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इमाम सज्जाद अ.स. और पारिवारिक अख़लाक़ी पहलू

औरत का हक़ जिसकी सरपरस्ती एक मर्द कर रहा है यह है कि मर्द उसके वुजूद की ज़रूरत को समझे, और उसको इस बात का एहसास होना चाहिए कि अल्लाह ने आराम, सुकून और ज़िंदगी में प्यार और मोहब्बत को बाक़ी रखने के लिए औरत को ज़रिया बनाया है, औरत और मर्द जब एक दूसरे से शादी करते हैं तो उन्हें एक दूसरे की अहमियत और क़ीमत को महसूस करना चाहिए, औरत और मर्द दोनों को अल्लाह की इस नेमत पर शुक्र अदा करना चाहिए

विलायत पोर्टलः हमारे चौथे इमाम हज़रत इमाम सज्जाद अ.स. उन इमामों में से हैं जिन पर हुकूमत कड़ी निगरानी रखे हुए थी लेकिन उसके बावजूद इमाम अ.स. ने अपने फ़र्ज़ को अदा करने और उम्मत की हिदायत करने में कोई कमी नहीं छोड़ी, जबकि आपने इमामत की ज़िम्मेदारी बहुत ही घुटन के माहौल में संभाली और फिर भी आपने अहले विलायत के क़ाफ़िले को बनी उमय्या के उस मनहूस दौर से पूरी हिफ़ाज़त के साथ बाहर निकाला और शियों को नाबूद होने से बचा लिया।

इमाम सज्जाद अ.स. के दौर को हक़ीक़ीत में इंसानियत और दीनदारी को रौंदे जाने वाला दौर कहा जा सकता है, और ऐसे दौर और ऐसे माहौल में इमाम अ.स. ने एक रेसाला हुक़ूक़ के नाम से हम तक पहुंचाया, और आज इमाम अ.स. के उसी हुक़ूक़ नामी किताब और रेसाले का बरकत है जो इतिहास में इंसानी हुक़ूक़ पर चर्चा करने वालों को हुक़ूक़ की सही सीख मिल सकी, इस लेख में संक्षेप में इमाम अ.स. की अमली ज़िंदगी के एक पहलू की तरफ़ रौशनी डालते हैं और उनके बयान की रौशनी में पारिवारिक़ हुक़ूक़ यानी शौहर और बीवी के हुक़ूक़ को बयान किया जाएगा।

अदालत और इंसाफ़ एक ऐसा विषय है जिसे हर मासूम की सीरत में साफ़ तौर से देखा जा सकता है, और उसमें सबसे अहम पारिवारिक मुद्दों में अदालत है, परिवार में अदालत का ध्यान रखना पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी से सीखा जा सकता है कि आपने अपनी ज़िंदगी के समय को तीन हिस्सों में बांट रखा था, एक हिस्से को अपने ख़ालिक़ से गुफ़्तुगू के लिए, एक हिस्सा अपने परिवार और ख़ानदान वालों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए और एक हिस्सा अपने निजी कामों के लिए विशेष कर रखा था। (मकारिमुल अख़लाक़, अल्लामा तबरिसी, तर्जुमा मीर बाक़री, पेज 13)

परिवार वालों के लिए रोज़ी की तलाश

इमाम सज्जाद अ.स. का फ़रमान है कि अल्लाह उस बंदे से सबसे ज़्यादा राज़ी रहता है जो अपने परिवार के लिए सुकून और चैन का बंदोबस्त करे। (फ़ुरूए काफ़ी)

एक दूसरी जगह इमाम अ.स. फ़रमाते हैं कि अगर मैं बाज़ार जाऊं और मेरे पास कुछ पैसे हों और मैं अपने घर वालों के लिए गोश्त ख़रीद लूं तो यह काम मेरी निगाह में एक ग़ुलाम आज़ाद करने से बेहतर हैं। (फ़ुरूए काफ़ी, बिहारुल अनवार)

