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पैग़म्बर स.अ. के मज़ार की ज़ियारत शिर्क और मुसलमानों का कत्लेआम इबादत!!

क़ब्रों की ज़ियारत बहुत सारे मुसलमानों विशेष कर शिया मुसलमानों का हमेशा से अक़ीदा रहा है, इसी वजह से वह हमेशा से वह वहाबी टोले की ओर से किए जाने वाले हमलों का शिकार रहे हैं।

विलायत पोर्टलः  वहाबी टोले के सामने आने से पहले मुसलमानों का क़त्लेआम न सीरिया, न इराक़ और न ही यमन में था, शिया या सुन्नियों से यह सवाल पूछने के बजाए कि वह पैग़म्बर स.अ. के मज़ार की ज़ियारत और उसका सम्मान क्यों करते हैं वहाबियों से पूछा जाना चाहिए कि वह किस जुर्म में मुसलमानों का क़त्लेआम कर रहे हैं।

क़ब्रों की ज़ियारत बहुत सारे मुसलमानों विशेष कर शिया मुसलमानों का हमेशा से अक़ीदा रहा है, इसी वजह से वह हमेशा से वह वहाबी टोले की ओर से किए जाने वाले हमलों का शिकार रहे हैं।

हम इस लेख में हुज्जतुल इस्लाम मोहम्मद मोहसिन मुरव्वजी तबसी से पूछे गए सवालों और उनके द्वारा दिए गए जवाबों को पेश कर रहे हैं।

सवाल: वहाबियों द्वारा हमेशा से अनेक इस्लामी अक़ाएद पर शिर्क और कुफ़्र के फ़तवों को नज़र में रखते हुए, क़ब्रों की ज़ियारत और उसके सम्मान को लेकर यह तकफ़ीरी टोला किन किन आरोपों को शिया फ़िर्क़े पर लगाता है?

जवाब: सब से पहले मैं यह बताना चाहता हूं कि ज़ियारत एक ऐसा विषय है जिस पर शिया और सुन्नी दोनों फ़िर्क़े अक़ीदा रखते हैं, और इस बारे में अहले सुन्नत की किताबों में हदीसें भी मौजूद हैं, और हम देखते भी हैं कि सुन्नी अपने बुज़ुर्गों की क़ब्र जैसे जन्नतुल बक़ी, पैग़म्बर के मज़ार और काबे की ज़ियारत करते हुए उसका सम्मान करते हैं, इसलिए ज़ियारत करना और सम्मान देना यह केवल शियों से विशेष नहीं है कि कोई यह सोंचे कि शियों ने वहाबियों को यह आरोप लगाने का मौक़ा दिया।

इस मामले में वहाबियों ने दूसरे और बहुत से मामलों की तरह ग़लत मतलब निकालते हुए यह बे बुनियाद आरोप लगाए हैं, उनका मानना है कि हर काम अल्लाह ही करता है, उनका अक़ीदा है कि राज़िक़ होना, शफ़ाअत और तवस्सुल जैसे काम ख़ास केवल अल्लाह के लिए हैं, उसने किसी दूसरे के हवाले नहीं किए हैं, लेकिन शिया और RATIONALIST सुन्नियों का यह अक़ीदा है कि अल्लाह इन सारी चीज़ों को पाक रूह और पवित्र आत्मा रखने वालों को देता है।

ज़ियारत का यह मतलब है कि मुसलमान, अल्लाह के नेक और ख़ास बंदों की क़ब्र पर जा कर उनकी क़ब्र को सम्मान देते हुए चूमते हैं, और अपने इस काम से ख़ुद को उनके क़रीब करते हैं।

सवाल: हज के समय ऐसा कौन सा क़दम हो सकता है जिस से मुसलमान इस विषय के चलते फूट से बच सकें?

जवाब: सब से अहम यह है कि हज के दिनों में इस मामले को ज़ोर दे कर बयान किया जाए कि आज यह वहाबियत पूरे इस्लामी जगत के लिए ख़तरा बत चुकी है, इस गुमराह टोले के सामने आने से पहले शिया और सुन्नी फ़िर्क़े के बीच आपसी कोई समस्या नहीं थी, हालांकि कुछ जगहों पर आपसी विचारों में मतभेद था, लेकिन उनको किनारे रखते हुए दोनों फ़िर्क़े आपस में विनम्रता के साथ रहते थे और यह सीरिया, मिस्र, पाकिस्तान, इराक़, यमन और बहरैन में किसी तरह का क़त्लेआम नहीं था, शिया और सुन्नियों से क़ब्रों की ज़ियारत और उसको सम्मान देते हुए चूमना यह सब सवालों के बजाए इस वहाबी टोले से यह सवाल पूछना होगा कि आज पूरी दुनिया में हर तरफ़ मुसलमानों का क़त्लेआम क्यों मचा रखा है, और इसका जवाब इस तकफ़ीरी टोले से मांगना चाहिए।

सवाल: अगर यह अमल (क़ब्रों की ज़ियारत और उनको सम्मान देते हुए चूमना) शिर्क है, तो क्यों ख़ुद वहाबी हज्रे असवद (काबे में लगा वह पत्थर जिसे हर हाजी चूमने की तमन्ना रखता है) या पहले और दूसरे ख़लीफ़ा की क़ब्र (जो पैग़म्बर स.अ. के मज़ार के पास ही है) या ताजिकिस्तान में मौजूद बुख़ारी के मज़ार या बग़दाद में अबू हनीफ़ा के मज़ार की ज़ियारत कर उसे क्यों चूमते हैं?

