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नमाज़ और इमाम अली अ.स. के बीच समानताएं

नमाज़ और इमाम अली अ.स. दोनों अल्लाह के मज़बूत क़िले हैं, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने यह कह कर फ़रमाया किअल्लाह का कहना है कि अली (अ.स.) की विलायत मेरा क़िला है और जो मेरे क़िले में आ गया वह मेरे अज़ाब से बच गया

विलायत पोर्टलः 

  1. दोनों दीन के मज़बूत रुक्न हैं, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया अली (अ.स.) दीन के रुक्न हैं (काफ़ी, जिल्द 1, पेज 294) और इसी तरह इमाम अली अ.स. ने फ़रमाया नमाज़ दीन का मज़बूत रुक्न है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 82, पेज 209)
  2. दोनों के द्वारा आमाल को परखा और तौला जाता है जैसाकि इमाम अली अ.स. की ज़ियारत में मौजूद है कि सलाम हो आप पर ऐ वह कि जिन पर आमाल को परखा जाएगा। (मफ़ातीहुल जेनान, इमाम अली अ.स. का ज़ियारत नामा) और पैग़म्बर स.अ. ने नमाज़ के लिए फ़रमाया कि नमाज़ के द्वारा आमाल को परखा जाता है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 84, पेज 264)
  3. जिस तरह मारेफ़त के साथ नमाज़ पढ़ने से हमारी मग़फ़ेरत होती उसी तरह मारेफ़त के साथ इमाम अली अ.स. की ज़ियारत करने से भी मग़फ़ेरत होगी, हदीस में है कि इमाम अली अ.स. की मारेफ़त के साथ की गई ज़ियारत से हमारी मग़फ़ेरत होगी। (मफ़ातीहुल जेनान, इमाम अली अ.स. का ज़ियारतनामा) और इसी तरह नमाज़ के बारे में भी हदीस है कि जो भी नमाज़ को मारेफ़त के साथ पढ़ेगा उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे। (ख़ेसाल, जिल्द 2, पेज 628)
  4. नमाज़ और इमाम अली अ.स. से मोहब्बत ईमान है और इन दोनों को छोड़ना कुफ़्र है, पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि अली (अ.स.) से मोहब्बत ईमान और उनसे नफ़रत कुफ़्र है (सफ़ीनतुल बिहार, जिल्द 2, पेज 21) इसी तरह नमाज़ के बारे में आपने फ़रमाया कि ईमान और कुफ़्र के बीच का फ़ासला नमाज़ का छोड़ना है (कन्ज़ुल उम्माल, जिल्द 69, पेज 188) यानी जिसने नमाज़ को पाबंदी से अदा किया वह मोमिन है और जिसने उसको कम आंकते हुए छोड़ा वह काफ़िर है। 
  5. नमाज़ और इमाम अली अ.स. दोनों को नेकी कहा गया है, जैसाकि इमाम अली अ.स. के लिए पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया कि इमाम अली अ.स. की मोहब्बत ऐसी नेकी है जिसके होते हुए कोई बुराई नुक़सान नहीं पहुंचा सकती (बिहारुल अनवार, जिल्द 39, पेज 90) और इसी तरह नमाज़ के लिए क़ुर्आन ने कहा नमाज़ क़ाएम करो........बेशक नेकियां बुराईयों को ख़त्म कर देती हैं। (सूरए हूद, आयत 114)
  6. नमाज़ और इमाम अली अ.स. दोनों अल्लाह के मज़बूत क़िले हैं, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने यह कह कर फ़रमाया किअल्लाह का कहना है कि अली (अ.स.) की विलायत मेरा क़िला है और जो मेरे क़िले में आ गया वह मेरे अज़ाब से बच गया (बिहारुल अनवार, जिल्द 39, पेज 249) और इमाम अली अ.स. ने नमाज़ के बारे में फ़रमाया नमाज़ शैतान के हमलों से बचने का क़िला है। (ग़ोररुल हेकम, हदीस 2212)
  7. कठिन परिस्तिथियों में नमाज़ और इमाम अली दोनों से मदद मांगने को कहा गया है जैसाकि नमाज़ के बारे में क़ुर्आन में हुक्म मौजूद है कि सब्र और नमाज़ द्वारा मदद मांगो (सूरए बक़रह, आयत 45) और इमाम रज़ा अ.स. की हदीस है कि जब भी तुम्हारे लिए बुरे हालात और कठिन परिस्तिथि आए तो अल्लाह से हमारे वसीले से मदद मांगो। (बिहारुल अनवार, जिल्द 94, पेज 5)
  8. नमाज़ और इमाम अली अ.स. की विलायत दोनों ही अमल के क़ुबूल होने की शर्त हैं, जैसाकि इमाम अली अ.स. की विलायत के बारे में हदीस में है कि क़यामत में किसी भी बंदे की नेकियां इमाम अली अ.स. की विलायत के बिना क़ुबूल नहीं होंगी (बिहारुल अनवार, जिल्द 16, पेज 318) और नमाज़ के बारे में हदीस में है कि अगर नमाज़ क़ुबूल हुई तभी दूसरे आमाल क़ुबूल होंगे। (काफ़ी, जिल्द 3, पेज 268)
  9. नमाज़ और इमामत दोनों इस्लाम के रुक्न हैं, जैसाकि मशहूर हदीस में मिलता है कि इस्लाम का बुनियाद इन पांच चीज़ों पर रखी गई है, नमाज़ ज़कात हज रोज़ा और विलायत। (वसाएलुश-शिया, जिल्द 1, पेज 7)
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