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ज़ियारते आशूरा की करामात

इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स.ने फ़रमाया: ऐ अलक़मा जब तुम इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत पढ़ना चाहो तो दो रकत नमाज़ अदा करो, तकबीर के बाद कर्बला की तरफ़ इशारा कर के ज़ियारते आशूरा को पढ़ो।

विलायत पोर्टल :हम इस लेख में केवल तीन रिवायतें ज़ियारते आशूरा की फ़ज़ीलत और करामत के सिलसिले में आपके सामने पेश कर रहे हैं।
पहली रिवायत:
शैख़ तूसी र.अ. अपनी किताब मिस्बाहुल मुतहज्जिद में मोहम्मद इब्ने इस्माईल इब्ने बज़ी से और सालेह इब्ने अक़्बा से और वह अपने बाप से और वह इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स. से रिवायत नक़्ल करते हैं कि आपने फ़रमाया: जो शख़्स आशूर के दिन इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत करे और उनकी क़ब्र पर बैठ कर आंसू बहाए क़यामत के दिन अल्लाह उसे दो हज़ार हज, दो हज़ार उमरे और दो हज़ार जिहाद का सवाब देगा, और वह भी ऐसे हज, उमरे और जिहाद जो पैग़म्बर स.अ. और इमामों के साथ अंजाम दिए गए हों।
रावी कहता है: मैंने पूछा कि मेरी जान आप पर फ़िदा हो वह आदमी जो किसी दूसरे शहर या देश में रहता है और आपकी क़ब्र तक नहीं पहुंच सकता वह क्या करे?
इमाम अ.स. ने फ़रमाया: अगर ऐसा हो तो सहरा या अपने घर की छत पर जाए और इमाम हुसैन अ.स. की क़ब्र की तरफ़ इशारा कर के सलाम करे और उनके क़ातिलों पर लानत करे उसके बाद दो रकत नमाज़ पढ़े और इस अमल को ज़ोहर से पहले अंजाम दे और उनकी मुसीबत पर आंसू बहाए और किसी का डर न हो तो अपने ख़ानदान वालों को भी उन पर रोने का हुक्म दे और अपने घर में मजलिस बरपा करे और इमाम हुसैन अ.स. की मज़लूमी को याद करे और एक दूसरे को ताज़ियत पेश करे, मैं ज़मानत देता हूं जो शख़्स इस अमल को अंजाम देगा अल्लाह उसे वही सवाब अता करेगा जो इमाम की क़ब्र पर हाज़िर हो कर ज़ियारत करने वाले को अता करता है।
फिर आपने फ़रमाया: उस दिन काम के लिए बाहर मत जाओ यह दिन नहस है और उस दिन किसी मोमिन की हाजत पूरी नहीं होती और अगर पूरी हो तो उसमें बरकत नहीं होती।
तुम में से कोई भी अपने घर में कोई भी सामान इकठ्ठा न करे अगर किसी ने ऐसा किया तो उसमें बरकत नहीं होगी, और जिसने इस बात पर अमल किया उसे हज़ार हज हज़ार उमरे और हज़ार जिहाद का सवाब मिलेगा और उसे पैग़म्बर स.अ. के साथ अंजाम देने का सवाब मिलेगा, और दुनिया के वजूद में आने से लेकर अब तक जितने भी लोग अल्लाह की राह में नबी, रसूल और उनके जानशीन शहीद हुए हैं उन सबका सवाब मिलेगा।
दूसरी रिवायत:
सालेह इब्ने अक़्बा और सैफ़ इब्ने उमैरा नक़्ल करते हैं कि अलक़मा इब्ने मोहम्मद अल-ख़ज़रमी ने कहा: मैंने इमाम मोहम्मद बाक़िर से कहा कि मुझे एक ऐसी दुआ की तालीम दीजिए कि अगर क़रीब से कर्बला वालों की ज़ियारत करूं तब भी उसे पढूं और अगर दूर से ज़ियारत करूं तब भी उस दुआ को पढ़ सकूं....
