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इमाम काज़िम अ.स. और हुकूमत के अत्याचार

इमाम काज़िम अ.स. को किसी एक जेल में नहीं रखा गया बल्कि अनेक प्रकार के अनेक जेलों में रखा गया, आप को कुछ ही समय बाद एक जेल से दूसरी जेल में भेज दिया जाता, और इस का राज़ और कारण यह था कि इमाम को जिस जेल में भेजा जाता कुछ ही दिनों में वहाँ की देखरेख करने वाला (जेलर) आप की शख़्सियत और स्वभाव से प्रभावित हो कर आपका मुरीद हो जाता।

विलायत पोर्टलः अहले बैत अ.स. के जीवन का अध्ययन करने के बाद जो बात स्पष्ट रूप से सामने आती है वह यह कि अल्लाह के निकट इस संसार में इस घराने से अधिक महत्वपूर्ण कोई घराना नहीं है, और अल्लाह ने इनकी महानता को देख कर जो विशेषताएँ इन्हें दीं वह किसी घराने को नहीं दी, और इस घराने ने सुबह शाम केवल अल्लाह के ज़िक्र और बंदों की ज़रूरतों को पूरा करने में पूरा जीवन बिता दिया।

लेकिन इस संसार ने इस घराने के साथ जो अन्याय और अत्याचार किया उसे इतिहास कैसे भुला सकता है।

वैसे तो इमाम काज़िम अ.स. पर हुकूमत की ओर से किए जाने वाले अत्याचार अपने आप में एक इतिहास है लेकिन इस लेख में केवल आप पर जेल में हुए कुछ अत्याचार को बयान करेंगे।

इमाम काज़िम अ.स. को किसी एक जेल में नहीं रखा गया बल्कि अनेक प्रकार के अनेक जेलों में रखा गया, आप को कुछ ही समय बाद एक जेल से दूसरी जेल में भेज दिया जाता, और इस का राज़ और कारण यह था कि इमाम को जिस जेल में भेजा जाता कुछ ही दिनों में वहाँ की देखरेख करने वाला (जेलर) आप की शख़्सियत और स्वभाव से प्रभावित हो कर आपका मुरीद हो जाता।

सबसे पहले इमाम को बसरा की एक जेल में भेजा गया, और वहाँ का गवर्नर मनसूर दवानीक़ी का पोता ईसा इब्ने जाफ़र था, वह एक अय्याश, शराबी और नाच गाने का शौक़ीन इंसान था, इमाम पर सबसे बड़ा अत्याचार यह हुआ कि इमाम को ऐसे दुष्ट के हवाले कर दिया गया। 

उसी के एक सिपाही का बयान है कि, इस आबिद और खुदा की सच्ची मारेफ़त रखने वाले के कानों ने अपने जीवन में इस से पहले कभी ऐसी आवाज़े नहीं सुनी थीं। 

7 ज़िल-हिज्जा वर्ष 178 हिजरी में इमाम को बसरा की एक जेल में ले जाया गया, चूँकि कुछ ही दिनों बाद ईदे क़ुर्बान थी, और ईद की ख़ुशियाँ थीं इस कारण इमाम को रूही तकलीफ़ें दी जाने लगीं, कुछ समय बीतने के बाद ख़ुद ईसा इब्ने जाफ़र आपका चाहने वाला और मुरीद हो गया, पहले वह भी यही समझता था कि इमाम की शख़्सियत वैसी है जैसा हुकूमत कह रही है, और यह कि आप केवल ख़िलाफ़त और हुकूमत को लेकर आपत्ति जता रहे हैं और ख़ुद हुकूमत के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन जब क़रीब से देखा तब समझ में आया जो कुछ सुना और सोंचा था सब ग़लत था, इमाम एक पवित्र इन्सान हैं, और अगर वह ख़िलाफ़त और हुकूमत की बात करते हैं तो केवल इसलिए कि संसार में न्याय को स्थापित कर सकें, वह दुनिया और हुकूमत के लालची नहीं हैं।

फिर उसने इमाम को एक आलीशान कमरा देने का हुक्म दिया, और इमाम का आदर और सम्मान शुरू कर दिया।

हारून अब्बासी ने इमाम की फिर से गिरफ़्तारी की ख़ुफ़िया ख़बर भेजवाई, लेकिन इस ने जवाब में गिरफ़्तार करने से साफ़ मना कर दिया, और फ़िर ख़ुद हारून को इमाम को वापस बुलाने के लिए लिख भेजा, और कहा कि अगर अपने पास नहीं बुलाया तो मैं इनको आज़ाद कर दूँगा, मैं ऐसे नेक शरीफ़ इंसान को अब और जेल में नहीं रख सकता।

चूँकि यह हारून का चचेरा भाई और मनसूर का पोता था इसलिए इसकी बात का महत्व था।

कुछ दिनों बाद इमाम को बग़दाद ले जा कर फ़ज़्ल इब्ने रबी के हवाले कर दिया जाता है, हारून ने इमाम को फ़ज़्ल के हवाले किया जो रबी (हाजिब के नाम से मशहूर) का बेटा था, कुछ ही समय बाद उसने इमाम के स्वभाव, नैतिकता और अल्लाह की इबादत को देख कर आप से प्रभावित हो कर नरम रवैया अपनाते हुए आप की स्थिति को बेहतर बनाया।

जासूसों ने यह ख़बर हारून तक पहुँचा दी कि इमाम काज़िम अ.स. का जीवन उस जेल में एक मेहमान के रूप में बीत रहा है, हारून ने इमाम को फ़ज़्ल इब्ने रबी की जेल से बुलवा कर फ़ज़्ल इब्ने याह्या बरमकी के हवाले कर दिया, यह भी कुछ ही समय में इमाम से प्रभावित हो कर इमाम का सम्मान करने लगा, हारून यह ख़बर पाते ही ग़ुस्से से पागल हो गया, और तुरंत अपने जासूसों को जाँच के लिए भेजा, उनकी रिपोर्ट के बाद उसने इमाम को दूसरे जेल में भेज दिया, इसी प्रकार इमाम पर अत्याचार का सिलसिला जारी रहा, जिस जेल में जाते शुरू में वहाँ पर नए नए अत्याचारों का सामना करना पड़ता।

और फ़िर आख़िर में सिन्दी इब्ने शाहक नामी इंसानी रूप में दरिंदे के हवाले कर दिया गया, इस जेल में इमाम पर जो अत्याचार हुए हैं इतिहास भी उन्हें लिखते हुए काँप उठता है। 

इसी जेल में एक दिन ऐसा आया जिस में इमाम की लोगों के दिलों में बढ़ती जगह को देख कर आप को ज़हर दे दिया गया और फ़िर तीन दिन तक इमाम उस ज़हर के प्रभाव से तड़पते रहे और फ़िर अपने माबूद से जा मिले, और उसके बाद वह अत्याचार हुआ जिसे सुन कर आज भी चाहने वालों की आँखें भर जाती हैं वह यह कि इमाम का जनाज़ा बग़दाद के पुल पर रख दिया गया।




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