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एकता को लेकर अहलेबैत अ.स. की अपने शियों को वसीयतें

अहलेबैत अ.स. ने शियों को अहले सुन्नत के साथ विशेष तौर पर तक़वा का ख़्याल रखने की वसीयत की है, आप फ़रमाते हैं कि: "उनके बीमारों की अयादत के लिए जाओ, उनके जनाज़े में शामिल हो, उनकी मस्जिदों में उनके साथ नमाज़ अदा करो"

विलायत पोर्टल :

**सारे इंसानों से अच्छा सुलूक

अहलेबैत अ.स. हमेशा अपने शियों को दूसरे इस्लामी फ़िरक़ों की पैरवी करने वालों के साथ अच्छा रवैया बरतने की बात करते थे, और उनकी ख़ुद की सीरत भी इसी तरह थी, इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स. ने फ़रमाया: अगर कहीं पर तुम्हारा साथ यहूदी के साथ हो जाए तो उससे भी अच्छा बर्ताव करो, इसी तरह इमाम अली अ.स. अपनी ज़िंदगी में सभी अहले किताब चाहे यहूदी हों या ईसाई सबके साथ अच्छा व्यवहार करते थे, जिसका नतीजा कभी कभी यह होता था कि बहुत सारे यहूदी और ईसाई आपका बर्ताव देख कर इस्लाम क़बूल कर लेते थे, अगर कोई शख़्स अहलेबैत अ.स. के दूसरे मज़हब के साथ सुलूक पर रिसर्च करना चाहे तो अच्छी ख़ासी किताबें तैयार हो सकती हैं। 

क़ुरआन और अहलेबैत अ.स. की तालीमात के मुताबिक़ एक मुसलमान को सारे इंसानों के साथ अच्छा और व्यवहार करना चाहिए और एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए इसलिए कि क़ुरआन में साफ़ शब्दों में हुक्म है कि "इंसानों से नर्म रवैये से बात करो" 

(सूरए बक़रह, आयत 83)।

अल्लाह ने इस आयत में यह नहीं कहा केवल मोमेनीन से या केवल मुसलमानों से नर्म लहजे और अच्छे रवैये से बात करो बल्कि जिस शब्द का इस्तेमाल किया है उसमें शिया, सुन्नी, हिंदू, यहूदी, ईसाई, सिख सभी धर्म और जाति के लोग शामिल हैं। 

इस आयत के बारे में इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं कि: आयत का मतलब यह है कि तुम जिस तरह और जिस लहजे में चाहते हो लोग तुमसे बात करें तुम भी उसी लहजे में बात करो और वैसा ही व्यवहार करो। 

इसी तरह इमाम सादिक़ अ.स. ने फ़रमाया: हमारे लिए इज़्ज़त और सम्मान का कारण बनो अपमान और ज़िल्लत का नहीं, लोगों से अच्छे और नर्म लहजे में बातें करो और अपनी ज़ुबान को बुरी बातों से बचाओ और बेहूदा और फ़ुज़ूल की बातों से बचो।

अहलेबैत अ.स. ने शियों को अहले सुन्नत के साथ विशेष तौर पर तक़वा का ख़्याल रखने की वसीयत की है, आप फ़रमाते हैं कि: "उनके बीमारों की अयादत के लिए जाओ, उनके जनाज़े में शामिल हो, उनकी मस्जिदों में उनके साथ नमाज़ अदा करो" ख़ुद अहलेबैत अ.स. का उनकी अपनी ज़िंदगी में यही तरीक़ा रहा है, एक हदीस में यह भी है कि जो भी इस तरीक़े पर अमल न करे अहलेबैत अ.स. उससे उससे दूरी बना लेते हैं और उसे अपना शिया नहीं मानते।

