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इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. के इल्मी कारनामे

यूनान के फ़लसफ़े को अरबी में ट्रांसलेशन कर के लाया जा रहा था जिसके चलते अनेक तरह के संदेह और शक जन्म ले रहे थे, नए नए मज़हब सामने आ रहे थे और एक इल्मी हंगामे से घर की रौनक़ बढ़ रही थी। ऐसे हालात में एक ऐसे शख़्स की ज़रूरत का एहसास नेचुरल था जो सारे मामलात को सुलझा सके, सारे सवालों और संदेह का जवाब दे सके,

विलायत पोर्टलः इमाम सादिक़ अ.स. का दौर इस्लामी इतिहास का ऐसा दौर था जिसमें इल्मी कोशिशों बेहद तरक़्क़ी हासिल हुई थी, दूसरे देशों और मज़हब के उलूम इस्लाम में दाख़िल हो रहे थे, यूनान के फ़लसफ़े को अरबी में ट्रांसलेशन कर के लाया जा रहा था जिसके चलते अनेक तरह के संदेह और शक जन्म ले रहे थे, नए नए मज़हब सामने आ रहे थे और एक इल्मी हंगामे से घर की रौनक़ बढ़ रही थी।

ऐसे हालात में एक ऐसे शख़्स की ज़रूरत का एहसास नेचुरल था जो सारे मामलात को सुलझा सके, सारे सवालों और संदेह का जवाब दे सके, इतने सारे मज़हब और अलग अलग राय के बीच सही राय और सही मज़हब को लोगों के सामने ला सके, इस्लामी जगत में उस समय इमाम सादिक़ अ.स. के अलावा कोई दूसरी शख़्सियत नहीं थी, नतीजा यह हुआ कि आपकी शख़्सियत को उभर कर सामने आने का मौक़ा मिला और लोगों ने आपकी अज़मत को पूरी तरह से समझ लिया था जिसका अंदाज़ा इस बात से होता है कि हर बड़े से बड़ा आलिम आपकी शागिर्दी के लिए बेचैन था और मदीने से कूफ़ा तक आपके उलूम और आपकी इल्मी शोहरत का चर्चा था।

अबू नईम ने हिल्यतुल औलिया में आपके रावियों में मालिक इब्ने अनस, शोअबा इब्ने हज्जाज, सुफ़यान सौरी, इब्ने जुरैह, अब्दुल्लाह इब्ने अम्र, सुफ़यान इब्ने ओययनह, सुलैमान इब्ने बिलाल, हातिम इब्ने इस्माईल जैसे क़ाबिल लोगों का नाम आता है।

और याक़ूबी ने आपको लोगों में सबसे अफ़ज़ल और सबसे क़ाबिल जैसे शब्दों से याद करते हुए लिखा कि आपकी रिवायतों को आलिम के नाम से नक़्ल करते थे। (तरीख़े याक़ूबी, जिल्द 2, पेज 381)

फ़रीद विजदी ने दाएरतुल मआरिफ़ में जाबिर इब्ने हय्यान की शागिर्दी का ज़िक्र करते हुए लिखा कि यह आपके इल्म और आपके फ़ज़्ल की बेहतरीन दलील है।

इसके अलावा अबू हनीफ़ा और मालिक वग़ैरह के अक़वाल आपके बारे में मशहूर हो चुके हैं और उन सभी ने आपके अज़ीम इल्मी मक़ाम को स्वीकार किया है।

इन्हीं हालात से फ़ायदा उठा कर आपने एक अज़ीम इल्मी मदरसे की बुनियाद रख दी जिसमें हाफ़िज़ इब्ने ओक़दा के मुताबिक़ 4000 बड़े बड़े नामचीन उलमा इल्म हासिल कर रहे थे और इसी मदरसे से पढ़ कर 900 उलमा कूफ़े की मस्जिद में बैठ कर आपके उलूम और मआरिफ़ को फैला रहे थे।

इमाम सादिक़ अ.स. के इस मदरसे के दो बुनियादी मक़सद थे:

1- इस्लामी अक़ाएद और दीनी मआरिफ़ को बचाना और उस पर होने वाले हमलों का जवाब

2- हक़ीक़ी इस्लाम और मआरिफ़ को फैलाना

जैसाकि आपने वह शागिर्द भी तैयार किए जो मुनाज़ेरे के माहिर थे और उनका काम दुश्मनों द्वारा अक़ाएद पर किए गए सारे हमलों का जवाब देना था और ऐसे लोग भी तैयार किए जो शरीयत के हुक्म को आयतों और हदीसों से निकाल कर मस्जिद में बैठ कर फतवा दे सकें।

और यह इसलिए भी मुमकिन हुआ कि आपकी हैसियत एक नहीं थी कि जिसके विचारों में ग़लती मुमकिन हो और जिससे मतभेद मुमकिन हो, बल्कि आप शरीयत के मुहाफ़िज़ अहकाम को लोगों में सबसे ज़्यादा सही जानने वाले थे, इस्लाम के हक़ीक़ी अहकाम आप तक पैग़म्बर स.अ. और आपके अजदाद द्वारा पहुंचे थे इसीलिए लोग आपके उलूम पर पूरा भरोसा रखते थे और उसमें किसी तरह का शक और संदेह नहीं करते थे।

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