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पैग़म्बर स.अ. की सीरत में इस्लामी इत्तेहाद

किसी भी क़ौम और समाज के लिए अपने वजूद को बचाने के लिए सबसे ज़रूरी आपसी इत्तेहाद है, अगर सारे मुसलमान एक सफ़ में खड़े हो जाएं और उनमें आपसी इत्तेहाद और भाईचारा पैदा हो जाए तो साम्राज्यवादी ताक़तों का इस्लामी जगत को मिटाने की बात करना तो दूर उनकी तरफ़ आंख तक नहीं उठा सकतीं।

विलायत पोर्टल: इतिहास इस बात का गवाह है कि किसी भी क़ौम के आगे बढ़ने या पीछे रह जाने, तरक़्क़ी या पिछड़ेपन में और अच्छे हालात और बुरे हालात में इत्तेहाद, आपसी भाईचारे या आपसी नफ़रत और सांप्रदायिकता की अहम भूमिका रही है, क़ौमों के इतिहास के पढ़ने से पता चलता है कि उनमें जब तक आपसी मोहब्बत, भाईचारा और इत्तेहाद बाक़ी रहा तब तक कामयाबी और तरक़्क़ी उनके क़दम चूमती रही, और जैसे ही उन्होंने इत्तेहाद, आपसी मोहब्बत और भाईचारे का दामन छोड़ कर नफ़रत, फ़ितने और आपसी दुश्मनी का दामन थामा उन्हें कड़ी हार का सामना करना पड़ा, और चूंकि इत्तेहाद और आपसी भाईचारे को उन्होनें छोड़ दिया था इसलिए वह क़ौमें अपना वजूद और नाम तक नहीं बचा सकीं। 

किसी भी क़ौम और समाज के लिए अपने वजूद को बचाने के लिए सबसे ज़रूरी आपसी इत्तेहाद है, अगर सारे मुसलमान एक सफ़ में खड़े हो जाएं और उनमें आपसी इत्तेहाद और भाईचारा पैदा हो जाए तो साम्राज्यवादी ताक़तों का इस्लामी जगत को मिटाने की बात करना तो दूर उनकी तरफ़ आंख तक नहीं उठा सकतीं। 

दूसरी तरफ़ यह भी सच है कि इस्लामी स्कॉलर्स के बीच पैग़म्बर स.अ. की सीरत हमेशा से एक ख़ास विषय रहा है, अनेक पेश आने वाले हादसे और पैग़म्बर स.अ. की सीरत और इस्लामी इतिहास में पैग़म्बर स.अ. की भूमिका यह वह विषय हैं जिनका यह स्कॉलर्स हर दिन सामना करते हैं, पैग़म्बर स.अ. की सीरत का विश्लेषण करते समय उनका इस्लामी इत्तेहाद ज़ोर देना और उसको फैलाने में जो किरदार रहा है उसको यह लोग पढ़ते और अपने आर्टिकल और किताबों में लिखते हैं, बेशक इस सिलसिले में पैग़म्बर स.अ. की नसीहतें मुसलमानों के लिए बहुत क़ीमती साबित होंगी, क्योंकि अल्लाह का सूरए अहज़ाब आयत न. 21 में इरशाद है कि: तुम में से हर उस इंसान के लिए पैग़म्बर स.अ. की सीरत बेहतरीन आइडियल है जो शख़्स भी अल्लाह और उसके रसूल से उम्मीद लगाए हुए है और अल्लाह को बहुत याद करता है। 

आयत में उसवा का शब्द इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब रहबर, रहनुमा, आइडियल और पैरवी करना है, जिसका मतलब यह है कि अपनी ज़िंदगी के लिए किसी को आइडियल बनाएं। 

इसलिए यह सारे वाक़ेआत जो पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी से संबंधित है उन्हें ख़ास अहमियत हासिल है और उन्हें दलील के तौर पर जाना जाता है, और मुसलमानों की भी ज़िम्मेदारी है कि वह पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी और उनकी सीरत में ध्यान दें और उन्हें अपनी ज़िंदगी में जगह देने की कोशिश करें। 

अल्लामा तबातबाई लिखते हैं कि उसवा का मतलब पैरवी करना और उनकी सीरत को अपनाना है। 

अफ़सोस का मक़ाम तो यह है कि एक तरफ़ अल्लाह की तरफ़ से हमारे लिए इतना मज़बूत और मुकम्मल आइडियल और दूसरी तरफ़ आज पूरी दुनिया हमारे किरदार और चरित्र पर शक कर रही है....

और उससे ज़्यादा अफ़सोस की बात यह है कि 

"आज कुछ बे अमल और सिक्कों की खनक में बिक जाने वाले कमज़ोर ईमान वाले मुसलमानों के अमल की वजह से ख़ुद पैग़म्बर स.अ. की पाक और मुक़द्दस हस्ती पर तरह तरह के घिनौने इल्ज़ाम लगाए जा रहे हैं, कुछ मुठ्ठी भर जाहिलों के अमल को देख कर अल्लाह के नबी के ख़िलाफ़ ट्वीटर पर 3 दिन तक ट्रेंड चलाया जाता है और न जाने कैसे कैसे घटिया इल्ज़ाम और बे बुनियाद बातों को पैग़म्बर स.अ. से जोड़ा जाता है।"

बेशक ऐसा करने वाले जाहिल हैं और किसी हद तक क़ुसूरवार भी, लेकिन क्या इसमें कहीं न कहीं हमारी कमी नहीं है?! क्या हमने पैग़म्बर स.अ. की सीरत अपनाई? क्या हमने क़ुरआन के हुक्म के बाद उन्हें अपना आइडियल बनाया? क्या केवल सेमिनार, जुलूस और कॉन्फ्रेंस कर के पैग़म्बर स.अ. के उम्मती कहलाने का हक़ हमको है?

यह वह सवाल हैं जो हमें हमारे ईमान और हमारी पैग़म्बर स.अ. की पैरवी करने पर सवाल खड़ा करते हैं। 

हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि वह पैग़म्बर स.अ. की सीरत को अपनाए और उन्हें आइडियल की हैसियत से अपनी ज़िंदगी में जगह दे और सोशल मीडिया पर उनकी हदीस पोस्ट करने और फॉरवर्ड करने से ज़्यादा उस पर अमल करने पर ध्यान दे, केवल यही एक काम ऐसा है जिससे हम उनकी पैरवी भी कर सकेंगे, हमारे बीच इत्तेहाद भी क़ायम रहेगा और पूरी दुनिया हमारे अमल को देख कर पैग़म्बर स.अ. की सीरत और उनकी ज़िंदगी के बारे में जान सकेगी।

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