एक सहीह हदीस में इमाम सादिक़ अ.स. से नक़्ल हुआ है कि जो शख़्स इत्तेहाद की ख़ातिर अहले सुन्नत की पहली सफ़ में खड़े होकर नमाज़ अदा करे वह उस शख़्स की तरह है जिसने पैग़म्बर स.अ. के पीछे नमाज़ अदा की हो, इस रिवायत से ज़ाहिर है कि अहले सुन्नत के साथ नमाज़ अदा करना न केवल जाएज़ है बल्कि बहुत ज़्यादा सवाब भी रखता है, और भी इस तरह की कई रिवायतें हैं जिनकी बुनियाद पर हमारे मराजे ने फ़तवे दिए हैं।

दूसरों के मुक़द्दसात को बुरा भला कहने से मना करना

इस बात का तजुर्बा किया जा चुका है कि दूसरों के मुक़द्दसात को बुरा भला कह कर उन्हें गाली देकर गुमराहों की कभी भी न केवल हिदायत नहीं हुई बल्कि उनके अंदर ज़िद पैदा हो गई है और उसके बाद वह विरोध पर उतर आए हैं, इसी वजह से अहलेबैत अ.स. अपने शियों को याद दिलाते थे कि अल्लाह ने उसके न मानने वालों को भी गाली देने और बुरा भला कहने से मना किया है जैसाकि क़ुरआन में इरशाद है कि: "उन लोगों के ख़ुदाओं को जो अल्लाह के अलावा किसी और को अपना ख़ुदा मानते हैं उन्हें गाली मत दो, कहीं ऐसा न हो वह तुम्हारे ख़ुदा को अनजाने में गाली दे बैठें"। (सूरए अनआम, आयत 108)

इसलिए गाली और बुरा भला कहने से बचना क़ुरआनी और इस्लामी उसूल है जिस पर पैग़म्बर स.अ. और अहलेबैत अ.स. ने बहुत ताकीद की है।

सिफ़्फ़ीन की जंग में इमाम अली अ.स. के चाहने वालों ने अपने मुक़ाबले पर जंग करने वालों को गाली दी तब आपने फ़रमाया: मैं इस बात को सही और मुनासिब नहीं समझता कि अपने दुश्मन को गालियां या बद दुआ देने वाले बन जाओ, उन्हें बुरा भला कहो या उनसे नफ़रत करने वाले बन जाओ, लेकिन अगर कोई इंसानियत के विरुद्ध काम करे या नैतिक मूल्यों को रौंद डाले तो उसकी उस बुराई को सबके सामने बयान कर सकते हो।

इसलिए बुरा भला न कहने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है वह इंसान जिसकी नज़र में इंसानियत की कोई क़ीमत न हो या वह वह इंसान जिसके नज़दीक नैतिकता का कोई सम्मान न हो उसकी इस हरकत पर भी चुप रहो, नहीं! उसकी इस हरकत को सारी दुनिया के सामने ज़ाहिर करना ज़रूरी है।

एक और रिवायत में शियों को पैग़ाम दिया गया है कि: अल्लाह को हमेशा ध्यान में रखो और जिसके साथ भी दोस्ती करो उसके साथ अच्छे रवैये से पेश आओ, पड़ोसियों का ख़्याल रखो और अमानत को उसके मालिक तक पहुंचाओ, लोगों को सुवर मत कहो, अगर हमारे चाहने वाले और हमारे शिया हो तो जैसे हम बातचीत करते हैं जैसा हमारा रवैया है वैसा ही अपनाओ ताकि हक़ीक़त में हमारे शिया कहलाओ।

इन रिवायतों से साफ़ ज़ाहिर है कि उस दौर में कुछ लोग ऐसे थे जो दूसरे मज़हब और दूसरे धर्म के मानने वालों को बुरा भला कहते थे और उनके साथ बुरा व्यवहार करते थे, पैग़म्बर स.अ. और अहलेबैत अ.स. ने इस हरकत का कड़े शब्दों में विरोध करते हुए आपसी भाईचारे को बाक़ी रखने का हुक्म दिया है।

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