

फ़ितने के तमाशाई

कुछ लोग फ़ितनों के समय ख़ामोश तमाशाई बन जाते हैं और पूरी तरह ख़ुद को उससे अलग समझते हैं, उनके ख़्याल में इब्ने लबून (ऊंट का दूध पीता 2 साल का बच्चा, जिसे इमाम अली अ.स. ने अपनी हदीस में बयान किया है कि फ़ितने के समय इब्ने लबून बन जाओ कि न पीठ इस क़ाबिल है कि कोई सवारी कर सके न थन इस क़ाबिल हैं कि कोई दूध निकाल सके) का यही मतलब है कि फ़ितने के समय अलग हट कर ख़ामोश बैठ जाओ, जबकि यह ग़लत विचार हैं, इब्ने लबून का मतलब फ़ितने के समय तमाशाई बन कर बैठना नहीं है बल्कि इसका मतलब यह है कि फ़ितने के समय न आप फ़ितने की सवारी बनें और न ही दूध पिलाएं।

इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि फ़ितने की बुनियाद रखने वाले मत बनो और ना ही उनके मददगार बनो, फ़ितने के फैलाने वाले मत बनो और ना ही उसके हिस्सेदार बनो, और ख़ामोश तमाशाई बनने के बजाए लोगों को बेदार करो, उन्हें मामले की हक़ीक़त बताओ, यानी लोगों को बताओ कि यह फ़ितना है और इसका हिस्सा बनने से परहेज़ करो, चूंकि फ़ितना नफ़्सानी ख़्वाहिशों और बिदअतों की मदद से फैलता है इसलिए पैग़म्बर स.अ. का हुक्म यह है कि जब बिदअतें ज़ाहिर हों तो आलिम को अपना इल्म ज़ाहिर करना चाहिए वरना उस पर अल्लाह की लानत है। اذا ظھر البدع فعلی العالم ان یظھر علمہ والا فعلیہ لعنة اللّہ

फ़ितनों के समय आलिम का किरदार

फ़ितनों और बिदअतों के ज़ाहिर होने के समय आलिम को मैदान में उतरना चाहिए, अगर ख़ामोश रहा तो वह इब्ने लबून नहीं बल्कि लानत का हक़दार होगा, इसलिए जो भी ऐसे मौक़ों पर यह सोच कर ख़ामोश बैठे हैं कि हम इब्ने लबून हैं तो याद रखें कि वह इब्ने लबून नहीं बल्कि पैग़म्बर स.अ. के फ़रमान के मुताबिक़ लातन के हक़दार हैं।

हदीस में इल्म ज़ाहिर करने का यह मतलब नहीं है कि आलिम डींगे मारना शुरू कर दे, मुनाज़िरे करना शुरू कर दे और फ़तवे ठोकता रहे और जिस किसी को जो उसके मुंह में आए बोल दे, क्योंकि ऐसा करना इल्म का इज़हार नहीं बल्कि फ़ितनों को दूध पिलाना है, आलिम की ज़िम्मेदारी यह है कि लोगों को फ़ितने की हक़ीक़त से आगाह करे, फ़ितने के पीछे क्या वजह है लोगों को बताए, फ़ितने का हिस्सा बनने से लोगों को रोके, फ़ितने के नतीजे को लोगों को बताए, जैसाकि इमाम अली अ.स. ने ऐसा ही किया कि फ़ितनों के मौक़े पर ख़ामोश नहीं बैठे बल्कि लोगों को बताते रहे और ख़बरदार करते रहे और फ़ितने से होने वाले नुक़सान को लोगों तक पहुंचाते रहे, फ़ितने के पीछे की साज़िश को बताते रहे, फ़ितने के कारण बताते रहे, फ़ितने का हिस्सा बनने से लोगों को रोकते रहे, यहां तक कि आप भविष्य में होने वाले फ़ितनों की तरफ़ भी लोगों का ध्यान दिलाते रहे, आप लोगों को यह भी बताते रहे कि फ़ितनों के समय किन चीज़ों से परहेज़ करें और किन चीज़ों का सहारा लें, आप फ़रमाते हैं


 ایہاالناس! شقوا امواج الفتن بسفن النجاة، وعرجوا عن طریق المنافرة ،وضعواتیجان المفاخرة، افلح من نھض بجناح او استسلم فاراح (خطبہ ،٥)

ऐ लोगों, फ़ितनों की मौजों को नजात की कश्तियों द्वारा चीर कर बाहर निकलो, ग़ुरूर और घमंड के ताज सरों से उतार फेको, कामयाब वह है जो उठे तो परों के साथ वरना मामलात दूसरों के हवाले कर के किनारे बैठ जाए।

इमाम अली अ.स. ने फ़ितनों के बारे में लोगों की मालूमात बढ़ाते हुए यहां तक कि उन चेहरों को भी बे नक़ाब किया है जो फ़ितना फैलाने वाले हैं, बनी उमय्या का नाम ले कर फ़रमाया कि इनसे बचो वरना बर्बाद कर देने वाले फ़ितनों में फंस जाओगे।

हम सभी इमाम अली अ.स. और अहलेबैत अ.स. के मानने वालों पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि हक़ को पहचानने में ज़रा अक़्ल का इस्तेमाल करें क्योंकि ऊपर कहा गया कि अहले दुनिया हमेशा बातिल को हक़ के साथ मिला कर पेश करते हैं इसलिए कोई भी मुद्दा कोई भी मामला सामने आए तो बिना तहक़ीक़ किए हुए किसी पर आरोप लगाने या किसी के ख़िलाफ़ फ़तवा देने से पहले उसके बारे में जानकारी हासिल करें, और याद रखें कट्टरता किसी नतीजे का हल नहीं है इसलिए जो काम अक़्ल कर सकती है वह कट्टरता नहीं कर सकती, और अगर चाहते हैं कि सामज में सुधार पैदा हो तो ख़ुद भी हक़ को पहचानने से पहले फैसला न करें और लोगों को भी हक़ पहचानने और उसके बाद फैसला करने को कहें, और फ़ितने के समय चुप्पी साधने वाले भी ध्यान रखें कि उन्हें लोगों को बेदार कर के हक़ीक़त तक पहुंचाना है या पैग़म्बर स.अ. की हदीस के मुताबिक़ लानत का हक़दार बनना है।


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