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पैग़म्बर स.अ. की सीरत और इमाम ख़ुमैनी र.अ. की विचारधारा

जो लोग इस्लामी इंक़ेलाब के बारे में शक का शिकार हैं वह हक़ीक़त में पैग़म्बर स.अ. की सीरत को समझने में असफ़ल रहे हैं, और यह भी हक़ीक़त है कि जिस दिन पैग़म्बर स.अ. की पाकीज़ा सीरत को समझ लिया और उसको अपनी ज़िंदगी में अपना लिया उस दिन न केवल इस्लामी इंक़ेलाब समझ में आ जाएगा बल्कि उस दिन से दुनिया में केवल इस्लाम और क़ुर्आन की हुकूमत होगी

विलायत पोर्टलः  इमाम ख़ुमैनी र.अ. जिनकी सीरत और किरदार मौजूदा दौर में इस्लाम और क़ुर्आन की नई ज़िंदगी का कारण बना, इसमें कोई शक नहीं कि जिस समय इस्लाम की परिभाषा, पहचान और हक़ीक़ी इस्लाम की तस्वीर धुंधली हो चुकी थी इमाम ख़ुमैनी र.अ. ने हक़ीक़ी इस्लाम की असली तस्वीर दुनिया के सामने पेश कर के इस्लाम और मुसलमानों को नई पहचान और आत्म सम्मान दिलाया, और साथ ही मुसलमान होने पर गर्व महसूस करवाते हुए इस्लाम और मुसलमानों को नई बुलंदी और नया मक़ाम दिया, इमाम ख़ुमैनी र.अ. ने मौजूदा दौर में इस्लाम और तौहीद के परचम को इतना बुलंद कर दिया कि कुफ़्र और नेफ़ाक़ के नजिस हाथ उस तक नहीं पहुंच सकते, सवाल यह है कि आख़िर एक बूढ़े कमज़ोर इंसान के अंदर इतनी ताक़त, इतना हौसला, इतना मज़बूत इरादा, इतनी हिम्मत, इतनी बहादुरी, इतनी दीनी ग़ैरत, इतनी लिल्लाहियत, इनती विनम्रता और इतनी पाकीज़गी कहां से आई....., इसका सीधा सा राज़ यह है कि इमाम ख़ुमैनी र.अ. पैग़म्बर स.अ. की ज़ात और उनकी सीरत में इस तरह फ़ना हो गए थे कि जब उनकी ज़िंदगी, तबलीग़, कामयाब मक़सद, उनकी सुलह और जंग और उसके रौशन नतीजों पर नज़र डालते हैं तो हमें पैग़म्बर स.अ. की पाकीज़ा सीरत की बेहतरीन मिसालें देखने को मिलती हैं, या इस तरह कहा जाए कि पैग़म्बर स.अ. के ग़ुलाम ने अपने आक़ा और रहबर की सीरत को अपनी रूह में इस तरह उतार लिया था कि वह ख़ुद दूसरो के लिए आइडियल बन गया।

जो लोग इस्लामी इंक़ेलाब के बारे में शक का शिकार हैं वह हक़ीक़त में पैग़म्बर स.अ. की सीरत को समझने में असफ़ल रहे हैं, और यह भी हक़ीक़त है कि जिस दिन पैग़म्बर स.अ. की पाकीज़ा सीरत को समझ लिया और उसको अपनी ज़िंदगी में अपना लिया उस दिन न केवल इस्लामी इंक़ेलाब समझ में आ जाएगा बल्कि उस दिन से दुनिया में केवल इस्लाम और क़ुर्आन की हुकूमत होगी, यह बात भी सच है कि न केवल दुनिया बल्कि मुसलमानों के लिए भी इस्लाम का हक़ीक़ी असर छिपा रहा या जान बूझ कर छिपाया गया, लेकिन यह भी सच है कि मुसलमानों ने इस्लाम के हमेशा चमकते रहने और बाक़ी रहने वाले असर को जानने और अपनाने की कोशिश नहीं की।

