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आयतुल्लाह मुहम्मद तक़ी फ़लसफ़ी।

उन्होंने अपने जीवन में दो पहलवी तानाशाहों का पतन देखा। इन दो शासकों के काल में लोगों के जीवन पर आयतुल्लाह फ़लसफ़ी का प्रभाव, उनकी अत्याचार विरोधी और न्यायप्रिय भावना को दर्शाता है।

उन्होंने अपने जीवन में दो पहलवी तानाशाहों का पतन देखा। इन दो शासकों के काल में लोगों के जीवन पर आयतुल्लाह फ़लसफ़ी का प्रभाव, उनकी अत्याचार विरोधी और न्यायप्रिय भावना को दर्शाता है।

ईरानी सांसद और विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डाक्टर ग़ुलाम हद्दाद आदिल का कहना है कि आयतुल्लाह फ़लसफ़ी की स्पष्ट विशेषता यह थी कि वह भ्रष्ट विचारधाराओं के संबंध में अधिक संवेदनशील थे और प्रयास करते थे कि लोगों में कुछ जागरूकता पैदा करके उनको पथभ्रष्टता से दूर किया जाए। स्वर्गीय मुहम्मद फ़लसफ़ी वर्तमान समय में पेश आने वाले मामलों में पूर्ण दक्ष थे और उनके विचार प्राचीन नहीं थे। वह हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के उस कथन पर अर्थात अपने समय के ज्ञानी थे, पूर्ण रूप से उतरते थे। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने अपने भाषणों और उपदेशों के माध्यम से लोगों को विभिन्न मामलों से अवगत कराया। वास्तव में उनकी कला और ख्याति तथा उनके विवेकपूर्ण भाषण और उपदेश, उनके ज्ञान और ईश्वरीय भय का परिणाम थे। इस प्रसिद्ध उपदेशक ने अत्याचारी पहलवी शासक के काल में अपनी शोला बयानी से कम्युनिस्ट, धर्म विरोध और बहायियत के ख़तरों से सबको अवगत कराया। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने इस्लामी क्रांति में भी प्रभावी भूमिका निभाई और इमाम ख़ुमैनी का खुलकर साथ दिया और उनके निष्ठावान साथियों में समझे जाते थे।

आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने पंद्रह से अधिक पुस्तकें लिखी हैं और शिष्टाचार, धर्म, प्रशिक्षण और राजनीति के विषयों पर उनके कई मूल्यवान भाषण भी मौजूद हैं।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने वर्ष 1373 हिजरी शम्सी में उनसे अपनी यादों को एक ऐतिहासिक स्रोत के रूप में लिखने की अपील की । उन्होंने भी इस अपील को स्वीकार किया और अपनी जीवनी पर एक पुस्तक लिखी। यह मूल्यवान पुस्तक आयतुल्लाह फ़लसफ़ी की यादों का एक मूल्यवान संग्रह है।

मुहम्मद तक़ी फ़लसफ़ी का जन्म वर्ष 1286 हिजरी शम्सी बराबर 1907 ईसवी में एक धार्मिक परिवार में हुआ। उनके माता पिता ईश्वरीय भय रखने वाले थे और उन्होंने बहुत ही प्रेम से अपनी संतान का पालन पोषण किया। उनके पिता अपने समय के वरिष्ठ धर्मगुरू थे जिनके पास भारी संख्या में छात्र और धर्म गुरू पढ़ने आया करते थे। आम लोग भी अपने व्यक्तिगत व धार्मिक मामलों के समाधान के लिए उनके पास आया करते थे। इस प्रकार से मुहम्मद तक़ी फ़लसफ़ी बचपन से ही समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से परिचित हो गये थे।

