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आशूरा की तालीमात

कर्बला के इंक़लाब का सबसे अहम सबक़ आज़ादी और ज़ुल्म के आगे न झुकना है, इमाम हुसैन अ.स. ने फ़रमाया: इज़्ज़त की मौत ज़िल्लत की ज़िंदगी से बेहतर है, और इसी तरह ज़ालिम की बैअत को क़बूल न करते हुए फ़रमाया: अल्लाह की क़सम अपना हाथ ज़िल्लत और अपमान के हाथ में कभी नहीं दूंगा और ग़ुलामों की तरह तुम्हारे आगे नहीं झुकूंगा।

विलायत पोर्टल : कर्बला एक ऐसा अज़ीम मकतब है जिसने इंसानियत को ज़िंदगी के हर पहलू में इंसानियत की सीख दी है और फ़िक्र रखने वालों को अपने सामने झुकने पर मजबूर कर दिया है, आशूरा की तालीमात हर इंसान के हमेशा बाक़ी रहने वाली सीख है जिनमें से कुछ की तरफ़ इशारा किया जा रहा है।

हुर्रियत और आज़ादी
कर्बला के इंक़लाब का सबसे अहम सबक़ आज़ादी और ज़ुल्म के आगे न झुकना है, इमाम हुसैन अ.स. ने फ़रमाया: इज़्ज़त की मौत ज़िल्लत की ज़िंदगी से बेहतर है, और इसी तरह ज़ालिम की बैअत को क़बूल न करते हुए फ़रमाया: अल्लाह की क़सम अपना हाथ ज़िल्लत और अपमान के हाथ में कभी नहीं दूंगा और ग़ुलामों की तरह तुम्हारे आगे नहीं झुकूंगा।
इसी तरह कर्बला में जब आपको जंग और बैअत के बीच में से किसी एक को चुनने को मजबूर कर दिया गया तो आपने फ़रमाया: नापाक के नापाक बेटे ने मुझे दो चीज़ों तलवार और अपमान के बीच लाकर खड़ा कर दिया है तो याद रखना ज़िल्लत और अपमान हमसे कोसों दूर है।
आशूर के इंक़लाब ने दुनिया के सारे मज़लूमों को ज़ुल्म के मुक़ाबले खड़े होने की हिम्मत अता की है, यही वजह है कि भारत को अहिंसा की राह दिखा कर आज़ादी दिलाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी जी भी यह कहने पर मजबूर हो गए कि: मैं भारत के लोगों के लिए कोई नई चीज़ लेकर नहीं आया, मैं केवल उस नतीजे को जो मैंने कर्बला के वीरों की ज़िंदगी को पढ़ने के बाद हासिल किया उसे गिफ़्ट के तौर पर तुम्हारे लिए लाया हूं, अगर तुम लोग भारत देश को ज़ुल्म से नजात दिलाना चाहते हो तो हुसैन इब्ने अली की सीरत पर अमल करना पड़ेगा।

अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर
आशूर के इतिहास में यज़ीद की हुकूमत सबसे बड़ा मुन्कर और सबसे बड़ी बुराई है हक़ और सच्चाई का डंका बजाने और ज़ुल्म को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए जंग करना सबसे बड़ा मारूफ़ और नेकी है, इसलिए अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर कर्बला के इंक़लाब का सबसे अहम फ़लसफ़ा है, इमाम हुसैन अ.स. ने मोहम्मद इब्ने हनफ़िया के नाम लिखे जाने वाले वसीयत नामे में कुछ इस तरह लिखा कि: मैं बग़ावत कर के या किसी पद की लालच में मदीना छोड़ कर नहीं जा रहा हूं, मेरा मक़सद केवल नाना की उम्मत में सुधार लाना, अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर करना और अपने बाबा की सीरत पर अमल करना है।
इमाम के इस बयान से आपके इंक़लाब और मिशन में अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर की अहमियत को पूरी तरह से साफ़ हो जाती है, जैसाकि आपकी ज़ियारत में भी इस बात को बयान किया गया है।

