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इस्लाम में रिश्तों की अहमियत

हमारे समाज में दिन प्रतिदिन रिश्तों की अहमियत कम होती जा रही है, जबकि रिश्तों की मज़बूती समाज को काफ़ी प्रभावित करती है और ख़ुद इंसान और समाज को और आगे की ओर ले जाती है, क्योंकि किसी भी समाज की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है कि हर इंसान अपने परिवार से शुरूआत इस तरह शुरूआत करे कि परिवार में मौजूद रिश्तेदारों की आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक मदद करे, तभी जाकर पूरा समाज इस मिशन में जुड़ पाएगा और पूरा समाज तरक़्क़ी के रास्ते पर आ सकेगा

विलायत पोर्टलः क़ुर्आन ने दो तरह के बुनियादी रिश्ते बयान किए हैं पहला ख़ूनी रिश्ता दूसरा शादी के बाद बनने वाले सुसराली रिश्ते, जैसाकि सूरए फ़ुरक़ान की आयत नं. 54 में इशारा मौजूद है।

इसके अलावा अल्लाह ने इन्ही दोनों रिश्तों को विस्तार से कई सूरों में बयान किया है, जिसमें भाई बेटे बहन चचा फ़ुफ़ी और दूसरी रिश्तेदारियों की ओर इशारा किया है जिसको आप इन सूरों में देख सकते हैं। सूरए तहरीम, आयत 6, सूरए अनफ़ाल, आयत 41-75, सूरए अहज़ाब, आयत 6, सूरए मोहम्मद, आयत 22, सूरए मुमतहेना, आयत 3, सूरए बक़रा, पेज 83-177, सूरए निसा, आयत 36, सूरए नहल, आयत 90, सूरए तौबा, आयत 24, सूरए शोरा, आयत 214, इसके अलावा भी और बहुत सी आयतें हैं जिसमें रिश्तों की अहमियत और रिश्तों के निभाने पर काफ़ी ज़ोर दिया गया है।

रिश्ते निभाना क्यों ज़रूरी हैं

हमारे समाज में दिन प्रतिदिन रिश्तों की अहमियत कम होती जा रही है, जबकि रिश्तों की मज़बूती समाज को काफ़ी प्रभावित करती है और ख़ुद इंसान और समाज को और आगे की ओर ले जाती है, क्योंकि किसी भी समाज की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है कि हर इंसान अपने परिवार से शुरूआत इस तरह शुरूआत करे कि परिवार में मौजूद रिश्तेदारों की आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक मदद करे, तभी जाकर पूरा समाज इस मिशन में जुड़ पाएगा और पूरा समाज तरक़्क़ी के रास्ते पर आ सकेगा, यही वजह है कि अक़्ल और दुनिया का हर अक़्लमंद इस बात को क़ुबूल करता है कि रिश्तेदारों से अच्छे संबंध बनाए रखना और एक दूसरे से मुलाक़ात करते रहने और रिश्तेदारों की हर तरह से सहायता करते रहने से ख़ुद परिवार और रिश्तेदारों के आपसी संबंध मज़बूत होंगे जिसके नतीजे में अच्छा समाज सामने आएगा।

रिश्तेदारी निभाने के फ़ायदे

हम यहां पर रिश्तेदारी निभाने यानी परिवार से जुड़े सदस्यों और दूर और क़रीब के रिश्तेदारों से हर कुछ समय पर मुलाक़ात करना और जहां तक मुमकिन हो उनकी समस्याओं को जानना और हल करना, इसके उन फ़ायदों को आपके सामने बयान कर रहे हैं जिसको सभी पढ़े लिखे और सभ्य लोगों ने स्वीकार किया है।

हमारा रिश्तेदारों से मिलने जुलने से हमारा अकेलापन दूर होगा और हमारे दिलों में एक दूसरे के प्रति सम्मान और आपसी मोहब्बत बढ़ेगी, और जब एक दूसरे से मिले जुलेंगे और एक दूसरे की समस्याओं को सुनेंगे और हल करेंगे इसके नतीजे में एक दूसरे के महत्व को समझेंगे, यही अगर हम अकेले केवल ख़ुद के बारे में सोंचते रहें तो हमें अपने महत्व और अहमियत का अंदाज़ा ख़ुद नहीं होगा, और कभी कभी देखा गया है कि इसी रिश्तेदारों से मिलने जुलने से मानसिक तनाव और गंभीर चिंताएं भी ख़त्म हो जाती हैं, और हर इंसान के जीवन में ऐसी मोड़ ज़रूर आती है जिस समय उसे उसके अपनों की ज़रूरत होती है इसलिए अलग थलग रहने वाला इंसान ज़रूरत के समय अपनों को न पा कर कभी कभी ऐसा बिखर जाता है कि फिर दोबारा या अपने को वापस उसी हालत पर नहीं ला पाता या वापस लाने में काफ़ी समय लग जाता है, इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि कोई भी इंसान नहीं कह सकता कि उसे रिश्तेदारों की ज़रूरत नहीं है क्यों कि रिश्तेदार ही तो हैं जो उसके बुरे समय में हाथ से, ज़बान से और दूसरे तरीक़ों से मदद कर सकें। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुतबा 23) 

