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आयतुल्लाह बहजत र.ह. की अख़लाक़ी नसीहतें

नबियों के अख़लाक़ का जीती जागती मिसाल जिसको देख कर ख़ुदा की याद दिल में ताज़ा हो जाए, जिसके अख़लाक़ और किरदार में इमामों के अख़लाक़ और किरदार की झलक पाई जाती थी, इस हस्ती को अभी दुनिया से गुज़रे हुए ज़्यादा समय नहीं बीता, अब भी ऐसा ही महसूस होता है कि क़ुम की फ़िज़ा में इस रब्बानी आलिम की आवाज़ गूंज रही है, जहां उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी शिया मज़हब की ख़िदमत में गुज़ारी वहीं अलग अलग अवसर पर लोगों को अपने किरदार और गुफ़्तुगू से इस्लामी अख़लाक़ की भी सीख दी है, इस लेख में हम संक्षेप में आयतुल्लाह बहजत र.ह. की कुछ नसीहतें पेश कर रहे हैं।

विलायत पोर्टलः अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुंकर का सबसे बेहतरीन और लोगों को प्रभावित करने का तरीक़ा यह है कि अम्र बिल मारूफ़ (वाजिब हो या मुस्तहब) और नहि अनिल मुंकर (चाहे मकरूह ही क्यों न हो) करने वाला ख़ुद उस पर अमल करता हो, मासूमीन अ.स., अंबिया अ.स., उलमा और नेक लोगों के अख़लाक़ को अपनाए हुए हो, और दुनिया के पीछे भागने वालों और फ़ासिक़ के अमल और उनके रवैये से दूरी बनाए हो ताकि अपने अमल, रवैये और अख़लाक़ से लोगों को नेकी की तरफ़ बुलाया जा सके और बुराईयों से दूर रहने की नसीहत की जा सके और लोग भी उसकी पैरवी करें, विशेष कर अगर अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुंकर करने वाला मज़हबी रहनुमा और आलिम हो तो ऐसे समय में उसकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, क्योंकि हदीसों में उलमा को नबियों का वारिस कहा गया है। (काफ़ी, जिल्द 1, पेज 34)

अगर शीयत के इतिहास को पढ़ा जाए तो उसके पन्नों में बहुत सारे सच्चे और बा अमल उलमा चमकते दिखाई देंगे जिनकी मेहनतों और कोशिशों की वजह से आज शिया मज़हब को दुनिया में एक ख़ास दर्जा हासिल है, उन्हीं चमकते सितारों में से एक रौशन सितारा ऐसा है जिसने अपने इल्म और अमल की रौशनी से अंधेरे में भटकते दिलों को रौशनी दी, मानवियत में वह दर्जा हासिल किया कि हर शख़्स उस दर्जे को हासिल करने की तमन्ना अपने दिल में रखता है, मेरी मुराद कुछ ही साल पहले इस दुनिया को छोड़ कर अल्लाह की बारगाह में हाज़िर होने वाले बा अमल आलिम आयतुल्लाह मोहम्मत तक़ी बहजत र.ह. हैं जिन्होंने अपने सारी ज़िंदगी शीयत की ख़िदमत में गुज़ार दी, इल्म और इज्तेहाद के मैदान में जिनकी कोई मिसाल नहीं थी और अगर उनको मुसल्ले पर इबादत की हालत में देख जाए तो ऐसा लगता है कि उनकी रूह अभी जिस्म से निकल जाएगी।

नबियों के अख़लाक़ का जीती जागती मिसाल जिसको देख कर ख़ुदा की याद दिल में ताज़ा हो जाए, जिसके अख़लाक़ और किरदार में इमामों के अख़लाक़ और किरदार की झलक पाई जाती थी, इस हस्ती को अभी दुनिया से गुज़रे हुए ज़्यादा समय नहीं बीता, अब भी ऐसा ही महसूस होता है कि क़ुम की फ़िज़ा में इस रब्बानी आलिम की आवाज़ गूंज रही है, जहां उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी शिया मज़हब की ख़िदमत में गुज़ारी वहीं अलग अलग अवसर पर लोगों को अपने किरदार और गुफ़्तुगू से इस्लामी अख़लाक़ की भी सीख दी है, इस लेख में हम संक्षेप में आयतुल्लाह बहजत र.ह. की कुछ नसीहतें पेश कर रहे हैं।

गुनाह ज़हर है

एक नौ जवान आयतुल्लाह बहजत र.ह. से किसी ज़िक्र तालीम देने को कहता है जिसे वह हर समय पढ़ता रहे, आपने जवाब में फ़रमाया, कोई भी ज़िक्र हमेशा गुनाह से दूर रहने का इरादा करने से अहम और बेहतर नहीं है, अगर अल्लाह तुमको सौ साल की ज़िंदगी दे और तुम उस ज़िंदगी में एक गुनाह भी न करो तो यह बिल्कुल ऐसा ही जैसे कोई इंसान ज़हर खाना तो दूर की बात ज़हर खाने का इरादा भी नहीं रखता और गुनाह की मिसाल भी ज़हर जैसी ही है। (नफ़्से मुतमइन्ना, महदी अब्बासी, पेज 23)

