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इस्राईल और सऊदी दोस्ती का इतिहास

सऊदी की राजनीति कभी आज़ाद नहीं रही बल्कि आले सऊद ने हमेशा अपने इलाक़े में अमेरिका और यूरोपीय ताक़तों की पॉलिसियों की पैरवी की है जिसका सीधा मतलब यह होता है कि वहां की सत्ता में सऊदी का किरदार केवल एक विध्वंसक (ख़राबी फैलाने वाला) है जिसका साफ़ सबूत ईराक़, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बहरैन, लेबनान और यमन में फैलाई गई अशांति और संकट में सऊदी का हाथ होना है

विलायत पोर्टलः इस्राईल के निर्माण से ही सऊदी के साथ उसके गहरे राजनयिक संबंध हो गए थे, सऊदी और इस्राईल के बीच यह संबंध सन् 1961 में अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुके थे इसी वजह से मिस्र में जमाल अब्दुल नासिर जैसे इंक़ेलाबी लीडर के सत्ता में आने के बाद मिस्र और सऊदी के संबंधों में तनाव की स्थिति पैदा हो गई और यह तनाव सन् 1964 तक जारी रहा, दूसरी ओर मिस्र ने उस दौरान यमन में भरपूर राजनीतिक गतिविधियां शुरू कीं ताकि बाबुल मुंदिब और मध्य पूर्व में सऊदी के प्रभाव को कम कर सके, उधर सऊदी की पूरी कोशिश इस बात के लिए जारी रही कि जितना हो सके इस्राईल विरोधी ताक़तों को कमज़ोर किया जाए ताकि इस्राईल को कोई ख़तरा न हो, सऊदी और मिस्र के बीच यह तनावपूर्ण स्थिति सन् 1970 में जमाल अब्दुल नासिर के मरने के बाद अनवर सादात के दौर में भी जारी रही, चूंकि इस दौरान अरब देशों की लीडरशिप मिस्र के हाथों में थी और मिस्र ने पूरी तरह इस्राईल के विरुध्द सशस्त्र संघर्ष को जारी कर रखा था यही कारण था कि अधिकतर अरब देशों का मत कड़े विरोध के साथ इस्राईल के ख़िलाफ़ था जिसकी वजह से सऊदी, इस्राईल के साथ अपने संबंध को छिपा कर रखने पर मजबूर था, इनके आपसी संबंध और इस्लामी देशों के ख़िलाफ़ साज़िशों का यह सिलसिला ऐसे ही जारी रहा और यह 2001 में 9/11 के हादसे तक ऐसे ही था लेकिन जब 9/11 के हादसे के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश और इस्लाईल की यहूदी लॉबी के दबाव की वजह से सऊदी और इस्राईल के बीच के संबंध ज़ाहिर होना शुरू हो गए।

यह एक खुली हुई सच्चाई है कि सऊदी की राजनीति कभी आज़ाद नहीं रही बल्कि आले सऊद ने हमेशा अपने इलाक़े में अमेरिका और यूरोपीय ताक़तों की पॉलिसियों की पैरवी की है जिसका सीधा मतलब यह होता है कि वहां की सत्ता में सऊदी का किरदार केवल एक विध्वंसक (ख़राबी फैलाने वाला)  है जिसका साफ़ सबूत ईराक़, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बहरैन, लेबनान और यमन में फैलाई गई अशांति और संकट में सऊदी का हाथ होना है, इसीलिए यह कहना बिल्कुल सच होगा कि अरब देशों को कमज़ोर करना सऊदी और इस्राईल का संयुक्त (common target) लक्ष्य है, इस बात में भी कोई शक नहीं है कि मिस्र में होने वाली फ़ौज़ी बग़ावत सऊदी अरब की आर्थिक मदद और इस्राईल की साज़िश का नतीजा थी, इसी तरह तुर्की में फ़ौजी बग़ावत में भी अमेरिका और सऊदी के ख़ुफ़िया हाथ थे और हाल में जो पिछले 3 सालों से जो हालत है वह किसी से छिपी नहीं है यह और बात है कि मीडिया जिस पर इस्राईल ही का क़ब्ज़ा है सच्चाई का कुछ ही प्रतिशत जनता तक पहुंचने देती है, इन सब जगहों की तबाही और क़त्लेआम में सऊदी अरब ने अपने आक़ाओं को ख़ुश करने के लिए पूरे इस्लामी जगत के साथ विश्वासघात किया है।

यह सारी हक़ीक़त इस बात का साफ़ सबूत है कि अमेरिका और इस्राईल, सऊदी अरब की चीज़ों विशेष कर तेल को इस्लामी देशों को कमज़ोर करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और आले सऊद पूरी तरह से आले यहूद के हाथों का खिलौना बन चुकी है, पिछले कुछ साल पहले अमेरिका और सऊदी अरब के बीच आपसी संबंध काफ़ी बिगड़ गए थे और उसकी बुनियादी वजह सऊदी अरब का सीरिया, ईराक़ और लेबनान के मामलात में ज़रूरत से ज़्यादा हस्तक्षेप करना था जबकि अमेरिका आले सऊद को पड़ोसी देशों के मामलात में अपने राजनीतिक फ़ायदे हासिल करने के लिए ख़राबी फैलाने की अनुमति देता है लेकिन अमेरिका की निगाह में सऊदी पड़ोसी देशों की अशांति और संकट को दूर करने की क्षमता नहीं रखता, इसीलिए जब सऊदी अरब ने सीरिया के संकट में अपना किरदार निभाना चाहा और उसी तरह ईराक़ और लेबनान में घुसना चाहा तो यह काम अमेरिकी राजनेताओं को पसंद नहीं आया, लेकिन उसके बावजूद अभी इलाके अमेरिका के हितों और इस्राईल को बचाने के लिए सऊदी अरब ही है जो इंसानियत और इस्लाम के बुनियादों को रौंदने के लिए हर समय तैयार बैठा है, इसीलिए अमेरिका और इस्राईल किसी न किसी बहाने से सऊदी की सरपरस्ती जारी रखेंगे और सऊदी हाकिम भी अमेरिका और इस्राईल की ग़ुलामी का तौक़ कभी गर्दन से नहीं उतारेंगे।

हाल ही में सऊदी की अमेरिका ग़ुलामी का ट्रेलर सभी ने देखा कि किस तरह एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी के हाकिमों का अपमान किया लेकिन चूंकि इंसानियत और इस्लाम की तालीमात और बुनियादी उसूलों को भुला कर साम्राज्यवाद की ग़ुलामी करने की आदत ने इन्हें हमेशा के लिए इंसानियत की निगाहों में ज़लील कर दिया है इसलिए यह किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं।



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