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तक़लीदे इब्तेदाई और बक़ाई में क्या अंतर है

एक हिसाब से मुर्दा मुज्तहिद की तक़लीद दो तरह से हो सकती है।

  1. इब्तेदाई (यानि मुज्तहिद की ज़िंदगी में उसकी तक़लीद किए बिना मरने के बाद उसकी तक़लीद करना) एहतियाते वाजिब[1] की बिना पर तक़लीदे इब्तेदाई जाएज़ नहीं है। 
  2. बक़ाईः (यानि जिस मुज्तहिद की तक़लीद कर रहा था मरने के बाद भी उसकी तक़लीद पर बाक़ी रहना) सभी मसअलों में यहां तक कि उन मसअलों में भी जिनमें मुकल्लफ़ ने अभी तक अमल नहीं किया है, मुर्दा मुज्तहिद की तक़लीद जाएज़ है। 
  3. बक़ाई तक़लीद में मुर्दा मुज्तहिद की तक़लीद जाएज़ है चाहे वह आलम (सबसे बड़ा आलिम) हो या न हो। लेकिन एहतियात की बिना पर बेहतर यही है कि अगर मुर्दा मुज्तहिद आलम था तभी उसकी तक़लीद पर बाक़ी रहा जाए। 
  4. तक़लीदे इब्तेदाई या मय्यत की तक़लीद पर बाक़ी रहने के लिए ज़िंदा मुज्तहिद और एहतियाते वाजिब की बिना पर आलम की इजाज़त ज़रूरी है। हाँ अगर मय्यत की तक़लीद पर बाक़ी रहने के जाएज़ होने पर मौजूदा दौर के सभी फ़ोक़हा एकमत हों तो आलम की इजाज़त ज़रूरी नहीं है।
  5. जो लोग मुज्तहिद जामेउश्शराएत की ज़िंदगी में नाबालिग़ रहे हों लेकिन उन्होंने सही तरीक़े से मुज्तहिद की तक़लीद की हो तो मुज्तहिद के मरने के बाद उसकी तक़लीद पर बाक़ी रह सकते हैं।
  6. जो इंसान किसी मुज्तहिद की तक़लीद करता हो फिर उसके मरने के बाद कुछ मसअलों में किसी दूसरे मुज्तहिद की तक़लीद कर ले फिर दूसरा मुज्तहिद भी मर जाए तो जिन मसअलों में उसने दूसरे मुज्तहिद की तरफ़ उदूल (दूसरे मुज्तहिद से सम्पर्क) नहीं किया था उनमें वह पहले मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रह सकता है। और जिन मसअलों में उसने दूसरे मुज्तहिद की तरफ़ उदूल कर लिया था उनमें उसे इख़्तियार है कि उसी मुज्तहिद के फ़तवे पर बाक़ी रहे या ज़िंदा मुज्तहिद की तक़लीद कर ले।

[1]. एहतियात या वाजिब है या मुस्तहब और दोनों के बीच दो तरह का फ़र्क़ पाया जाता है, एक पहचानने और परखने में कि एहतियात से मुराद कौन सी एहतियात है और दूसरे अमल में है कि दोनों तरह की एहतियात में इंसान की ज़िम्मेदारी क्या है?

पहला फ़र्क़ः अगर मुजतहिद ने किसी मसअले में फ़तवा दिया हो और फिर एहतियात भी की हो तो इसे एहतियाते मुस्तहब कहा जाता है जैसे ग़ुस्ले इर्तेमासी में अगर ग़ुस्ले इर्तेमासी की नियत से धीरे धीरे पानी में जाए यहां तक कि उसका पूरा जिस्म पानी में डूब जाए तो उसका ग़ुस्ल सही है और एहतियात यह है कि धीरे धीरे जाने के बजाए एक बार में पानी में डुबकी लगा ले (यहां मुजतहिद ने पहले फ़तवा बयान किया है फिर कहा है कि एहतियात यह है कि...) लेकिन अगर मुजतहिद ने फ़तवा न दिया हो और शुरू ही से एहतियात की हो तो उसे एहतियाते वाजिब कहते हैं जैसे अगर नज़्र करे कि फ़लाँ फ़क़ीर को सदक़ा (दान) देगा तो दूसरे फ़क़ीर को नहीं दे सकता और अगर वह फ़क़ीर मर जाए तो एहतियात यह है कि उसके वारिसों को दिया जाए। (यहां पर मुजतहिद ने फ़कीर के मरने की सूरत में फ़तवा नहीं दिया है बल्कि कह दिया कि एहतियात यह है कि...) 

दूसरा फ़र्क़ः   एहतियाते मुस्तहब में तक़लीद करने वाले की ज़िम्मेदारी है कि वह उसी एहतियात पर अमल करे या पहले बयान किए गए फ़तवे पर अमल करे और उसे दूसरे मुजतहिद के फ़तवे पर अमल करने की इजाज़त नहीं है। लेकिन एहतियाते वाजिब में तक़लीद करने वाले को छूट है कि वह उसी एहतियात पर अमल करे या दूसरे मुजतहिद (जो उसके मरजा के बाद दूसरे मुजहिदों से ज़्यादा इल्म रखता है) के फ़तवे पर अमल करे।


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