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ज़ुबान

इमाम अली अ.स. ने फ़रमाया: जो बात नहीं जानते हो उसे ज़ुबान से मत निकालो बल्कि हर वह बात जिसे जानते हो उसे भी मत बयान करो, क्योंकि अल्लाह ने जिस्म के हर अंग की कुछ ज़िम्मेदारियां रखी हैं और उन्हीं ज़िम्मेदारियों द्वारा क़यामत के दिन हुज्जत क़ायम करने वाला है।

विलायत पोर्टलः इंसान के जिस्म में जितने भी अंग हैं उनमें से हर एक का विशेष महत्व है, और उनमें से किसी एक के बारे में भी यह कहना मुश्किल है कि यह ज़्यादा अहमियत रखता है और उस दूसरे का महत्व कम है, इसलिए कि जब जिस्म के सारे अंग सही रहते हैं तो उनके अहमियत का अंदाज़ा नहीं हो पाता लेकिन जैसे ही कोई एक अंग तकलीफ़ में होता है तो उसकी अहमियत का अंदाज़ा होने लगता है, और इस बात का अंदाज़ा उसको शायद कम हो जिसके जिस्म के सारे अंग सही और सलामत हों लेकिन जिसके जिस्म के कुछ अंग सलामत न हों या कुछ अंग हों ही नहीं तो उससे बेहतर उन अंगों की अहमियत और उसका महत्व कोई दूसरा नहीं समझ सकता।

आंख किनती बड़ी नेमत का नाम है यह वह अच्छी तरह समझेगा जिसकी आंख में कोई मुश्किल हो या इसी तरह हाथ जैसी नेमत या पैर और कान जैसी नेमत जब तक सलामत है तब तक उसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, इंसान के जिस्म में कुछ अंग बड़े और उनके मुक़ाबले कुछ छोटे हैं लेकिन हर एक अपनी जगह एक ख़ास अहमियत रखता है, जिस्म के इन्हीं अंगों में से एक अंग ज़ुबान है जो देखने में तो जिस्म का बहुत बड़ा अंग नहीं है लेकिन सारे जिस्म में यह अंग एक ख़ास किरदार निभाता है, ज़ुबान की अहमियत का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जब चाहे लोगों को एक कर दे और जब चाहे अलग कर दे, अपने को पराया बना दे और पराए को अपना, जब चाहे किसी घर को आबाद कर दे और जब चाहे वीरान बना दे, जब चाहे किसी को आसमान पर पहुंचा दे और जब चाहे ज़मीन पर, अगर किसी की तारीफ़ करने पर आ जाए तो उससे अच्छा कोई नहीं और अगर किसी की बुराई करने पर आ जाए तो उससे बुरा कोई नहीं, कहने का मतलब यह है कि ज़ुबान की इंसान की ज़िदगी में काफ़ी अहमियत है, और इस बात का सही अंदाज़ा तभी होगा जब हम आयतों और हदीसों में ध्यान देंगे कि ज़ुबान को लेकर कितनी ताकीद की गई है, ज़ाहिरी तौर पर जो चीज़ इंसान की पहचान का कारण है वह उसका चेहरा है इंसान अपने चेहरे और शक्ल से पहचाना जाता है, लेकिन इंसान के अंदर क्या है और उसकी फ़ज़ीलत कितनी है यह उस समय तक पता नहीं चलता जब तक वह कुछ बोले न, जैसे ही बोलता है बात करता है सामने वाला समझ जाता है कि इसके अदर क्या है, इसी चीज़ की तरफ़ इशारा करते हुए इमाम अली अ.स. ने फ़रमाया ऐ इंसान तू ऐसी स्पष्ट किताब है जिसकी बातचीत से उसकी छिपी हुई चीज़ें ज़ाहिर हो जाती हैं। (दीवाने अमीरुल मोमेनीन, मोहक़्क़िक़ मुस्तफ़ा ज़मान, पेज 175)

यानी जैसे ही बोलता है समझ में आ जाता है कि मालूमात और इल्म का समंदर है या एक बेकार क़तरा है, दूसरी जगह इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि बोलो ताकि पहचाने जाओ इसलिए कि इंसान की शख़्सियत उसकी ज़ुबान के नीचे छिपी रहती है। (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 392)

क़ुर्आन और हदीसों में जिन चीज़ों के बारे में ज़्यादा ताकीद हुई है उनमें से एक ज़ुबान है, बल्कि कहा जा सकता है कि ज़ुबान के बारे में कुछ ज़्यादा ताकीद की गई है, अल्लाह ने क़ुर्आन में अनेक जगह पर फ़रमाया है कि इंसान को कैसे बातचीत करनी चाहिए, उसकी बातचीत का अंदाज़ कैसा होना चाहिए, आज दुनिया का हर इंसान यही चाहता है कि लोग उसकी बात मानें, उसकी ज़ुबान में असर पैदा हो, उसकी बात मौक़े के हिसाब से हो, और इन सबके लिए लोग मनोविज्ञान और दूसरे विषय पढ़ते हैं, काफ़ी मेहनत करते हैं, प्रैक्टिस करते हैं....., तो इसके लिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, केवल क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. के बताए हुए फ़ार्मूले पर अमल करने की ज़रूरत है।