इमाम सज्जाद अ.स. सुबह होते ही रिज़्क़ और रोज़ी की तलाश में घर से बाहर जाया करते थे, जब आपसे कोई पूछता कि मौला आप कहां जा रहे हैं, आप फ़रमाते हैं कि जा रहा हूं ताकि अपने परिवार की तरफ़ से सदक़ा दूं, फिर किसी ने सवाल किया कि सदक़ा देने के लिए बाहर जा रहे हैं, तो आपने फ़रमया कि जो शख़्स भी हलाल रोज़ी की तलाश में घर से बाहर निकलता है तो उसकी इस कोशिश को अल्लाह सदक़ा देना शुमार करता है। (फ़ुरूए काफ़ी)

बीवी के हुक़ूक़

एक ऐसी बीवी जो मेहरबान हो, वफ़ादार हो, शौहर की मुश्किलों, कठिन परिस्तिथियों, बुरे दौर और सुख दुख की साथी हो और एक ऐसी जीवन साथी हो जो इस दुनिया के उतार चढ़ाव भरे सफ़र में शौहर के साथ रहने वाली हो, इसलिए ऐसी बीवी अल्लाह की तरफ़ से बहुत बड़ी नेमत है और उसकी अज़मत की पर दलील है जैसाकि उसका ख़ुद इरशाद है कि अल्लाह की निशानियों में से एक निशानी यह है कि अल्लाह ने तुम्हारे समाज में से तुम्हारे जोड़े पैदा किए ताकि तुम सुकून हासिल कर सको। (सूरए रूम)

हालांकि यह बात दिमाग़ में रहे कि सुकून और आराम को अल्लाह ने इस आयत में शादी के फ़लसफ़े के तौर पर बयान किया है लेकिन एक शर्त के साथ कि दोनों में से हर एक यानी शौहर और बीवी अपनी ज़िम्मेदारियों का ध्यान रखें जैसाकि इमाम सज्जाद अ.स. ने कुछ ज़िम्मेदारियों का ज़िक्र किया है।

आप फ़रमाते हैं कि इस औरत का हक़ जिसकी सरपरस्ती एक मर्द कर रहा है यह है कि मर्द उसके वुजूद की ज़रूरत को समझे, और उसको इस बात का एहसास होना चाहिए कि अल्लाह ने आराम, सुकून और ज़िंदगी में प्यार और मोहब्बत को बाक़ी रखने के लिए औरत को ज़रिया बनाया है, औरत और मर्द जब एक दूसरे से शादी करते हैं तो उन्हें एक दूसरे की अहमियत और क़ीमत को महसूस करना चाहिए, औरत और मर्द दोनों को अल्लाह की इस नेमत पर शुक्र अदा करना चाहिए।

अल्लाह ने शरई ज़िम्मेदारी और सरपरस्ती के हिसाब से मर्द को आगे रखा है लेकिन ध्यान रहे कि इस सरपरस्ती का दुरूपयोग न होने पाए और यह इस बात का बच्चों पर भी ग़लत असर नहीं पड़ना चाहिए और उनसे ध्यान नहीं हटना चाहिए क्योंकि औरत भी आपसे मेहरबानी, मोहब्बत, आराम और घरेलू काम के सिलसिले में आपका ध्यान चाहती है और मर्द की ज़िम्मेदारी भी है कि वह औरत के कामों में उसका हाथ बंटाए, लेकिन इन सब कामों के चलते बच्चों का हक़ भी ध्यान में रखना चाहिए। (तोहफ़ुल उक़ूल, हर्रानी)

इमाम अ.स. का रवैया

इमाम सज्जाद अ.स. की ज़िंदगी पर अगर ध्यान दिया जाए तो यह बात सामने आती है कि इमाम अ.स. का अपने घर में अपनी सरपरस्ती में रहने वालों के साथ रवैया आपके मानने वालों के लिए बेहतरीन सीख है, कमज़ोर और दबे कुचले लोगों का सम्मान करना जैसाकि इमाम अ.स. ख़ुद फ़रमाते हैं कि मैंने अपने पास बैठने वाले हर शख़्स का सम्मान किया है और उसका ख़्याल रखा है। (बहजतुल मजालिस व अनीसुल मजालिस, क़ुरतबी)