इमाम ख़ुमैनी र.अ. फ़रमाते हैं कि उन्होंने सालों साल तक इस बात की कोशिश की है कि इस्लाम को छिपा कर रखें, इस्लाम अपनी असली शक्ल में सामने न आने पाए, अगर इस्लाम अपनी हक़ीक़ी शक्ल में पेश किया गया तो दूसरे सारे दीन और मज़हब पीछे रह जाएंगे, उन्होंने लंबी प्लानिंग के साथ लंबे समय तक इस्लाम की हक़ीक़ी शक्ल को लोगों से छिपाया, यहां तक कि ख़ुद मुसलमानों से भी छिपाए रखा....। (सहीफ़-ए-नूर, जिल्द 5, पेज 281)

आंखों, पलकों और रुख़सार से हट कर पैग़म्बर स.अ. की सच्चाई, उनके बात करने का अंदाज़ और उनके नेक किरदार पर ध्यान देने की ज़रूरत है जो कि इंसान की तरबियत और उसकी रूह को ज़िंदगी अता करने वाला है, पैग़म्बर स.अ. ज़ुल्म और अत्याचार का शिकार हुए लोगों, हालात के मारों, ख़्याली दुनिया में गिरफ़्तार लोगों और इब्नुल वक़्त लोगों द्वारा क़ैद किए लोगों को नजात दिलाने के लिए तशरीफ़ लाए थे।

वह कुफ़्र और ज़ुलमत की अंधेरी रातों में भटकते हुए इंसानों को नूरानी और रूहानी दुनिया में लाने और ख़ुदा की निशानियां पेश करने, उनके नफ़्सों को पाक करने और इल्म और हिकमत की दौलत से बे नियाज़ करने के लिए तशरीफ़ लाए थे।

यक़ीनन अल्लाह ने ईमान वालों पर एहसान किया है कि उनके दरमियान उन्हीं में से एक रसूल भेजा है जो उनके लिए आयतों की तिलावत करता है, उन्हें पाकीज़ा बनाता है, और किताब और हिकमत की तालीम देता है, और यह लोग पहले से बड़ी खुली गुमराही में पड़े हुए थे। (सूरए आले इमरान, आयत 164)

पैग़म्बर स.अ. की विलादत हक़ीक़त में ज़ुल्म और शिर्क की हार है

दुनिया में लाखों लोग रोज़ाना पैदा होते हैं और ज़्यादातर विलादतें माहौल और समाज पर कोई ख़ास असर नहीं डाल रही होती हैं, लेकिन कुछ विलादतों का असर बड़े पैमाने पर महसूस किया जा सकता है, जैसेकि पैग़म्बर स.अ. की विलादत..... एक तरफ़ उनकी विलादत की ख़बर ख़ैर और बरकत का स्रोत और रहमतों का गहरा समंदर दिखाई देती है और दूसरी तरफ़ ज़ुल्म और शिर्क के विनाश का मज़हर भी दिखाई देती है, चूंकि आपकी विलादत अद्ल और तौहीद का स्रोत थी इसलिए आपकी विलादत ज़ुल्म और शिर्क पर बेहतरीन वार साबित हुई।

इमाम ख़ुमैनी र.अ. फ़रमाते हैं कि विलादतें अनेक होती हैं, एक विलादत ख़ैर और बरकत का स्रोत होती है, ज़ुल्म के विनाश का कारण होती है, बुतकदों को ढ़हाने और आतिशकदों को बुझाने की बुनियाद होती है..... जैसेकि पैग़म्बर स.अ. की विलादत... उस ज़माने में दो ताक़तें थीं, ज़ालिम हुकूमत और आग की पूजा करने वाली रूहानी ताक़तें..... पैग़म्बर स.अ. की विलादत इन दोनों ताक़तों की नाबूदी का ज़रिया बनी। (सहीफ़-ए-नूर, जिल्द 2, पेज 214)

