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इंसानियत का सम्मान

आज के दौर में भी देख लीजिए धर्म के नाम पर जाति के नाम पर लोग एक दूसरे की जान के प्यासे हैं, कहीं पर इस्लाम की आड़ लेकर कट्टरता दिखाने वाला गुट सामने आता है कहीं पर हिन्दुत्व की आड़ लेकर कट्टरता दिखाई जाती है, एक दूसरे का सम्मान, आपसी भाईचारा, इंसानियत और प्यार मोहब्बत सभी कुछ ही पल में धर्म की कट्टरता की भेंट चढ़ता दिखाई देने लगता है

विलायत पोर्टल: इंसानी इतिहास में जितना इंसानियत का अपमान इंसानों द्वारा हुआ है किसी दूसरे के हाथों नहीं हुआ, ऐसा घोर अपमान जिसके बारे सोंच कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, कभी धर्म, कभी जाति, कभी रंग, कभी नस्ल कभी क़बीले और कभी ज़बान को लेकर इंसानों ने इंसानों के साथ जानवरों से बुरा सुलूक किया है, हज़रत ईसा के सूली पर लटकाए जाने के बाद रूम के यहूदी रिबाईयों के उकसाने पर हज़रत ईसा के हवारियों और उनके मानने वालों को चुन चुन कर मारा गया, फिर जब ईसाइयों ने हुकूमत और मज़बूती हासिल की तो यहूदियों की नाक में दम कर डाला, अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ जर्मन में हिटलर ही को देख लीजिए जिसने हज़ारों यहूदियों को ज़िंदा जला दिया चौदह सौ साल पहले का इतिहास पढ़ लीजिए जब पैग़म्बर स.अ. ने मक्के से इस्लाम की दावत दी तो मक्के के सरदारों और मुशरिकों ने पैग़म्बर स.अ. और उनके असहाब को इतनी तकलीफ़ और दुख पहुंचाया कि पैग़म्बर स.अ. को कहना पड़ा कि जितनी तकलीफ़ और दुख मुझे दिए गए किसी भी नबी को नहीं दिए गए।

धर्म के अलावा रंग के भेदभाव का भी ख़ूब दबदबा रहा, अमेरिका में काले लोगों के साथ नफ़रत वाला रवैया अपनाया जाता रहा है अभी कुछ सालों पहले तक होटल के बाहर बोर्ड पर लिखा रहता था कि होटल में कालों और कुत्तों का आना मना है, क्या अमेरिकी इस बात से इंकार कर सकते हैं कि साम्राज्यवाद के दौर में वहां के काले लोगों को ज़ंजीर में जकड़ कर उन्हें पानी के जहाज़ में बिठा कर वहां से निकाला गया, उन्हें ग़ुलाम बनाया गया, उनके ख़ून और पसीने से अमेरिका के चमन में फूल खिलाए गए, उनसे मज़दूरी का काम लिया गया सड़कें बनीं और आसमान छूने वाली बिल्डिंगें उन्हीं की मेहनत का नतीजा है, खेतों में हरियाली उन्हीं के दम से है, फ़ैक्ट्रियों में दिन रात उनसे काम लिया गया, और जब अमेरिका आबाद हो गया तो उनके साथ रंग और नस्ल का भेदभाव किया गया और काले लोगों के साथ जानवरों से भी बुरा सुलूक किया गया।

इसी तरह ज़बान को लेकर भी न जाने कितने देशों में मतभेद इस तक हुए कि लोग एक दूसरे के दुश्मन बन बैठे, कट्टरता इतनी बढ़ गई कि इलाक़े की ज़बान बोलने वाले को जान से भी हाथ धोना पड़ा है।

आज के दौर में भी देख लीजिए धर्म के नाम पर जाति के नाम पर लोग एक दूसरे की जान के प्यासे हैं, इंसान यह भूल बैठा है कि इस सृष्टि के रचने वाले ने इंसान को ही सबसे बेहतर बनाया है, कहीं पर इस्लाम की आड़ लेकर कट्टरता दिखाने वाला गुट सामने आता है कहीं पर हिन्दुत्व की आड़ लेकर कट्टरता दिखाई जाती है, एक दूसरे का सम्मान, आपसी भाईचारा, इंसानियत और प्यार मोहब्बत सभी कुछ ही पल में धर्म की कट्टरता की भेंट चढ़ता दिखाई देने लगता है, पल भर में इंसान भूल जाता है कि हमारे लहू का रंग एक जैसा है हमारा कल्चर हमारी सभ्यता सदियों से एक जैसी रही है, हम सैकड़ों साल से एक दूसरे के दुख सुख में कंधे से कंधा मिलाकर चलते आए हैं, हमने एक दूसरे की शादियों और एक दूसरे के मरने जीने में घर वालों ही की तरह दुख सुख बांटा है, हमने साथ में खेती भी की है हमने साथ ही में कम्पनियों में भी काम किया है, और जब भी हमारी ज़मीन हमारे कल्चर हमारे देश पर बुरा समय आया हमने साथ मिलकर ही उसका सामना किया है, तो फिर आख़िर क्या वजह है कि देखते देखते हालात ऐसे बदले कि हम इतनी सारी समानता के होते हुए भी इतने पराए हो गए कि एक दूसरे के जानी दुश्मन बनने को तैयार हो गए?

अगर ध्यान दिया जाए तो पूरे विश्व में जिस देश को भी आप देख लीजिए अधिकतर इस षड्यंत्र के पीछे कुछ सत्ता के लालची बिकाऊ पत्रकारिता का सहारा लेकर समाज के लिए ज़हर घोलते दिखाई देते हैं जो अपने मक़सद को हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं फिर चाहे वह किसी भी धर्म के हों और किसी भी वेशभूषा में हों उनका विरोध ज़रूरी है, क्योंकि अगर इंसानियत ही न बचेगी , आपसी प्रेम ही न रहेगा, सदियों से चली आ रही सभ्यता और संस्कृति न रहेगी, तो फिर ऐसी ज़हरीली फ़िज़ा का जन्म होगा जिसमें पल पल इंसानियत जलेगी मानवता का दम घुटेगा और इंसानियत और मानवता की बात करने वाले को तरह तरह के इल्ज़ाम और आरोप लगा कर समाज का अलग हिस्सा साबित कर दिया जाएगा, तो ज़ाहिर है ऐसे माहौल में आतंक ही पनप कर सामने आएगा और उसके ज़िम्मेदार वही लोग होंगे जिन्होंने बुराई, अन्याय, पाप, हिंसा और नफ़रत को जातिवाद और धर्म के चश्मे से देखा और बुराई ख़त्म करने के बजाए उस आग में तेल डालने का काम किया। 

इसलिए सभी को जागना होगा, नफ़रत की तेज़ आंधी के सामने सीना तान कर धर्म और जातिवाद का चश्मा उतार कर हाथ में हाथ देकर खड़े होना पड़ेगा, अन्याय और हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठानी पड़ेगी, सत्ता और हुकूमत के लिए इंसानों को इंसानों का दुश्मन बनाने वालों को बे नक़ाब करना होगा तब कहीं जाकर दुनिया में इंसाफ़ और अदालत की बात हो सकेगी और इंसानियत चैन की सांस ले सकेगी।

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