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इमाम हुसैन अ.स. और क़ुर्आन

अहलेबैत अ.स. की सबसे ख़ास उपलब्धि यह है कि पैग़म्बर स.अ. ने उन्हें क़ुर्आन के बराबर क़रार दिया है और उनकी पूरी ज़िंदगी की गारंटी ली है कि वह हमेशा क़ुर्आन के साथ रहेंगे और क़ुर्आन उनके साथ रहेगा और हौज़े कौसर पर दोनों साथ में आएंगे

विलायत पोर्टलः यूं तो क़ुर्आन अल्लाह की तरफ़ से हर मुसलमान और हर इंसान के लिए गाइड लाइन है और हर शख़्स की ज़िम्मेदारी है कि अपना हर क़दम क़ुर्आन की रौशनी में उठाए और अपनी ज़िंदगी को क़ुर्आन की तालीमात के सांचे में ढाल दे लेकिन हक़ीक़त यह है कि बहुत से लोग इस सच्चाई से बेख़बर हैं और उनके कामों को देख कर लगता है कि क़ुर्आन की तालीमात से अंजान हैं, ऐसे लोग बहुत सीमित हैं जिनकी ज़िंदगी में आइडियल क़ुर्आन हो और उसके सारे काम क़ुर्आन की तालीमात की रौशनी में हों।

अहलेबैत अ.स. की सबसे ख़ास उपलब्धि यह है कि पैग़म्बर स.अ. ने उन्हें क़ुर्आन के बराबर क़रार दिया है और उनकी पूरी ज़िंदगी की गारंटी ली है कि वह हमेशा क़ुर्आन के साथ रहेंगे और क़ुर्आन उनके साथ रहेगा और हौज़े कौसर पर दोनों साथ में आएंगे, अब यह मुसलमान की क़िस्मत है कि वह इन दोनों का साथ अपना कर अपने आप को गुमराही से बचा ले या दोनों में से किसी एक को छोड़ कर हमेशा हमेशा के लिए गुमराही के दलदल में धंस जाए।

अहलेबैत अ.स. के बारे में यह बात तय है कि वह कभी क़ुर्आन से जुदा नहीं हो सकते और इसी रौशनी में उनकी ज़िंदगी के हर छोटे बड़े अमल को देखा जा सकता है, लेकिन ख़ास कर इमाम हुसैन अ.स. ने शहादत के बाद नैज़े की बुलंदी से तिलावत कर के यह बता दिया कि मेरा पूरा किरदार क़ुर्आन के सांचे में ढला हुआ है और मेरा क़ुर्आन से जुदा होना मुमकिन नहीं है, मेरे सर को मेरे बदन से अलग किया जा सकता है लेकिन मुझ में और क़ुर्आन में जुदाई और दूरी मुमकिन नहीं है।

आइए देखते हैं कि क़ुर्आन, इमाम हुसैन अ.स. की फ़ज़ीलत को किस तरह बयान करता है:

क़ुर्आन में सूरए अहक़ाफ़ में एक एक इंसान का ज़िक्र पाया जाता है कि हमने उसे नेक बर्ताव और अच्छे व्यवहार की वसीयत की कि उसकी मां ने हम्ल (गर्भावस्था) के दौर में भी और विलादत के समय भी बुरे हालात का सामना किया और उसके गर्भावस्था और दूध पिलाने का कुल समय 30 महीना है, और जब वह ज़िंदगी में आगे बढ़ गया और 40 साल का हो गया तो उसने परवरदि‍गार की बारगाह में दुआ की कि ख़ुदाया मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं उस नेमत का शुक्रिया अदा करूँ जो तूने मुझ पर और मेरे वालेदैन पर नाज़िल की है और मैं ऐसा अमल अंजाम दूं जिससे तू राज़ी हो जाए और मेरी नस्ल में नेक औलाद पैदा कर कि मेरा ध्यान तेरी ही तरफ़ है और मैं तेरी इबादत करने वाला बंदा हूं।

आयत में जो विशेषताएं बताईं हैं उसको देखते हुए मुफ़स्सिरों ने तीन तरह के कथन का ज़िक्र किया है, कि इतिहास में केवल तीन ही लोग ऐसे हैं जो अपनी मां के पेट में केवल 6 महीने रहे हैं लेकिन उसके बावजूद ज़िंदा रहे हैं और बेहतरीन आमाल अंजाम दिए हैं और वह तीन हस्तियां हज़रत यहया, हज़रत ईसा और इमाम हुसैन अ.स. हैं।

लेकिन समस्या यह है कि हज़रत यहया 40 साल से पहले ही अल्लाह की राह में शहीद हो गए, और हज़रत ईसा वालेदैन के हक़ में दुआ करने से वंचित रहे क्योंकि अल्लाह ने उन्हें बिना बाप के इस दुनिया में पैदा किया, इसलिए आयात में इशारा साफ़ तौर से इमाम हुसैन अ.स. की तरफ़ है हालांकि आयत में बात सार्वजनिक रूप से कही गई है।

इमाम हुसैन अ.स. ही वह शख़्सियत हैं जिनकी मां ने इमाम अ.स. की विलादत के समय बहुत सारे कष्टों का सामना किया है, यहां तक कि आपने अपने बच्चे की शहादत की ख़बर तक सुनी।

इमाम हुसैन अ.स. ही वह वह हस्ती हैं जिनका मां के पेट में रहने और मां का दूध पीने का ज़माना कुल 30 महीने है।

इमाम हुसैन अ.स. ही वह शख़्सियत हैं जिनके मां बाप दोनों अल्लाह की नेमतों का मरकज़ हैं और अनअमता अलैहिम का मिस्दाक़ हैं।

इमाम हुसैन अ.स. ही वह नेक किरदार हैं जिनके नेक और सालेह अमल पर आसमान से आवाज़ आई थी: ऐ नफ़्से मुत्मइन अपने परवरदिगार की बारगाह में पलट आ, तू हमसे राज़ी है और हम तुझसे राज़ी हैं।

इमाम हुसैन अ.स. ही उस पाक नस्ल के मालिक हैं जिसमें क़यामत तक नेक और सालेह बंदों का सिलसिला जारी रहेगा।

इमाम हुसैन अ.स. ही अल्लाह की ऐसी इताअत करने वाले हैं जिन्होंने ख़ंजर के नीचे भी आवाज़ दी: ऐ अल्लाह मैं तेरी मर्ज़ी पर राज़ी हूं और तेरे फ़ैसले पर सर झुकाए हूं।

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