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इमाम अली अ.स. और ग़ुलामों से बर्ताव

इमाम अ.स. ने यह महसूस कराया कि इंसान होने के हिसाब से सबका मनोविज्ञान और एहसास एक जैसे होते हैं और इमाम अ.स. का यही वह रवैया था जिसने ग़ुलामों के क़ाफ़िले को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई और उनको सोंच और विचारों और उनकी प्रतिभा को सामने लाने में मदद की, और आपके रवैये से पैदा होने वाली सोंच ने ग़ुलामों के एक वर्ग को ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ कर अपनी मेहनत और मोहब्बत से शहंशाही के तख़्त के बराबर लाकर खड़ा कर दिया और हुकूमत की बुनियाद रखने वाला बना दिया।

आप ग़ुलामों से गहरी हमदर्दी रखते थे, आपने अपनी मेहनत और मज़दूरी की कमाई का कुछ हिस्सा उनकी आज़ादी और उनके आगे बढ़ने के लिए वक़्फ़ कर रखा था और आपने उन्हें आज़ाद कर के उन्हें मौक़ा दिया कि वह तरक़्क़ी की मंज़िलों को तय कर के समाज में ऊंचा स्थान हासिल कर सकें क्योंकि तरक़्क़ी किसी ख़ास नस्ल और रंग से विशेष नहीं है बल्कि एक आज़ाद इंसान को जितना आगे बढ़ने का हक़ है उतना ही हक़ ग़ुलाम को भी हासिल है।

इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. की हदीस की मुताबिक़ इमाम अली अ.स. ने अपनी ख़ुद की कमाई से 1000 ग़ुलाम आज़ाद किए। (वसाएलुश-शिया)

इमाम अ.स. केवल ग़ुलामों को आज़ाद ही नहीं करते बल्कि ऐसे ग़ुलामों की सरपरस्ती भी अपने कंधों पर लेते थे जो कम उम्र, बुढ़ापे या बीमारी के कारण काम काज नहीं कर सकते थे और साथ ही हमेशा उनका ख़ास ध्यान रखते थे, आपकी मेहरबानी और नर्म रवैये का हाल यह था कि उन्हें कभी यह ख़्याल भी नहीं आता था कि किसी ग़लती की सज़ा भी दी जा सकती है, जैसाकि एक बार एक ग़ुलाम को कई बार आवाज़ दी जब वह नहीं आया तो आपने बाहर निकल कर देखा तो देखा कि वह दरवाज़े ही पर खड़ा है, इमाम अ.स. ने पूछा कि मैंने कितनी बार पुकारा क्या तुमने मेरी आवाज़ नहीं सुनी? उसने जवाब दिया कि मैं इसलिए चुप रहा क्योंकि मुझे आपकी ओर से किसी सज़ा का ख़तरा नहीं था कि आप मेरे जवाब न देने पर आप मुझे सज़ा देंगे, इमाम अ.स. ने यह जवाब सुन कर फ़रमाया: अल्लाह का शुक्र है कि उसने ऐसा क़रार दिया जिसके नुक़सान से उसकी मख़लूक़ ख़ुद को महफ़ूज़ समझती है, उठो तुम अल्लाह की राह में आज़ाद हो।

इसी तरह आप मामूली कपड़े अपने लिए पसंद करते थे और अच्छे लिबास ग़ुलामों को देते थे।

शायद यह बात निराली और अनोखी न समझी जाए कि इमाम अ.स. ने अपनी ख़िलाफ़त के दौर में अपने ग़ुलाम को अच्छे कपड़े दिए और ख़ुद मामूली पहने, क्योंकि दुनिया के हाकिमों का तरीक़ा यह रहा है कि वह शान और शौकत के लिए अपने ग़ुलामों को को सजा संवार के रखते थे, शाही दरबारों में उनकी सज धज का संबंध दिखावे से था, उनके जिस्मों पर चकाचौंध कपड़े, सरों पर रंगीन साफ़े, कमर में गोल्डेन पटके जिनमें मोती जड़े हुए होते थे, गले में सुनहरे कंठ और हाथ में सोने का असा होता था, इस ज़ाहिरी वेशभूषा से दरबार की शान तो बढ़ जाती थी लेकिन ग़ुलामी का एहसास ख़त्म नहीं होता बल्कि इस तरह दरबार में शो पीस बना कर खड़ा करने से उनकी ग़ुलामी का एहसास और उभर कर सामने आ जाता, है और हर ग़ुलाम इस सज धज को नफ़रत की निगाह से देखता होगा, उसकी तमन्ना होगी कि उसे बदन ढ़ांकने के लिए चीथड़े मिलते लेकिन उसके पैरों में ग़ुलामी की भारी ज़ंजीरें न होतीं।

इमाम अली अ.स. इस विचार पर गहरी नज़र रखते थे कि कहीं उनके ग़ुलामों को यह एहसास न होने पाए कि उन्हें अच्छे कपड़े ग़ुलामों का सम्मान करते हुए दिए जा रहे हैं बल्कि उनको यह एहसास दिला कर अच्छे कपड़े दिए कि यह उनका हक़ है और इसीलिए आप ने क़म्बर से कहा कि तुम अभी जवान हो और अच्छे कपड़े बूढ़ों के बजाय जवानों के लिए ज़्यादा मुनासिब हैं, आपने यह कह कर उनकी सोंच को उधर जाने ही नहीं दिया जो विचार दुनिया के दूसरे हाकिमों के दरबार में ग़ुलामों के दिमाग़ में आते हैं।

इमाम अ.स. ने यह महसूस कराया कि इंसान होने के हिसाब से सबका मनोविज्ञान और एहसास एक जैसे होते हैं और इमाम अ.स. का यही वह रवैया था जिसने ग़ुलामों के क़ाफ़िले को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई और उनको सोंच और विचारों और उनकी प्रतिभा को सामने लाने में मदद की, और आपके रवैये से पैदा होने वाली सोंच ने ग़ुलामों के एक वर्ग को ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ कर अपनी मेहनत और मोहब्बत से शहंशाही के तख़्त के बराबर लाकर खड़ा कर दिया और हुकूमत की बुनियाद रखने वाला बना दिया।

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