क़ुर्आन ने बातचीत के अंदाज़ को अनेक तरीक़े से बयान किया है, कहीं पर क़ौले मारूफ़ का शब्द इस्तेमाल किया है और फ़रमाया उनसे मुनासिब और नेक बातचीत किया करो। (सूरए निसा, आयत 5, सूरए अहज़ाब, आयत 33), कहीं पर क़ौले बलीग़ का प्रयोग किया और फ़रमाया और उनके दिल पर असर करने वाली मौक़े के मुताबिक़ बात करें। (सूरए निसा, आयत 63), कहीं पर क़ौले सदीद शब्द का इस्तेमाल किया और फ़रमाया ईमान वालों अल्लाह से डरो और सीधी बात करो ताकि वह तुम्हारे आमाल में सुधार पैदा कर दे और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर दे। (सूरए अहज़ाब, आयत 70), यानी हक़ और सच्ची बात करो और बेहूदा बातों से परहेज़ करो, कहीं पर क़ौले करीम शब्द का इस्तेमाल किया और फ़रमाया उनसे हमेशा सम्मानजनक तरीक़े से बातचीत करते रहना। (सूरए इसरा, आयत 23), कहीं पर क़ौले मैसूर का प्रयोग किया और फ़रमाया उनसे नर्म अंदाज़ में बातचीत करना। (सूरए इसरा, आयत 28), कहीं पर क़ौले लय्यिन का इस्तेमाल करते हुए फ़रमाया उनसे नर्मी से बात करना। (सूरए ताहा, आयत 44), कहीं पर क़ौले अहसन का प्रयोग करते हुए फ़रमाया और मेरे बंदों से कह दीजिए कि केवल अच्छी बातें किया करें। (सूरए इसरा, आयत 53), तो अब अगर सच में कोई यह चाहता है कि उसकी बातचीत में असर रहे और लोग उसकी बातों को मानें तो उसे चाहिए कि क़ुर्आन के फ़ार्मूले पर अमल करे, अब ज़ाहिर सी बात है कि जब इंसान बातचीत करेगा और मौक़े की नज़ाकत और हालात की गंभीरता को नहीं समझेगा कि कौन सी बात कब और कहां करना है तो फ़ितना और फ़साद पैदा होगा, क़ुर्आन ने तो बहस करने का अंदाज़ भी बताते हुए फ़रमाया उनसे इस तरह बहस करें जो बेहतरीन तरीक़ा है। (सूरए नहल, आयत 125), जब क़ुर्आन ने बहस करने के बारे में इतनी संवेदनशीलता बरती है तो फिर आम बातचीत में कितना संभल कर बोलना और बातचीत करना चाहिए....., इमाम रज़ा अ.स. ने पैग़म्बर स.अ. से नक़्ल किया है कि आपने फ़रमाया तुम में सबसे बेहतर वह है जो अपनी बातचीत को पाकीज़ा बनाए। (उयूनो अख़बारिर रज़ा अ.स., जिल्द 2, पेज 65)

और अगर हम ध्यान दें तो हमको पता चलेगा कि ज़ुबान और अक़्ल का आपस में बहुत गहरा संबंध है, ज़्यादातर हदीसों में अक़्ल के साथ ज़ुबान का ज़िक्र हुआ है, इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि जब अक़्ल मुकम्मल होती है तो बातें कम हो जाती हैं। (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 71), यानी अक़्लमंद इंसान सोंच समझ कर बोलता है, अधिकतर हम लोग बिना सोचे समझे जो चाहे बोल देते हैं और उसके अंजाम और नतीजे की परवाह नहीं करते और बाद में अपमानित और ज़लील होते हैं।

इमाम अली अ.स. ने दूसरी जगह पर फ़रमाया अक़्लमंद की ज़ुबान उसके दिल के पीछे रहती है और अहमक़ और बेवक़ूफ़ का दिल उसकी ज़ुबान के पीछे रहता है। (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 40), सैयद रज़ी र.ह. लिखते हैं कि यह बहुत अजीब और बहुत दिलचस्प क़ौल है, जिसका मतलब यह है कि अक़्लमंद इंसान सोंचने और समझने के बाद बोलता है और अहमक़ और बेवक़ूफ़ इंसान बिना सोंचे समझे जो मुंह में आया कह देता है, यानी अक़्लमंद की ज़ुबान उसके दिल की पैरवी करती है और बेवक़ूफ़ का दिल उसकी ज़ुबान का पाबंद होता है, इसी चीज़ को इमाम अ.स. ने दूसरी तरह से भी बयान फ़रमाया कि बेवक़ूफ़ का दिल उसके मुंह के अंदर रहता है और अक़्लमंद की ज़ुबान उसके दिल में रहती है। (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 41), एक दूसरी जगह पर इमाम अ.स. फ़रमाते हैं कि तुम्हारे द्वारा बोले जाने वाले शब्द तुम्हारे क़ब्ज़े में है जब तक तुम्हारी ज़ुबान से निकलते नहीं, लेकिन तुम्हारे मुंह से निकलने के बाद तुम अपने शब्दों और उस बात के क़ब्ज़े में चले जाते हो, इसलिए अपनी ज़ुबान को वैसे ही महफ़ूज़ रखो जैसे सोने और चांदी की हिफ़ाज़त करते हो, क्योंकि कुछ बातें और शब्द नेमतों को छीन लेते हैं और अज़ाब का हक़दार बना देते हैं। (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 381)