पैग़म्बर स.अ. की बेसत

अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए नबियों को किन बुनियादों पर मबऊस किया गया है और किस लिए इस दुनिया में भेजे गए हैं यह एक बुनियादी सवाल है जिसका सही और मुकम्मल जवाब देने में हमने टाल मटोल किया है, और इस टाल मटोल की वजह या हमारी छोटी सोंच है या दुश्मन की साज़िश,... किताबों में लिखी ऐतिहासिक दास्तानों और उसी के साइड में बयान किए गए अख़लाक़ी किरदार और सीरत को उनकी रिसालत और नबुव्वत का मक़सद समझते रहे हालांकि क़ुर्आन हमें बार बार पुकार कर आवाज़ देता है कि बेशक हम ने अपने रसूलोंको रौशन दलीलों के साथ भेजा है और उनके साथ किताब और मीज़ान को नाज़िल किया है। (सूरए हदीद)

इमाम ख़ुमैनी र.अ. ने अपनी विचारधारा में नबियों की बेसत के मक़सद को ख़ास जगह दी है और अनेक मौक़ों पर फ़रमाया है कि अंबिया ज़ुल्म से टकराने और उसको जड़ से ख़त्म करने और दीन और अदालत को क़ायम करने के लिए तशरीफ़ लाए थे, इमाम ख़ुमैनी र.अ. बेसत के मक़सद की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाते हैं कि...

हज़रत इब्राहीम अ.स. की ज़िंदगी को देखें कि उन्होंने सारे बुतों को तोड़ डाला और अपने दौर के सबसे बहादुर और मज़बूत लोगों से सामाजिक भलाई और जनता के हित में लड़ गए थे ताकि वह ज़ालिम लोग आम जनता पर ज़ुल्म न करने पाएं।

हज़रत मूसा अ.स. ने अपनी असा उठाया और मिस्र के ख़ुदाई का दावा करने वाले ताक़तवर बादशाह से टकरा गए और मिस्र के बादशाह की तरह आम जनता को ख़रगोश की नींद नहीं सुलाया बल्कि अपने उसी असा और तबलीग़ द्वारा जनता को अपने दौर के सबसे ज़ालिम बादशाह के विरुध्द खड़ा कर दिया।

पैग़म्बर स.अ. भी पिछले नबियों की तरह इसी मक़सद के लिए भेजे गए और पूरी ज़िंदगी बातिल ताक़तों और ज़ुल्म और अत्याचार करने वालों से लड़ते रहे, मक्के में बेसत से ले कर मदीना हिजरत तक और मदीने में ज़िंदगी की आख़री सांस तक इसी मक़सद को साने रखा कि ज़ुल्म की विरुध्द आवाज़ उठाएं और उसका मुक़ाबला करें और समाज में दीन और अदालत की हुकूमत हो।

इमाम ख़ुमैनी र.अ. फ़रमाते हैं कि, जब पैग़म्बर स.अ. हेजाज़ में थे तो पहले जिन ताक़तवर लोगों से मुक़ाबला था उनमें स एक गिरोह मक्के में बहुत मज़बूत व्यापारियों (ताजिरों) का था और एक गिरोह ताएफ़ में था, यह सब भी अबू सुफ़यान और उसके जैसे सारे हाकिम और बादशाह की तरह थे, पैग़म्बर स.अ. ने इन सारे ज़ालिमों और बादशाहों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और उनका मुक़ाबला किया, केवल यही नहीं बल्कि पैग़म्बर स.अ. समाज के दबे कुचले लोग जिन पर यह ज़ालिम अपना हुक्म थोप रहे थे उन्हीं को इन बादशाहों और हाकिमों के मुक़ाबले पर ला कर खड़ा कर दिया। (सहीफ़-ए-नूर, जिल्द 2)

यही वह इलाही सियासत थी जो नबियों के बेसत का मक़सद रही है, और अफ़सोस इसी बात का है कि मुसमलान आज इसी मक़सद को भुला कर अपनी तक़दीर को कोस रहा है, और हद तो यह हो गई कि इस्लाम विरोधी ताक़तों और हमारी जेहालत ने हमें इस्लाम और क़ुर्आन से इतना दूर कर दिया है कि अब ख़ुद मुसलमान मुसलमानों के ख़ून के प्यासे बने बैठे हैं।



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