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इमाम अली अ.स. और हज़रत मीसम तम्मार

हज़रत मीसम ने इमाम अली अ.स. से इतना इल्म हासिल किया था कि इमाम अ.स. के सहाबियों में इल्म में सबसे ज़्यादा अहमियत रखते थे, फिर आपने इमाम अली अ.स. की शहादत के बाद इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. से भी इल्म हासिल किया, इमाम अली अ.स. मस्जिद से निकल कर आपकी खजूर की दुकान पर तशरीफ़ लाते थे और आप उनके साथ दुकान पर बैठ कर देर तक बातें करते थे और कभी कभी मीसम को किसी काम से भेज कर ख़ुद उनकी जगह दुकान पर खजूरें बेचते थे।

विलायत पोर्टलः  इमाम अली अ.स. से हज़रत मीसम का वैसे ही रिश्ता था जैसे हज़रत सलमान का पैग़म्बर स.अ. से था, इब्ने ज़ियाद ने केवल इमाम अली अ.स. के क़रीबी सहाबी होने और उनकी मोहब्बत में मशहूर होने की वजह से आपको बड़ी बे रहमी से क़त्ल कर किया था, इब्ने ज़ियाद ने आपको क़त्ल करते समय कहा था कि मुझे मालूम हुआ तुम सबसे ज़्यादा इमाम अली अ.स. से क़रीब थे और उनसे बहुत ज़्यादा मोहब्बत करते थे।

हज़रत मीसम ने इमाम अली अ.स. से इतना इल्म हासिल किया था कि इमाम अ.स. के सहाबियों में इल्म में सबसे ज़्यादा अहमियत रखते थे, फिर आपने इमाम अली अ.स. की शहादत के बाद इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. से भी इल्म हासिल किया, इमाम अली अ.स. मस्जिद से निकल कर आपकी खजूर की दुकान पर तशरीफ़ लाते थे और आप उनके साथ दुकान पर बैठ कर देर तक बातें करते थे और कभी कभी मीसम को किसी काम से भेज कर ख़ुद उनकी जगह दुकान पर खजूरें बेचते थे।

एक दिन इसी तरह मीसम कहीं गए हुए थे इमाम अली अ.स. उनकी जगह दुकान पर खजूरें बेच रहे थे तभी एक शख़्स खजूर खरीदने आया और खोटा सिक्का दे कर चला गया, इमाम अ.स. ने कहा घर जा कर खजूरें कड़वी ही निकलेंगी, थोड़ी देर बाद वह शख़्स यह कह कर वापस आया कि यह तो कड़वी हैं, इमाम अ.स. ने उसका खोटा सिक्का दे कर वापस कर दिया। (बिहारुल अनवार, जिल्द 5, पेज 573)

कितना अज़ीम था वह इमाम और कितना बुलंद मर्तबा था वह मामूम कि उसकी दुकान पर बैठ कर उसकी जगह वक़्त का इमाम उसका काम कर रहा है, यह इमाम अ.स. की विनम्रता और एक आलिम और मोमिन के साथ मोहब्बत और मेहरबानी के बेहतरीन मिसाल है, मामूम इतना बुलंद मर्तबा कि हाकिम और ख़लीफ़ा होने के बावजूद एक खजूर बेचने वाले की दुकान पर बैठ कर उसका काम अंजाम देता है, वक़्त का इमाम उसके पहलू में आकर ख़ुद बैठता है जो न ख़ास कोई पहचान रखता था न ही किसी बड़े क़बीले का था बल्कि वह एक आज़ाद किया हुआ एक ग़ुलाम था।

अमीरूल मोमेनीन अ.स. उन्हें पाकीज़ा उलूम की तालीम देते थे उन्हें राज़ की बातें बताते थे यहां तक कभी कभी इब्ने ज़ियाद के दर्दनाक ज़ुल्म और अत्याचार का भी ज़िक्र करते थे जो वह उन पर आने वाले समय में ढहाने वाला था, और जब इमाम अ.स. यह सब बताते तो मीसम कहते कि अल्लाह की राह में यह सब तो बहुत कम है, इमाम अ.स. जब रात के समय तन्हाई में सहरा में निकल कर अल्लाह से दुआएं और मुनाजात करते तो मीसम आपके साथ होते और आपकी मुनाजात सुनते थे। (बिहारुल अनवार, जिल्द 9, पेज 473)

इससे पता चलता है कि हज़रत मीसम से आपको ख़ास मोहब्बत और लगाव था और इमाम अ.स. उन्हें ऐसी बातों से आगाह करते जिन्हें वह किसी को नहीं बताते, तन्हाई और मुनाजात के समय इमाम अली अ.स. के पास बस वही हो सकता था कि आपकी इबादत को वही देख सकता था जिसका ईमान और यक़ीन मज़बूत हो, जिसके यहां घबराहट न पाई जाए, यही वजह है कि ऐसे समय में बस गिनती के दो चार असहाब को ही अपने साथ रखते थे जैसे मीसम और कुमैल वग़ैरह।

इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. भी हज़रत मीसम के साथ अपने वालिद जैसा ही बर्ताव करते थे बस केवल इतना फ़र्क़ था कि अमीरूल मोमेनीन अ.स. की शहादत के कुछ महीनों बाद इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. मदीने चले गए और मीसम कूफ़ा में रह गए, बहुत मुमकिन है कि आपका कूफ़ा में रहना इन्हीं दो इमामों के हुक्म से रहा हो क्योंकि कूफ़ा वाले मीसम की बात को बहुत ध्यान से सुनते थे, अधिकतर मीसम और उन्हीं जैसे दूसरे इमाम अली अ.स. के क़रीबी असहाब न होते तो इमाम अली अ.स. की फ़ज़ीलतों को बनी उमय्या छिपाने और ख़त्म करने में कामयाब हो जाते।

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