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इमाम अली अ.स. की ख़ुराक

इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि, इमाम अली अ.स. जब तक इस दुनिया में रहे कभी भी संदिग्ध खाना नहीं खाया...... आप अधिकतर खाने में सिरका और ज़ैतून खाते थे और मीठी कोई चीज़ अगर खाते तो वह खजूर होती थी।

विलायत पोर्टलः इमाम अली अ.स. की विशेषताओं में से एक सादा जीवन बिताना था, आपने बसरे के गवर्नर उसमान इब्ने हुनैफ़ को ख़त में उस प्रकार लिखा, हर पैरवी करने वाले का एक इमाम और आइडियल होता है जिसकी वह पैरवी करता है और उस के इल्म के नूर से फ़ायदा उठाता है, ध्यान से सुनो! तुम्हारे इमाम ने इस दुनिया से दो पुराने कपड़े और दो रोटी पर गुज़ारा किया है, मुझे पता है तुम ऐसा जीवन नहीं गुज़ार सकते लेकिन कम से कम अपने तक़वा, परहेज़गारी और अपनी स्थिरता से हमारा साथ दो।

आपने अपने सादा जीवन गुज़ारने का कारण ग़रीबों के साथ सहानुभूति को बताया है। (फ़रहंगे आफ़ताब, अब्दुल मजीद मादीख़ाह, जिल्द 6, पेज 3030—031)

इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि, इमाम अली अ.स. जब तक इस दुनिया में रहे कभी भी संदिग्ध खाना नहीं खाया...... आप अधिकतर खाने में सिरका और ज़ैतून खाते थे और मीठी कोई चीज़ अगर खाते तो वह खजूर होती थी। (फ़रहंगे आफ़ताब, अब्दुल मजीद मादीख़ाह, जिल्द 6, पेज 3024)

इसी प्रकार इमाम सादिक़ अ.स. अपने वालिद से नक़्ल करते हैं कि, इमाम अली अ.स. के ग़ुलाम क़म्बर एक बार इफ़्तार के समय एक सील बंद थैले कर आए, वहीं बैठे एक शख़्स ने इमाम से कहा क्या यह कंजूसी नहीं जो आपने खाने की चीज़ को इस प्रकार थैले में सील बंद कर रखा है।

इमाम ने मुस्कुरा कर जवाब दिया, मैं उस ख़ुराक को अपने पेट तक नहीं ले जाना चाहता जिसके बारे में यह न मालूम हो कि यह कहाँ से आई है, फिर इमाम ने सील बंद को तोड़ा और उसमें से कुछ रोटी को निकाल कर एक बर्तन में रखा, और खाने से पहले अल्लाह को पुकार कर कहा, ऐ अल्लाह तेरे लिए रोज़ा रखा और तेरे रिज़्क़ और रोज़ी से ही इफ़्तार कर रहा हूँ, हमारी इबादत को क़ुबूल फ़रमा बेशक तू सुनने वाला और जानने वाला है। (अल-इरशाद, शेख़ मुफ़ीद, मुतरजिम- रसूल महल्लाती, जिल्द 2, पेज 142)

अदी इब्ने हातिम का बयान है कि, एक बार इमाम के पास एक पुरानी और छोटी पानी की मश्क, कुछ रोटी के टुकड़े और थोड़ा सा नमक रखा हुआ देखा, तो इमाम से कहा, ऐ अमीरुल मोमेनीन मेरे अनुसार यह उचित नहीं है कि आप दिन पे ख़ुदा और उसके दीन के दुश्मनों से जिहाद करें और रात भर उसकी इबादत करें फ़िर इस प्रकार का खाना खाएँ।

इमाम ने फ़रमाया, अपने आप को कम पर संतुष्ट और राज़ी रखो, अपने बीमार नफ़्स का इलाज कम पर राजी रह कर करो, और अगर ऐसा नहीं किया तो यह नफ़्स इस से अधिक की माँग करेगा। (वसाएलुश-शिया, शैख़ हुर्र आमुली, जिल्द 10, पेज 160)

अब्दुल्लाह इब्ने अबी राफ़ेअ कहते हैं कि, एक बार ईद के मौक़े पर इमाम के पास गया, आपके पास सील बंद रोटी का थैला रखा हुआ था, इमाम ने थैले को खोल कर सूखी जौ की रोटी निकाल कर खाने लगे, मैं ने इमाम से कहा, ऐ अमीरुल मोमेनीन अ.स. क्यों आप ने इस रोटी के थैले को सील बंद कर रखा है, इमाम ने फ़रमाया वह इसलिए कि कहीं मेरे बच्चे (मेरे हाल को देखते हुए) रोटी में ज़ैतून को तेल लगा कर इसे नरम न कर दें। (इरशादुल क़ुलूब, दैलमी, मुतरजिम-अली सुल्गी, जिल्द 2, पेज 21)

इमाम अगर चाहते तो रोटी के साथ सब्ज़ी, दूध या और स्वादिष्ट खाने जैसे गोश्त खा सकते थे लेकिन आप ग़रीबों के साथ सहानुभूति जताते हुए इन सब खानों के ना खा कर नमक और सिरके का प्रयोग करते थे, और अधिक गोश्त खाने वालों के लिए आप ने यह भी फ़रमाया, अपने पेट को जानवरों का मक़बरा मत बनाओ। (बिहारुल अनवार, अल्लामा मजलिसी, जिल्द 41, पेज 130)

एक और हदीस में इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि, इमाम अली अ.स. अधिकतर पैग़म्बर जैसे खाने खाते, ख़ुद रोटी सिरका और नमक खाते और दूसरे लोगों को स्वादिष्ट खाने खिलाते थे। (बिहारुल अनवार, अल्लामा मजलिसी, जिल्द 40, पेज 330)

इन सभी हदीसों द्वारा यह बात प्रमाणित हो जाती है कि इमाम कभी कभी नमक और सिरके के अलावा दूसरे खाने भी खाते थे लेकिन असर और आम तौर पर आप की ख़ुराक जौ की रोटी नमक या सिरके के साथ ही होती थी।

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