जवाब: क़ब्रों पर जाना, उनकी ज़ियारत करना, क़ब्र वाले को सम्मान देते हुए उसे चूमना यह सब हराम है इस सोंच को सबसे पहले बनी उमय्या और बनी मरवान ने फैलाया था, सबसे पहले जिस शख़्स ने पैगंम्बर स.अ. की क़ब्र की ज़ियारत से रोका वह मरवान इब्ने हकम था जिसका इशारा मुसनदे अहमद इब्ने हंबल की जिल्द 5 पेज 422 में किया है कि एक मरवान ने एक शख़्स को पैग़म्बर स.अ. की क़ब्र पर अपने सर को रखे हुए देखा, मरवान ने अपनी टेढ़ी गर्दन को झुका कर कहा तुझे मालूम है तू क्या कर रहा है, और उनको इस काम से रोक दिया, जब उन्होंने पैग़म्बर स.अ. की क़ब्र से अपने सर को उठा कर मरवान की ओर देखा, तो मरवान हक्का बक्का रह गया, क्योंकि वह पैग़म्बर स.अ. की क़ब्र पर आने वाला कोई आम इंसान नहीं बल्कि ख़ुद पैग़म्बर स.अ. के सहाबी अबू अय्यूब अंसारी थे, अबू अय्यूब अंसारी ने मरवान से कहा कि तू क्या समझता है मैं किसी पत्थर या मिट्टी के ढ़ेर की ज़ियारत करने आया हूं, मैंने पैग़म्बर स.अ. से सुना है कि जब तक दीन की मामले दीनदारों के हाथ में हों तब तक दीन के बारे में किसी चिंता की ज़रूरत नहीं है लेकिन जब दीन के मामले बे दीनों और फ़ासिक़ों के हाथ में आ जाएं तब दीन की हालत पर रो, इस रिवायत को अहले सुन्नत की और दूसरी किताबों में भी नक़्ल किया गया है, जैसे अल-मुसदरक अलस-सहीहैन, हाकिम नेशापूरी, जिल्द 4, पेज 560)

इसी वजह से सब से पहले मरवान और बनी उमय्या का ख़ानदान था जिसने इस विचार को पेश किया, पैग़म्बर स.अ. और अहले बैत अ.स. के नाम को मिटाने के लिए यह वहाबी टोला आज भी उसी बनी उमय्या के बनाए हुए रास्ते पर चल रहा है, जो शिर्क का बहाना बना कर पैग़म्बर स.अ. और अहले बैत अ.स. की शान में गुस्ताख़ी कर रहा है।

सवाल: यह बात ध्यान में रखते हुए कि अहले सुन्नत के दूसरे इस्लामी फ़िर्क़ों में क़ब्रों की ज़ियारत या पैग़म्बर स.अ. से जुड़ी चीज़ों का सम्मान करते हुए उसको एक ख़ास निगाह से देखते हैं, क्या इस बात की कोई मिसाल और नसूना अहले सुन्नत की हदीसों और रिवायतों में भी मौजूद है?

जवाब: सही मुस्लिम में जिल्द 2 पेज 315 पर असमा बिन्ते उमैस से एक हदीस इस तरह नक़्ल हुई है, जब कभी कोई बीमार होता था, उसके ठीक होने और शिफ़ा पाने के लिए हम पैग़म्बर स.अ. की क़बा को धोते और उस पानी को बीमार को दे देते।

यह हदीस पूरी तरह से पैग़म्बर स.अ. से जुड़ी चीज़ों का सम्मान करने को जाएज़ बताती है, और एक सही मुस्लिम की तफ़सीर लिखने वाले ने इस हदीस को लिखने के बाद यह लिखा भी है कि नेक और पाकीज़ा लोगों से जुड़ी चीज़ों का सम्मान करना उनको चूमना मुस्तहब है। (अल-मिन्हाज फ़ी शरहे सहीह मुस्लिम, जिल्द 5, पेज 237)

सवाल: क्या क़ुर्आन में भी इस बारे में कोई आयत मौजूद है?

जवाब.. जी बिल्कुल, सूरए निसा आयत 64 में अल्लाह का इरशाद होता है कि, हम ने रसूलों को केवल इसलिए भेजा ताकि अल्लाह के हुक्म से उनकी पैरवी की जाए, (और फिर नबी से ख़िताब होता है) अगर जब यह लोग अपने नफ़्सों पर ज़ुल्म करके तुम्हारे पास गुनाहों की तौबा के लिए आएंगे और पैग़म्बर स.अ. इनके लिए दुआ करेंगे तो ख़ुदा को तौबा क़बूल करने वाला और मेहेरबान पाएंगे।

इस आयत से अधिकतर सुन्नी उलमा ने यही समझा है कि चाहे पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी में हो या उनकी वफ़ात के बाद उनको और उनसे वसीले से दुआ करना और उनका उनसे जुड़ी चीज़ों का सम्मान करना जाएज़ है।

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