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पैग़म्बर स.अ. की सियासी बसीरत

मदीना सबसे पहली वह इस्लामी हुकूमत है जहां हर कोई चाहे वह हाकिम हो या आम जनता सब अल्लाह के क़ानून के आगे सर झुकाए हुए हैं, आप की हुकूमत की सबसे ख़ास बात यह है कि केवल दस साल की हुकूमत में अरब जो छोटे छोटे क़बीले में बंटा हुआ था वह अब एक मुकम्मल हुकूमत में बदल चुका था और साथ ही इस्लामी तहज़ीब और कल्चर का ऐसा मरकज़ और सेंटर हो चुका था जिसके आगे सारी दुनिया सर झुकाए हुए थी।

विलायत पोर्टल: अल्लाह के सबसे पसंदीदा नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.अ. इस दुनिया सारे इंसानों के लिए ज़िंदगी गुज़ारने के सही और सबसे मुकम्मल क़ानून लेकर आए, आपने व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों ज़िंदगी में मुकम्मल आइडियल बन कर दिखाया, आपने अपनी पाक ज़िंदगी में इस दुनिया में पहली सांस लेने से लेकर आख़िरी सांस तक अपने मुबारक वजूद में वह सारे ज़िंदगी के उसूल जमा कर दिए थे जो सारी इंसानियत के लिए तक़लीद और पैरवी करने के लायक़ हैं, अल्लाह का यह बहुत बड़ा एहसान है कि उसने हमारे बीच पैग़म्बर स.अ. जैसी अज़ीम हस्ती भेजी, जिस समय आप इस दुनिया में तशरीफ़ लाए उस समय यह दुनिया जेहालत और अपमान का सामना कर रही थी, हर छोटी बात के लिए कई कई साल तक लोग लड़ा करते थे, कल्चर के नाम पर ग़ैर इंसानी चीज़ों को परोसा जा रहा था, समाज में हर चीज़ का इलाज टोटके में तलाश किया जा रहा था, रूम का फ़लसफ़ा अपनी अधूरी वैल्यूज़ का मातम मना रहा था, रूम की अज़ीम हुकूमत दम तोड़ रही थी, ईरान और चीन अपने कल्चर को गृह युद्ध की भेंट चढ़ता देख रहे थे, तुर्किस्तान और अफ़्रीक़ा में भी सारी दुनिया की तरह अख़लाक़ और नैतिकता का गिरता हुआ स्तर देखा जा सकता था, और अरब की हालत तो इन सबसे गई गुज़री थी, सियासी तहज़ीब और राजनीतिक कल्चर तो उन्हें पता ही नहीं था, क़बीलों की आपसी लड़ाइयों को देख कर लगता है कि इत्तेहाद नाम का शब्द उन्होंने सुना ही नहीं था, वहां हमेशा से ला एंड ऑर्डर की धज्जियां उड़ रही थीं, इत्तेहाद और डिसिप्लिन का शुऊर और क़ानून और हुक्म को मानना जिनसे सामाजिक और राजनीतिक ज़िंदगी चलती है उनके यहां दूर दूर तक कोई ज़िक्र नहीं था, क़बीले आपसी मतभेदों और एक दूसरे से दुश्मनी में इतने उलझे हुए थे कि कल्चर और तहज़ीब का ख़्याल भी उनके दिमाग़ से नहीं गुज़रा था, बस इतना समझ लीजिए पूरी दुनिया में जानवरों जैसी ज़िंदगी हो चुकी थी।

पैग़म्बर स.अ. के इस दुनिया में आने की बरकत और आपके द्वारा लाई गईं इलाही तालीमात और संस्कारों ने पूरे अरब को एक इत्तेहाद के रिश्ते में पिरो दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि जिस अरब में छोटी छोटी बातों को लेकर सालों तक लड़ाइयां और झगड़े हुआ करते थे बेटियों को ज़िंदा दफ़्न कर दिया जाता था उसी अरब में सारे इंसानों के बीच अख़लाक़, तहज़ीब, कल्चर और हुक्म के मानने का चलन पैदा हो गया, और यह सब केवल इसलिए था कि पैग़म्बर स.अ. ने बादशाहत के सिस्टम से हट कर हुकूमत का एक ऐसा सिस्टम क़ायम किया जो इलाही हुकूमत थी जिसकी बुनियाद में तौहीद शामिल थी, आपकी बेसत से पहले हुकूमत और राजनीतिक सिस्टम केवल बादशाहत तक सीमित था जिसमें केवल तानाशाही और अहंकार था जिसमें केवल एक ही आदमी सारे फ़ैसले लिया करता था, न किसी के मशविरे की कोई वैल्यू थी और न ही किसी को राय की कोई अहमियत, लेकिन जो हुकूमत आपने क़ायम की उसमें न तो किसी तरह की शहंशाहियत थी न अहंकार, आपकी हुकूमत में अमीर ग़रीब, मज़दूर हाकिम सब बराबर थे, और हर शख़्स अपने पद से ऊपर उठ कर अल्लाह के हुक्म का पाबंद था।

