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इमाम अली अ.स. की शहादत के बाद इमाम हसन अ.स. की ज़िंदगी

इमाम हसन अ.स. की सन् 40 हिजरी में 37 साल की उम्र में लोगों ने बैअत की और आपने हर किसी से इस शर्त पर बैअत ली कि मैं जिससे सुलह करूंगा उससे सुलह करना पड़ेगी और जिससे जंग करूंगा उससे जंग करना पड़ेगी, लोगों ने इमाम अ.स. की शर्त क़ुबूल करते हुए आपकी बैअत की।

विलायत पोर्टलः इमाम अली अ.स. के मेहराब में शहीद हो जाने के बाद इमाम हसन मुजतबा अ.स. इनते अज़ीम ग़म और दुख के बावजूद मिंबर पर गए और अल्लाह की हम्द के बाद फ़रमाया, पिछली रात एक ऐसी हस्ती इस दुनिया से चली गई जिसके जैसा नेक आमाल में पहल करने वाला और अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने वाला न कभी हुआ है और न कभी होगा। (अल-इरशाद, शैख़ मुफ़ीद, पेज 348, जिलाउल उयून, अल्लामा मजलिसी, पेज 378)

फिर फ़रमाया कि इमाम अली अ.स. ने ऐसी रात में इस दुनिया को छोड़ा जिस रात में हज़रत ईसा अ.स. ने चौथे आसमान की तरफ़ हिजरत की, और उसी रात हज़रत मूसा अ.स. के जानशीन यूशा इब्ने नून की भी वफ़ात की रात थी।

मेरे वालिद इस हाल में दुनिया से गए कि उनके पास दुनिया की दौलत में से कुछ भी नहीं था, केवल 700 दिरहम जो लोगों की दिए हुए उपहार थे वही थे जिससे आप एक ख़ादिम ख़रीदना चाह रहे थे।

इमाम अ.स. यहां तक बयान करते हुए रोने लगे और आपके साथ जमा लोग भी इमाम अ.स. के साथ रोने लगे।

इसके बाद आपने फ़रमाया मैं अल्लाह की तरफ़ से नेमतों की बशारत देने वाले और उसके अज़ाब से डराने वाले का बेटा हूं, मैं उस घराने का बेटा हूं जिनसे मोहब्बत को अल्लाह ने क़ुर्आन में वाजिब क़रार दिया है.... अल्लाह का इरशाद है कि (ऐ अल्लाह के रसूल) कह दीजिए कि मैं अपनी रिसालत के बदले कोई अज्र नहीं चाहता मगर यह कि मेरे ख़ानदान से मोहब्बत करो, जिस ने इस नेकी को अंजाम दिया मैं उस नेकी में इज़ाफ़ा करूंगा।

इसलिए हम से हमारे ख़ानदान से मोहब्बत नेकी है जिसकी तरफ़ अल्लाह ने इशारा किया है.... इमाम हसन अ.स. इसके बाद मिंबर से उतर कर नीचे अपनी जगह पर बैठ गए, उसी समय अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास उठे और लोगों से कहा, यह तुम्हारे रसूल के बेटे और इमाम अली अ.स. के जानशीन हैं और अब से तुम लोगों के इमाम और रहबर हैं आओ और सब लोग इनकी बैअत करो।

झुंड के झुंड लोगों ने इमाम हसन अ.स. की बैअत की, इसके बाद इमाम अ.स. ने एक और ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया जिसमें अल्लाह उसके रसूल और उलिल अम्र की इताअत पर ज़ोर देते हुए लोगों को शैतान की पैरवी से रुकने को कहा और साथ ही ईमान और नेक अमल की अमियत को भी लोगों के सामने बयान किया। (ज़िंदगानी-ए-चहारदा मासूमीन इ.स., एमाद ज़ादे, पेज 543)

इमाम हसन अ.स. की सन् 40 हिजरी में 37 साल की उम्र में लोगों ने बैअत की और आपने हर किसी से इस शर्त पर बैअत ली कि मैं जिससे सुलह करूंगा उससे सुलह करना पड़ेगी और जिससे जंग करूंगा उससे जंग करना पड़ेगी, लोगों ने इमाम अ.स. की शर्त क़ुबूल करते हुए आपकी बैअत की। (जिलाउल उयून, अल्लामा मजलिसी, पेज 378)

साथ ही इमाम अ.स. ने माविया को ख़त लिख कर उसे भी बैअत की दावत दी और याद दिलाया कि अगर किसी सामाजिक काम में किसी तरह का ख़लल पैदा किया तो उससे सख़्ती से निपटा जाएगा और आपने उसके दो जासूसों की गिरफ़्तारी और उनके फ़ांसी देने को ले कर भी चेताया। (अल-इरशाद, शैख़ मुफ़ीद, पेज 350)

माविया ने जवाब में लिखा कि मैं तुमसे पहले से सियासत के मैदान में हूं इसलिए बेहतर है कि तुम मेरी पैरवी करो, मैं वादा करता हूं कि अपने बाद ख़िलाफ़त तुम्हारे हवाले कर दूंगा और बैतुल माल में जितनी दौलत होगी वह भी सब तुम्हारे हवाले कर दूंगा। (नहजुल बलाग़ा, इब्ने अबिल हदीद, जिल्द 16, पेज 35)

यही वह मौक़ा था जब माविया ने हक़ को क़ुबूल करने से मना किया और न केवल इमाम हसन अ.स. की बैअत नहीं की बल्कि इमाम अ.स. के ख़िलाफ़ लगातार साज़िशें करता रहा, वह लोगों को लालच दे कर कभी धमकी दे कर और कभी धोखाधड़ी करते हुए इमाम अ.स. के क़त्ल पर उभारता रहता था, आख़िरकार मज़लूम इमाम अ.स. को अपने ही घर में अपनी ही बीवी जोदा बिन्ते अशअस के हाथों ऐसा ख़तरनाक ज़हर दिलवाया कि इमाम अ.स. का जिगर टुकड़े टुकड़े हो गया।



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