Code : 814 26 Hit

एकता की अहमियत क़ुर्आन और हदीस की रौशनी में (2)

दारुल तक़रीब बैनल मज़ाहिबिल इसलामिय्यह (मुसलमानों को आपस में क़रीब करने का सेंटर) के संस्थापक मरहूम शैख़ मोहम्मद तक़ी जो महान आयतुल्लाह बुरूजर्दी के फ़ैज़िया मदरसे में उत्तराधिकारी भी थे वह कहते थे कि इस सेंटर के बनाने का लक्ष्य फ़िर्क़ों को नज़दीक लाना है इसका लक्ष्य सारे फ़िर्क़ों को ख़त्म करके केवल एक फ़िर्क़ा बनाना बिल्कुल नहीं है

विलायत पोर्टलः: एकता का मतलब बिल्कुल भी यह नहीं कि सारे फ़िर्क़े वाले अपना फ़िर्क़ा छोड़ दें और न ही इसका मतलब यह है कि दूसरे सभी फ़िर्क़ों को ख़त्म कर दिया जाए, और न ही मतलब यह है कि अशअरी फ़िर्क़े की जगह मोतज़ेला को कर दिया जाए या सुन्नी सब शिया हो जाएं या मोतज़ेला वाले अशअरी विचारों को मान लें और शिया सारे सुन्नी हो जाएं, यह काम न केवल कठिन बल्कि ना मुमकिन है।
बल्कि एकता का मतलब यह है कि जितने भी फ़िर्क़े हैं वह सब समानताओं को ध्यान मे रखते हुए सारे मुसलमानों को एक समान समझते हुए जिन लोगों ने इस्लाम से दुश्मनी की क़सम खाई है उनके विरुध्द एकता बनाए रखें।
दारुल तक़रीब बैनल मज़ाहिबिल इसलामिय्यह (मुसलमानों को आपस में क़रीब करने का सेंटर) के संस्थापक मरहूम शैख़ मोहम्मद तक़ी जो महान आयतुल्लाह बुरूजर्दी के फ़ैज़िया मदरसे में उत्तराधिकारी भी थे वह कहते थे कि इस सेंटर के बनाने का लक्ष्य फ़िर्क़ों को नज़दीक लाना है इसका लक्ष्य सारे फ़िर्क़ों को ख़त्म करके केवल एक फ़िर्क़ा बनाना बिल्कुल नहीं है, इसका मतलब यह हुआ कि ऐसा नहीं है कि यह कहा जा रहा हो कि शिया अपने अक़ीदे और विचारों को छोड़ दें और सुन्नी अपने अक़ीदों से मुंह मोड़ लें।
सभी फ़िर्क़ों का आपस में एक दूसरे से दूरी का कारण एक दूसरे के बुनियादी विचारों का सही न मालूम होना है, इस सेंटर के बनाने का मतलब यही है कि हर फ़िर्क़े के लोग अपने अक़ीदों और विचारों के साथ वहां आएं और अपने विचारों को पेश करें, एक दूसरे के अक़ीदों का सम्मान करते हुए जिन अक़ीदों और विचारों में मतभेद पाया जाता हो आपस में बातचीत कर के हल करने की कोशिश करें, जिस से वह एक दूसरे के विचारों के बारे में जानकारी भी हासिल कर सकें, और ऐसा करने से शिया फ़िर्क़े का सबसे अधिक फ़ायदा है।
जैसाकि 24 जून 2001 को लंदन में ANN टी.वी. चैनल पर इसी विषय कि सभी इस्लामी फ़िर्क़ों के आपस में क़रीब होने और आपसी एकता पर कुछ ईरानी, लेबनानी, मिस्री और इंग्लैंड के उलमा ने फ़ोन द्वारा कांफ़्रेंस में ( जिसमें मिस्र की अल-अज़हर विश्वविधालय के उपाध्यक्ष भी थे ) कहा कि सभी फ़िर्क़ों के करीब आने का मतलब यह नहीं कि सब अपने अपने मज़हब को छोड़ कर किसी एक मज़हब की पैरवी करने लगें, क्योंकि ऐसा करने से क़रीब आने के बजाए और दूर हो जाएंगे, फ़िर्क़ों को क़रीब लाने पर होने वाली चर्चा को तर्कसंगत और इल्मी होना चाहिए और इल्मी और तर्क के आधार पर होने वाली चर्चा को सभी को मानना चाहिए, क्योंकि इल्मी बातों से ही बिदअत और अंधविश्वास जैसी बीमारियों को दूर किया जा सकता है, और हर फ़िर्क़े के आलिम को चाहिए शांति के माहौल को रखते हुए आपस में बात करे, और कोशिश रहे कि ऐसी बात हो और ऐसी चर्चा हो जिसका सकारात्मक नतीजा निकले।


 

0
शेयर कीजिए
फॉलो अस
नवीनतम