मदीना सबसे पहली वह इस्लामी हुकूमत है जहां हर कोई चाहे वह हाकिम हो या आम जनता सब अल्लाह के क़ानून के आगे सर झुकाए हुए हैं, आप की हुकूमत की सबसे ख़ास बात यह है कि केवल दस साल की हुकूमत में अरब जो छोटे छोटे क़बीले में बंटा हुआ था वह अब एक मुकम्मल हुकूमत में बदल चुका था और साथ ही इस्लामी तहज़ीब और कल्चर का ऐसा मरकज़ और सेंटर हो चुका था जिसके आगे सारी दुनिया सर झुकाए हुए थी।

पैग़म्बर स.अ. ने सबसे बुनियादी काम अपनी हुकूमत में यही अंजाम दिया था कि वह सारे लोग जो अपनी दुकानें चमकाने के लिए ग़ैर फ़ितरी उसूलों और स्लोगन को अपनाए हुए थे उनकी दुकानों पर ताले डाल दिए, क़ौमी, नस्ली, रंग और जातिवाद के भेदभाव की राजनीति जो उस समय इत्तेहाद के लिए सबसे बड़ा ज़हर था उस राजनीति और सियासत को चकनाचूर कर दिया।

आपने अपनी हुकूमत में तौहीद को मरकज़ बनाते हुए बंदगी, आपसी भाईचारे और अदालत को सबसे ख़ास दर्जा दिया, और तक़वा को इस तरह लोगों के दिलों में जगाया कि बड़े बड़े बादशाह भी अपने अहंकार और बादशाही के नशे को छोड़ कर तौहीद के परचम के नीचे जमा होकर मुत्तहिद दिखाई दिए।

आपने एक आम इंसान के झूठ, धोखाधड़ी और छल कपट से ज़्यादा बादशाह और हाकिम के जुर्म को संगीन बताया।

आपने एक काफ़ी साल पाबंदियों और मज़लूमियत के भी गुज़ारे और साथ ही हाकिम बन कर भी, आपने सुलह भी की साथ ही जंग भी, लेकिन जो बात आपकी ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा आपकी तरफ़ ध्यान खींचती है वह आपका अल्लाह पर भरोसा और अदालत का ख़्याल है, आपकी 10 साल की हुकूमत में कभी यह कोशिश नहीं रही कि पड़ोसी देशों या दूसरे क़बीले के लोगों या जो आपको और आपके द्वारा दिए जाने वाले इलाही पैग़ाम को नहीं मानते उनसे किसी तरह की दुश्मनी की जाए, और उन्हें अपनी बातों को मानने पर मजबूर किया जाए।

यह और बात है बाद में बहुत से ऐसे हाकिम और बादशाह आए जिन्होंने पैग़म्बर स.अ. के नाम का इस्तेमाल करते हुए और अपनी हुकूमत को उनकी हुकूमत से जोड़ते हुए हुकूमत क़ायम की लेकिन अहंकार में ऐसा डूबे कि न ही अल्लाह को कभी याद किया न ही उसके बंदों के हुक़ूक़ का ख़्याल रखा, जिन्होंने न ही अदालत का ख़्याल किया न ही इंसानी वैल्यूज़ का, जिन्होंने न ही इलाही तालीमात का ख़्याल रखा और न ही इस्लामी क़ानून का, जिनके नाम तो इस्लामी थे लेकिन उनके अमल से इस्लाम तो दूर इंसानियत का भी कोई संबंध नहीं था, ज़ाहिर है ऐसे लोग केवल सत्ता और हुकूमत के लिए पाक और नेक लोगों के नाम को इस्तेमाल करते हैं और हुकूमत के आते ही सारी इंसानी वैल्यूज़ और तहज़ीब को रौंद देते हैं, इनका न तो इंसानियत से कोई लेना होता है न ही इंसान से, यह लाशों के ढेर पर भी सत्ता का भोग लेने के लिए तैयार रहते हैं।

इस्लाम और उसके पैग़म्बर स.अ. ने ऐसे लोगों के बारे में साफ़ एलान कर दिया है कि इनका इस्लाम और मुसलमानों से कोई संबंध नही है इसलिए कि इस्लामी हुकूमत की बुनियाद में इंसानियत की सेवा शामिल है।

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