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तक़लीद क्या है

तक़लीद यानि शरई हुक्म को जानने के लिए जामिउश्शराएत मुज्तहिद[1] से सम्पर्क करना और दूसरे शब्दों में शरई अहकाम को मुज्तहिद के फ़तवे के अनुसार अंजाम देना।

·तक़लीद जहां कुर्आन  हदीस से साबित है वही इंसान की अक़्ल भी कहती है कि जो शरीअत के अहकाम नहीं जानता है उसे जामेउश्शराएत मुज्तहिद के फ़त्वे के हिसाब से अमल करना चाहिए। 

·अगर मुकल्लफ़ ख़ुद मुज्तहिद  हो तो उसे किसी मुज्तहिद की तक़लीद या एहतियात पर अमल करना चाहिए।

·चूंकि एहतियात पर अमल करने के लिए एहतियात के तमाम रास्तों और तरीक़ों को जानना ज़रूरी है और एहतियात पर अमल करने में वक़्त भी ज़्यादा लगता है इसलिए बेहतर यही है कि इंसान जामेउश्शराएत मुज्तहिद की तक़लीद करे।

[1]. ऐसा मुज्तहिद जिसके अंदर मरजा होने की तमाम शर्तें मौजूद हों और मुज्तहिद उस इंसान को कहते हैं जिसका इल्म उस दर्जे पर पहुंच चुका हो कि वह दलीलों और तर्कों द्वारा इस्लामी अहकाम को हासिल करने की ताक़त रखता हो। और मरजा उसे कहते हैं जिसकी तक़लीद की जाती है।

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