इमाम ने फ़रमाया: ऐ अलक़मा जब तुम ज़ियारत पढ़ना चाहो तो दो रकत नमाज़ अदा करो, तकबीर के बाद कर्बला की तरफ़ इशारा कर के इस ज़ियारत यानी ज़ियारते आशूरा को पढ़ो।
अगर तुमने इस ज़ियारत को पढ़ा और दुआ की जिसे फ़रिश्ते भी पढ़ते हैं तो अल्लाह एक लाख नेकियां तुम्हारे आमाल नामे में लिखेगा और तुम उस शख़्स की तरह हो जाओगे जो इमाम हुसैन अ.स. के साथ शहीद हुआ हो और तुम्हारे लिए हर पैग़म्बर और रसूल और हर ज़ायर का सवाब जिसने इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की लिखा जाएगा।
ज़ियारत को नक़्ल करने के बाद अलक़मा कहता है कि इमाम बाक़िर अ.स. ने मुझ से कहा कि कि अगर हर दिन इस ज़ियारत को अपने घर ही में पढ़ो तो यह सारा सवाब तुमको मिल जाएगा।
तीसरी रिवायत:
शैख़ ने मिस्बाह में मोहम्मद इब्ने ख़ालिद तयालिसी से और वह सैफ़ इब्ने उमैरा से नक़्ल करते हैं कि उन्होंने कहा कि इसके बाद कि इमाम सादिक़ अ.स. हैरह से मदीना तशरीफ़ लाए हम सफ़वान इब्ने मेहरान और कुछ दूसरे असहाब के साथ नजफ़ चले गए, इमाम अली अ.स. की ज़ियारत कर के जब वापस हरम से निकले तो सफ़वान ने कर्बला का रुख़ किया और हमसे कहा कि यहीं से इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत करो, क्योंकि एक बार मैं इमाम सादिक़ अ.स. के साथ था उन्होंने यहीं से इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की थी।
उसके बाद ज़ियारते आशूरा पढ़ना शुरू किया और ज़ियारत की नमाज़ अदा करने के बाद दुआए अलक़मा जो ज़ियारते आशूरा के बाद पढ़ी जाती है उसे पढ़ा।
सैफ़ इब्ने उमैरा कहते हैं कि मैंने सफ़वान से कहा जब अलक़मा इब्ने मोहम्मद ने ज़ियारते आशूरा को हमारे लिए नक़्ल किया इस दुआ को नहीं बताया, सफ़वान ने कहा इमाम सादिक़ अ.स. के साथ हम यहां पर आए जब आपने ज़ियारते आशूरा और दो रकत नमाज़ के साथ यह दुआ भी पढ़ी थी।
उसके बाद इमाम ने मुझसे कहा था कि ऐ सफ़वान इस ज़ियारत और इस दुआ को मत भूलना इसको पढ़ते रहना, मैं ज़िम्मेदारी लेता हूं जिसने भी इस ज़ियारत और दुआ को क़रीब या दूर से पढ़ा उसकी ज़ियारत क़बूल होगी और उसका सलाम उन तक पहुंच जाएगा और उसकी हाजत अल्लाह की बारगाह में पूरी होगी और वह जिस मक़ाम तक भी पहुंचना चाहता है वहां पहुंच जाएगा।
ऐ सफ़वान! मैंने इस ज़ियारत को इसी ज़िम्मेदारी के साथ अपने वालिद से लिया है और उन्होंने अपने वालिद से इमाम सज्जाद अ.स. से और इसी तरीक़े से इमाम अली अ.स. ने पैग़म्बर स.अ. से और उन्होंने जिबरील से और जिबरील ने अल्लाह से इसी ज़िम्मेदारी और गारंटी के साथ लिया है, और अल्लाह ने अपनी ज़ात की क़सम खाई है कि जो शख़्स इमाम हुसैन अ.स. की दूर या क़रीब से ज़ियारत करेगा और उसके बाद यह दुआ पढ़ेगा उसकी ज़ियारत क़बूल करूंगा और उसकी हाजत को पूरा करूंगा।
उसके बाद सफ़वान कहते हैं कि इमाम सादिक़ अ.स. ने मुझसे फ़रमाया कि: जब भी कोई ज़रूरत हो तो चाहे जहां भी हो इस ज़ियारत को पढ़ो और अपनी हाजत को अल्लाह से मांगो वह पूरी करेगा, अल्लाह और उसका रसूल कभी वादा ख़िलाफ़ी नहीं करते।

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