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इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत पर न जाने वालों का अफ़सोस

क़यामत के दिन कोई भी ऐसा नहीं होगा जो यह अफ़सोस न कर रहा हो कि काश मैंने भी इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत का शरफ़ हासिल किया होता

विलायत पोर्टल: इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. मोमेनीन को क़यामत के दिन किए जाने वाले अफ़सोस के बारे में ख़बरदार करते हुए फ़रमाते हैं कि: क़यामत के दिन कोई भी ऐसा नहीं होगा जो यह अफ़सोस नहीं कर रहा होगा कि काश मैंने इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत का शरफ़ हासिल किया होता, जिस समय वह देखता है कि अल्लाह इमाम हुसैन अ.स. के ज़ायरीन के साथ कैसा सुलूक करता है और किस हद तक उन्हें करामत और अज़मत अता करता है।

मोहम्मद इब्ने मुस्लिम नक़्ल करते हैं कि: इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स. ने फ़रमाया: अगर लोगों को मालूम होता कि इमाम हुसैन अ.स. की क़ब्र की ज़ियारत की कितनी फ़ज़ीलत है तो वह ज़ियारत के शौक़ में अपनी जान गंवा बैठते और उनकी सांसें ज़ियारत की हसरत लिए थम जातीं।

मैंने पूछा: इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की क्या फ़ज़ीलत है?

आपने फ़रमाया: जो भी पूरे शौक़ से इमाम की ज़ियारत को आएगा तो अल्लाह उसे एक हज़ार ऐसे हज और उमरे जो उसकी बारगाह में क़बूल हो चुके हों अता करेगा और साथ ही बद्र के शहीदों जैसे एक हज़ार शहीदों का सवाब एक हज़ार रोज़े का सवाब, एक हज़ार सदक़े का सवाब और अल्लाह की राह में एक हज़ार ग़ुलाम आज़ाद करने का सवाब उसके आमाल नामे में लिखा जाएगा।

 और आपके बेटे इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. ने फ़रमाया: बेशक इमाम हुसैन अ.स. अल्लाह के यहां से कर्बला में अपने ख़ैमों की जगह देखते हैं, कि कौन ज़ियारत के मक़सद से कर्बला में आया है, फिर अल्लाह से उसके लिए मग़फ़ेरत तलब करते हैं, और अपने आबा व अजदाद से उस ज़ायर की मग़फ़ेरत की दुआ करने को कहते हैं, और फ़रमाते हैं कि: अगर मेरा ज़ायर यह जानता होता कि अल्लाह ने उसके लिए इस ज़ियारत के बदले क्या फ़ज़ीलत रखी है तो वह ग़म से ज़्यादा अपने मक़ाम और मर्तबे पर ख़ुश होता, और बेशक इमाम हुसैन अ.स. जब ज़ियारत कर के वापस आता है तो उसके आमाल नामे में एक भी गुनाह नहीं रहता।

इसी तरह और भी बहुत सी हदीसों में इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत करने का हुक्म मिला है फिर चाहे वह क़र्ज़ लेकर ही क्यों न हो, जिससे यह बात साफ़ हो जाती है कि इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के सवाब का अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता।

लेकिन सबसे अहम और ज़रूरी यह है कि हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह जितना सवाब ज़िक्र हुआ है यह इमाम की पूरी मारेफ़त के साथ है और उस सफ़र में ख़ुलूस पाया जाता हो और ज़ियारत के सफ़र में हुक़ूक़ुन नास का ख़्याल रखना भी बेहद ज़रूरी है और इसी तरह वह सभी ज़ाहिरी और मानवी आदाब जो हदीसों में बयान हुए हैं उन सभी का ध्यान रखना ज़रूरी है।

और जिस किसी ने इन सभी आदाब का ख़्याल रखते हुए ज़ियारत कर ली तो उसकी ज़िंदगी में जो बरकत और मानवियत आएगी जिसका वह अंदाज़ा भी नहीं कर सकता।

अब ज़ाहिर है जब इतना सवाब और इतनी अज़मत जिसकी ज़ियारत में हो और अगर किसी को यह नसीब न हो सके तो पूरी ज़िंदगी उसके अफ़सोस करने के लिए यही काफ़ी होगा। 

आख़िर में अल्लाह से दुआ है इस साल और हर साल हम सभी को इमाम हुसैन अ.स. और दूसरे मासूमीन अ.स. की ज़ियारत नसीब फ़रमाए।

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