इमाम सज्जाद अ.स. की यह सीरत थी कि ग़ुलामों या कनीज़ों ने चाहे कितनी ही ग़लती क्यों न की हो उन्हें सज़ा नहीं देते थे। (मनाक़िबे आले अबी तालिब अ.स., इब्ने शहर आशोब)

हमारे इमाम नर्म दिल थे, सख़्त दिल और ज़ालिम नहीं थे जिनसे लोग डरें या उनसे दूरी बनाए रहें। (तारीख़ो मदीनते दमिश्क़, इब्ने असाकर)

बच्चों के हुक़ूक़

इमाम सज्जाद अ.स. औलाद के हुक़ूक़ और उनकी ज़िम्मेदारियों के बारे में फ़रमाते हैं कि औलाद का हक़ यह है कि आपको ध्यान रखना चाहिए कि वह आपके दिल के टुकड़े हैं, औलाद में अच्छाई हो या बुराई उसको बाप ही से जोड़ा जाता है, आप उसके अदब, अल्लाह की मारेफ़त, इबादत और दीनी मामलात में ज़िम्मेदार हैं और अपनी ज़िम्मेदारी में कमी करने की वजह से आप सज़ा के भी हक़दार हैं, इसलिए औलाद की ऐसी तरबियत करो कि दुनयावी ज़िंदगी में आप उन पर गर्व करें और आपकी शराफ़त और पाकीज़गी की तस्वीर बनें और आख़ेरत में अल्लाह के सामने शर्मिंदगी का कारण न हों। (तोहफ़ुल उक़ूल, हर्रानी)

इमाम अ.स. की औलाद के हक़ में दुआ

इमाम सज्जाद अ.स. की औलाद के हक़ ख़ास कर बेटों के हक़ में बहुत ख़ूबसूरत दुआ मौजूद है जिसमें समाज में औलाद की तरबियत की ज़रूरत को ध्यान में रखते इमाम अ.स. ने दुआ की है, क्योंकि आप औलाद के हक़ में आदाब, अच्छे अख़लाक़ और किरदार की हमेशा दुआ करते थे, जिनमें से कुछ दुआ यहां पर ज़िक्र की जा रही हैं....

आपकी कुछ दुआओं में मिलता है कि, ख़ुदाया मेरे बच्चों का लंबी उम्र दे, उनको नेक बना कर मुझ पर एहसान फ़रमा, ख़ुदाया मेरा सहारा बनने के लिए उनकी उम्र को बढ़ा दे, उनके रिज़्क़ और रोज़ी में बरकत अता कर, उनके बच्चों को परवान चढ़ा, कमज़ोरों को मज़बूत फ़रमा, उनके हर काम में उन्हें कामयाबी इनायत फ़रमा।

ख़ुदाया उनको उनका रिज़्क़ जिसकी तलाश तूने मेरे ज़िम्मे की है उसे ज़्यादा कर दे, उनको नेक, मुत्तक़ी और हक़ सुनने वाला बना, उनको अपनी और अपने औलिया की इताअत करने वालों में से क़रार दे ताकि तेरे दुश्मनों के शर से महफ़ूज़ रहें। (सहीफ़-ए-सज्जादिया, इलाही क़ुमशेई)

ख़ुदाया उन्हें मेरे बाज़ू की ताक़त बना, उनके द्वारा हमारी कमज़ोरियों को दूर कर दे, मेरी नस्ल में बरकत अता कर, उनके द्वारा हमारी ज़िंदगी में रौनक़ पैदा कर, उनके द्वारा हमारे नाम को बाक़ी रख, मेरे न होने पर उनकी ज़िंदगी पर करम फ़रमा, उनके दिल में मेरी मोहब्बत डाल दे, और उनके दिलों को हमेशा के लिए हमारे लिए नर्म कर दे जिससे वह मेरा कहना मानें और मेरी बातों को अनसुना न करें और ग़लत रास्ते की तरफ़ न जाएं और मुझे उनकी तरबियत और उनके हक़ में नेकी करने करने में मेरी मदद फ़रमा। (सहीफ़-ए-सज्जादिया, इलाही क़ुमशेई)

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