रिश्तेदारों से दूरी बनाए रहने का बड़ा नुक़सान यह है कि इंसान के दिलों में तरह तरह के विचार पैदा होने लगते हैं, जैसे यह कि लोग मेरे पास नहीं आते, मेरा सम्मान नहीं करते, मेरे साथ ग़ैरों जैसा बर्ताव करते हैं और भी इसी तरह के दूसरे विचार.... जबकि वह ख़ुद सबसे अलग रहता है लेकिन सोंचता यह है कि लोग हमारे साथ ऐसा कर रहे हैं, इसी तरह वह धीरे धीरे लोगों को अपना दुश्मन समझने लगता है और उसका मानसिक तनाव बढ़ता रहता है।

यही कारण है कि अल्लाह ने क़ुर्आन में रिश्तेदारी ख़त्म करने वालों को नुक़सान उठाने वाला बताया है, साथ यह भी ऐलान किया कि अगर तुमने अपने रिश्तेदारों से रिश्ते तोड़ दिए तो अब केवल ज़मीन पर फ़ितने और फ़साद का इंतेज़ार करो, और साथ ही अल्लाह ने रिश्ते तोड़ देने वालों को अपनी रहमत से दूर रखने का भी ऐलान करते हुए उनको अधा और बहरा बताया है। (सूरए मोहम्मद, आयत 22-23)
 मासूमीन अ.स. से नक़्ल होने वाली हदीसों में भी रिश्तों की अहमियत, रिश्ते निभाने के फ़ायदे और रिश्ते तोड़ने के नुक़सान को विस्तार से और ज़ोर दे कर बयान किया है, जैसाकि आप इन किताबों में पढ़ सकते हैं। (बिहारुल अनवार, जिल्द 74, पेज 88-89-91-100, अल-काफ़ी, शैख़ कुलैनी, जिल्द 2, पेज 152, अल-ख़ेसाल, इब्ने बाबवैह, पेज 156, तफ़सीरे अल-अय्याशी, अय्याशी, जिल्द 2, पेज 220)

रिश्तेदारी न निभाने के नुक़सान

हदीसों में रिश्ते तोड़ने और रिश्तेदारी न निभाने के कुछ नुक़सान तो ऐसे बताएं हैं जिसको पढ़ कर रूह कांप उठती है, जैसे रिश्ते तोड़ने का नुक़सान पूरे पूरे शहर और उसकी आबादी की वीरानी बताई है (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 347) ज़ाहिर है जब कोई किसी से संबंध नहीं रखेगा, न किसी के अच्छे बुरे समय में शामिल होगा, न किसी की कोई मदद करेगा न किसी से कोई मदद चाहेगा तो ऐसे घुटन का माहौल पैदा होगा जिसका नतीजा वीरानी और तबाही ही हो सकता है।

इसी तरह हदीस में आया है कि सब से रिश्तेदारी को तोड़ कर अलग थलग रहने वाले के आमाल क़ुबूल नहीं होंगे। (अल-ख़ेसाल, पेज 152)

कुछ हदीसों में उम्र के कम होने का कारण भी बताया गया है जैसे अल-काफ़ी, जिल्द 2, पेज 153।

रिश्तेदारी निभाने का मतलब केवल रिश्तेदारों के घर आना जाना ही नहीं है बल्कि कई चीज़े हैं जो रिश्तेदारी निभाना कहलाती हैं, जैसे सलाम दुआ करते रहना (काफ़ी, जिल्द 2, पेज 636) तोहफ़ा देना (अल-जाफ़रिय्यात, इब्ने अशअस, पेज 153) शादी ब्याह और मरने जीने में आना जाना (काफ़ी, जिल्द 2, पेज 636)

और भी बहुत से रास्ते हैं रिश्तेदारी निभाने के जिनतो हदीसों में बयान किया गया है।


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