एक और जगह पर आप फ़रमाते हैं कि जो बात नहीं जानते हो उसे ज़ुबान से मत निकालो बल्कि हर वह बात जिसे जानते हो उसे भी मत बयान करो, क्योंकि अल्लाह ने जिस्म के हर अंग की कुछ ज़िम्मेदारियां रखी हैं और उन्हीं ज़िम्मेदारियों द्वारा क़यामत के दिन हुज्जत क़ायम करने वाला है। (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 382)

पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया ख़ामोशी सोना है, बातचीत और कलाम करना चांदी है। (मुस्तदरकुल वसाएल, जिल्द 9, पेज 16)

इमाम सज्जाद अ.स. से हदीस में नक़्ल हुआ है कि हर सुबह इंसान की ज़ुबान जिस्म के सारे अंगों से उनके हालचाल पूछती है कि तुम सब कैसे हो, सब मिल कर जवाब देते हैं कि अगर तुम हम लोगों को हमारे हाल पर छोड़ दो यानी हमारे हाल पर रहम करो तो हम ख़ैरियत से रहेंगे, और उसके बाद ज़ुबान को अल्लाह का वास्ता और क़सम दे कर कहते हैं कि हम तुम्हारी वजह से सवाब और अज़ाब के हक़दार बनेंगे। (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, किताबुल ईमान वल कुफ़्र, पेज 94)

पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया अल्लाह ज़ुबान को ऐसा अज़ाब देगा जो जिस्म के किसी दूसरे अंग को नहीं देगा, ज़ुबान कहेगी मेरे अल्लाह तूने मुझे ऐसा अज़ाब क्यों दिया जो दूसरे अंगों को नहीं दिया, तो उससे कहा जाएगा कि तूने एक जुमला कहा जो ज़मीन की पूर्वी और पश्चिमी दिशा तक पहुंचा और उसकी वजह से मासूम का ख़ून बहाया गया, क़ीमती माल लूटा गया, नामूस की हुरमत पामाल हुई, अपनी इज़्ज़त और बुज़ुर्गी की क़मस खा कर कहता हूं कि तुझे ऐसा अज़ाब दूंगा तो जिस्म के किसी अंग को नहीं दूंगा। (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 95)

इसलिए आयतों और हदीसों को पढ़ने के बाद यह नतीजा निकाला जा सकता है कि इंसान के जिस्म में जिस चीज़ पर क़ाबू और कंट्रोल करने की तरफ़ सबसे ज़्यादा ध्यान दिलाया गया है वह उसकी ज़ुबान है, इंसान जब भी बोले तो बात करने का अंदाज़ बहुत ही बेहतर और मुनासिब हो, और बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं कि हर जगह बोले ही, कुछ जगहों पर न बोलना भी एक तरह की बसीरत और अक़्लमंदी है।

अगर हर इंसान इस बात का ख़्याल रखे तो हमारे समाज में फ़ितना और फ़साद कम हो जाएगा, आज के मौजूदा हालात को अगर देखा जाए तो हमको पता चलेगा कि जो हर तरफ़ फ़ितना, फ़साद और हत्याएं हो रही हैं उसकी सबसे बड़ी वजह भड़काऊ बयान और उल्टी सीधी बातें और बिना सोंचे समझे मुंह खोलना है, चाहे वह दीन और धर्म के नाम पर हो या जातिवाद के नाम पर हो।

हमारी और हमारे समाज की भलाई इसी में है कि जब हम बोलें तो समझ लें कि क्या बोल रहे हैं और उसका नतीजा बाद में क्या होगा, हो सकता है कि शायद बोलने ही की वजह न हो और हमारे ख़ामोश रहने ही में भलाई हो।

आख़िर में अल्लाह से यही दुआ है कि अल्लाह हमें मोहम्मद स.अ. और आले मोहम्मद अ.स. के वसीले से हमें तौफ़ीक़ अता करे कि हमारे अंदर इतनी समझ पैदा हो जाए कि हम समझ सकें कि हमें क्या बोलना है और कैसे बोलना है ताकि ज़ुबान से पैदा होने वाले फ़ितने, फ़साद और ख़राबियों से महफ़ूज़ रह सकें।



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