वह युवाकाल में ही समझ गये कि उनकी माता की इच्छा है कि उनका बेटा उपदेशक बने। वह इस बारे में स्वयं कहते हैं कि चूंकि मेरी माता इमाम हुसैन अलैहिस्सला से बहुत प्रेम करती थीं, उनकी इच्छा पूरी हुई और मुझे उपदेशक व भाषणकर्ता बनने के मार्ग पर लगा दिया। इस प्रकार से आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने पंद्रह वर्ष की अल्पायु में ही धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के अतिरिक्त सप्ताह के अंतिम दिन को भाषण से विशेष किया। बड़े होकर उन्होंने मिंबर पर अपने पहले भाषण में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की जीवनी को बयान किया और श्रोताओ को मंत्र मुग्ध कर लिया कि सभी उनकी प्रशंसा करने लगे। भाषण में उनकी अद्वितीय क्षमता के कारण ही शीघ्र की तेहरान सहित ईरान के कई नगरों में प्रसिद्ध हो गये और ईरान के प्रसिद्ध भाषणकर्ताओं में उनकी गिनती होने लगी।

आयतुल्लाह फ़लसफ़ी अपने भाषण में दृष्टिगत विषय को इतने प्रभावी व अच्छे ढंग से बयान करते थे और इतने सूक्ष्म बिन्दु बयान करते थे कि श्रोता हतप्रभ रह जाते थे और उनको नई नई जानकारियां मिलती थीं। इस प्रकार से वर्ष 1305 में जब वह बीस वर्ष के थे, उन्हें संसद में मजलिस पढ़ने और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की जीवनी पर प्रकाश डालने का निमंत्रण दिया गया।

ईरान का अत्याचारी शासक रज़ा ख़ान पहलवी जो ब्रिटेन की सहायता से सत्ता में पहुंचा था, पश्चिमी सभ्यता में बहुत रुचि रखता था और उसने देश में धार्मिक सभ्यता व संस्कृति को प्रभावहीन व अलग थलग करने का संकल्प कर लिया था। उसने धर्मगुरूओं पर सख़्तियां करना आरंभ किया और महिलाओं के इस्लामी आवरण का विरोध करने लगा। सरकार की ओर से बढ़ते प्रतिबंधों और सख़्तियों के कारण वर्ष 1314 के बाद से धार्मिक सभाओं का आयोजन बंद हो गया।

किन्तु ईरान की जनता और धर्म गुरू, धर्म विरोधी और पश्चिम की ओर झुकाव वाली इस नीति के विरुद्ध उठ खड़े हुए और मुहम्मद तक़ी फ़लसफ़ी भी अपने पिता के साथ इस संघर्ष में शामिल हो गये। मुहम्मद तक़ी जो अपने भाषण के साथ अपनी पढ़ाई भी कर रहे थे, अपनी शोला बयानी को जारी रखा। उनके भाषण की कई विशेषताएं हैं। पहली यह कि उनके भाषण उट पटांग व परिणामहीन बातों से दूर थे और समाज में प्रचलित रंग से दूर होते थे। दूसरे यह कि वह शिष्टाचारिक, प्रशिक्षण संबंधी और सामाजिक मामलों को पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के पुष्ट कथनों के माध्यम से बयान करते थे। वह समाज के नैतिक व सामाजिक पतन की आलोचना करते थे और उनका प्रयास होता था कि इन अनुचित बातों से मुक़ाबले के लिए धार्मिक शिक्षाओं पर आधारित समाधान लोगों के सामने पेश करें। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी इसी प्रकार तत्कालीन सरकार के क्रियाकलापों और कार्यक्रमों की आलोचना करते थे ‍ और पश्चिम और विदेशियों की ओर रुझहान तथा अनेकेश्वरवाद के धुर विरोधी थे। उन्होंने उस घुटन भरे वातावरण में बड़ी ही वीरता और साहस से समस्याओं को बयान किया और उनकी आलोचनाएं सम्मान व नैतिकता को ध्यान में रखकर होती थीं। यह विशेषता कारण बनी कि उपदेश और भाषण में आयतुल्लाह फ़लसफ़ी का आर्कषक बयान व शैली, अन्य धर्मगुरूओं के लिए आदर्श बन गयी और वर्तमान समय में भी बहुत से भाषणकर्ता और उपदेशक अपने बयानों में उनकी शैली का अनुसरण करते हैं।