वफ़ादारी
अहद को पूरा करना ईमान की निशानी है, हदीस में है कि: ईमान की एक निशानी वादे का पूरा करना है।
जब हम आशूर के दिन पेश आने वाली चीज़ों की तरफ़ देखते हैं तो एक तरफ़ वफ़ादारी के लिए जान निछावर कर देने वाले जियाले नज़र आते हैं दूसरी तरफ़ वादा ख़िलाफ़ी और अहद को तोड़ने वालों का लश्कर दिखाई देता है।
एक तरफ़ बे वफ़ाई की हद ख़त्म थी दूसरी तरफ़ इमाम हुसैन अ.स. वफ़ादारी की मिसाल बन कर सामने खड़े थे और न केवल इमाम हुसैन अ.स. बल्कि आपके बहत्तर साथी भी वफ़ादारी की आख़िरी मंज़िल पर थे, जब शबे आशूर इमाम हुसैन अ.स. एक एक कर के सबके क़त्ल होने की ख़बर दे रहे थे तो उनमें कोई एक भी ऐसा नहीं था जिसने दर्दनाक मौत की ख़बर सुनकर सर झुका लिया बल्कि इमाम द्वारा ख़बर सुनाए जाने के बाद ऐसे जुमले कहे जिसको पढ़ कर इंसान की अक़्ल हैरान है जबकि इमाम अपनी बैअत उनके कंधों से उठा चुके थे, आख़िरकार इमाम हुसैन अ.स. को यह कहना पड़ा: मैं अपने असहाब से ज़्यादा वफ़ादार किसी और के असहाब को नहीं पहचानता।
हज़रत अब्बास और उनके भाईयों को दुश्मन ने अमान की पेशकश की लेकिन उन्होंने उनकी अमान को क़बूल नहीं किया और ऐसा किरदार पेश किया कि इतिहास में वफ़ादारी की मिसाल बन गए या यूं समझ लीजिए कि वफ़ादारी का दूसरा नाम ही अब्बास हो गया।

ख़ुलूस
ख़ुलूस कर्बला के इंक़लाब में एक बहुत क़ीमती चीज़ है।
कर्बला के इंक़लाब के बाक़ी रहने का सबसे अहम राज़ यही है, और अल्लाह ने वादा भी किया है जिस किसी में भी यह सिफ़त पाई गई अल्लाह उसके अज्र और ईनाम को बर्बाद नहीं होने देगा बल्कि इस दुनिया में भी अता करेगा और आख़ेरत में भी अता करेगा।
दुनिया में बुराई के ख़िलाफ़ बहुत से लोगों ने आवाज़ उठाई बहुत से लोगों ने ख़ून दिया लेकिन समय गुज़रने के साथ साथ उनको धीरे धीरे भुलाया जाता गया जिसकी साफ़ वजह यही थी कि उनके अमल में ख़ुलूस नहीं पाया जाता था, दुनिया का अकेला इमाम हुसैन अ.स. का ही लाया हुआ इंक़लाब ऐसा है जो समय के गुज़रने के साथ साथ अपनी छाप और गहरी छोड़ता जा रहा है, जिससे जुड़ने वाले लोगों की तादाद बढ़ती ही जा रही है।
इमाम हुसैन अ.स. ने मदीने से निकलने से लेकर अपनी शहादत तक की जाने वाली तक़रीरों में कई बार इस चीज़ का ज़िक्र किया कि ऐ अल्लाह तू गवाह रहना मैंने यह क़दम दुनिया की हुकूमत के लिए नहीं उठाया।
और आपका यही ख़ुलूस था जो आपको आपके मिशन में कामयाब होने से कोई नहीं रोक पाया।

हेजाब और पाकदामनी
औरत की करामत और बुज़ुर्गी उसकी पाकदामनी में ही है, और हेजाब औरत की पाकदामनी को बचाने और समाज को नैतिक बुराईयों से बचाने का सबसे अच्छा ज़रिया है, इमाम हुसैन अ.स. और जनाब ज़ैनब स.अ. ने कर्बला में अपने अमल और अपनी ज़ुबान दोनों से हेजाब पर बहुत ज़ोर दिया है।
शबे आशूर इमाम ने अहलेबैत अ.स. के साथ बातचीत में उन्हें हेजाब की वसीयत की।
आशूर के दिन जब इमाम हुसैन अ.स. ने बच्चियों के तेज़ रोने की आवाज़ सुनी तो जनाब अब्बास और जनाब अली अकबर को भेज कर उन्हें दिलासा दिलाया।

इमाम हुसैन अ.स. के इंक़लाब का मक़सद सही ज़िंदगी की डगर दिखाना था इसलिए अगर आज हमारी ज़िंदगी में वह सीरत नज़र नहीं आई तो कल क्या इमाम को मुंह दिखाएंगे!!!

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