कई बार सरकार की ओर से मुहम्मद तक़ी फ़लसफ़ी के भाषण देने पर प्रतिबंध लगाया गया क्योंकि अत्याचार शाही सरकार को आलोचना सुनना पसंद नहीं था। दूसरी ओर तत्कालीन सरकार बहुत सरलता से इन्हें अपने मार्ग से नहीं हटा सकी क्योंकि ईरानी जनता आयतुल्लाह फ़लसफ़ी को बहुत पसंद करते थे और उनकी भाषण की कैसेटें पूरे ईरान में फैल चुकी थीं।

समय की स्थिति से परिचित आयतुल्लाह मुहम्मद तक़ी फ़लसफ़ीह विदेश में रहने वाले धड़ों के भी संपर्क में थे और आयतुल्लाह सैयद हसन मुदर्रिस जैसे संघर्षकर्ताओं के संपर्क में थे। इसी परिधि में वर्ष 1948 में अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के गठन के बाद मुहम्मद तक़ी फ़लसफ़ी ने लोगों के भव्य समारोह में जनता तथा धर्मगुरूओं को ज़ायोनी शासन के विरुद्ध उठ खड़े होने का अह्वान किया।

उस काल में और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ईरान में हिज़्बे तूदे अर्थात जनता पार्टी का गठन हुआ और लोगों विशेषकर छात्रों और सरकारी कर्मियों में कम्युनिस्ट की विचारधार तेज़ी से फैलने लगी। हिज़्बे तूदे अपनी अनेकेश्वरवादी विचारधारा के साथ ईरानी जनता की इस्लामी आस्था के लिए बड़ा ख़तरा समझी जाती थी। क्योंकि यह पार्टी समाचार पत्रों और सम्मेलनों में इस्लामी विचारधारा का उपहास करती थी। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी उस समय हिज़्बे तूदे के ख़तरे के बारे में कहते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद देश में अफ़रा तफ़री के वातावरण ने भ्रष्ट और दिगभ्रमित विचारा से संपन्न गुटों के लिए उचित स्थिति पैदा कर दी थी और इन गुटों ने समाचार पत्रों में खुलकर ईश्वर और उसके दूतों का अनादर करना आरंभ कर दिया इसीलिए मैंने अपने भाषण और उपदेशों में वर्तमान समस्या को उजागर किया और खुलकर इस्लाम धर्म की पवित्र चीज़ों के अनादर की निंदा की।

उनका मानना था कि उस समय जब अमरीका और ब्रिटेन ईरान से निकटता के प्रयास में थे और सोवियत संघ भी ईरान में हिज़्बे तूदे को मज़बूत और कम्युनिस्ट विचारधारा फैलाकर अपनी पैठ बनाने के प्रयास में था। चिंता का विषय यह था कि हिज़्बे तूदे विदेशी समर्थन से ईरान में अपना प्रचार कर रही थी, उस संकटमयी स्थिति में धर्मगुरूओं ने जो देश की राजनैतिक स्थिति और इस्लाम को हानि पहुंचने से अनभिज्ञ नहीं थे, लोगों को हिज़्बे तूदे के काले करतूतों से अवगत कराने का प्रयास किया।

आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने पथभ्रष्टता से संघर्ष की आवश्यकता को समझते हुए सोवियत संघ के इस गुट से संघर्ष आरंभ किया और महत्त्वपूर्ण सभाओं में इस गुट के काले करतूतों से लोगों को अवगत कराते थे। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी के ठोस तर्कों और शोला बयानीं से असहाय हिज़्बे तूदे के कार्यकर्ता जो उनके ठोस तर्कों का उत्तर पेश करने में अक्षम थे, आयतुल्लाह फ़लसफ़ी से द्वेष करने लगे और कई बार उनपर जानलेवा आक्रमण भी किया किन्तु वे सफल न हो सके।

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