फिर आपने फ़रमाया, इंसान का अपनी ज़िंदगी में पहला गुनाह ही पता नहीं उसे कहां पहुंचा दे, यानी अगर एक क़दम भी अल्लाह की मर्ज़ी के बिना उठाया जाए तो बाद वाले क़दम उसे कहां ले जाएंगे वह सोंच भी नहीं सकता, पहला क़दम उसे इतनी गहराई में पहुंचा देगा जिसके ख़्याल कभी उसके दिमाग़ में भी नहीं आया होगा। (नफ़्से मुतमइन्ना, महदी अब्बासी, पेज 23)

अगर कोई शख़्स गुनाहों के दलदल से निकलना चाहता है तो उसका केवल रास्ता यह है कि सच्चे दिल और ख़ालिस नियत के साथ अल्लाह की बारगाह में तौबा करे, और अगर तौबा किसी ख़ास मौक़े, ख़ास जगह और ख़ास समय पर की जाए तो उसके क़ुबूल होने के चांस काफ़ी बढ़ जाते हैं, ख़ास जगहों जैसे बैतुल्लाह यानी काबे के पास, मस्जिदुन नबी स.अ., मासूमीन अ.स. की क़ब्रों और उनके हरम में, ख़ास दिनों जैसे यौमे अरफ़ा, शबे क़द्र, तो इन मौक़ों से फ़ायदा हासिल करते हुए अल्लाह की बारगाह में माफ़ी मांगी जाए तो हो सकता है कि अल्लाह इन हस्तियों की बरकत से गुनाहों को माफ़ कर दे और इंसान को बख़्श दे।

तक़वा अपनाएं

एक बार नौजवानों का एक ग्रुप मशहद इमाम रज़ा अ.स. की ज़ियारत के लिए गया, ज़ियारत के बाद उन्हें आयतुल्लाह बहजत र.ह. (जो उन दिनों मशहद ही में थे) से मुलाक़ात का मौक़ा मिला तो आपने उनसे कहा, इंशा अल्लाह ख़ुदा आपकी ज़ियारत क़ुबूल फ़रमाए और को इंसान, जिन्नात और शैतान के शर और दुनिया और आख़ेरत की ज़ाहिरी और बातिनी आफ़तों से महफ़ूज़ रखे, हर हाल में अल्लाह के साथ रहें और अल्लाह को कभी मत भुलाएं ताकि हम अपने आपको न भुलाएं। (नफ़्से मुतमइन्ना, महदी अब्बासी, पेज 25)

अल्लाह सभी मोमिन मर्दों और औरतों को कामयाबी अता करे ताकि महशर के दिन पुले सेरात पर उनके पैर जमे रहें और हमेशा अल्लाह से सआदत की दुआ करते रहें ताकि शैतान के शर से दूर रह सकें और अल्लाह उसके ख़ास अंबिया और क़रीबी औसिया से से क़रीब हो जाएं।

समय होते ही नमाज़ का पढ़ना

नमाज़ एक ऐसा वाजिब अमल है जिसको अंजाम देने की क़ुर्आन और मासूमीन अ.स. ने बहुत ताकीद की है, यहां तक कि नमाज़ को इस्लाम और कुफ़्र के बीच फ़र्क़ समझने का पैमाना क़रार दिया है। (मीज़ानुल हिकमा, जिल्द 6, पेज 318)

अगर इमामों की हदीसों को पढ़ें तो हमें पता चलेगा कि नमाज़ को न पढ़ना तो दूर नमाज़ को मामूली समझने वाले और देर से नमाज़ पढ़ने वाले को अहलेबैत अ.स. की शफ़ाअत हासिल नहीं होगी (अल-महासिन, जिल्द 1, पेज 80) जबकि दूसरी तरफ़ नमाज़ का समय आते ही नमाज़ पढ़ने की बहुत ज़्यादा फ़ज़ीलत और सवाब बयान किया गया है, और समय पर नमाज़ पढ़ने की पाबंदी इंसान को मानवी कमाल और रूहानी दर्जों तक ले जाती है, इसी बात की तरफ़ इशारा करते हुए आयतुल्लाह बहजत र.ह. फ़रमाते हैं कि मैंने नजफ़ में अपने अख़लाक़ के उस्ताद से सुना है कि जो शख़्स पाचों वक़्त की नमाज़ों को उनके समय आते ही अदा करे तो वह बुलंद दर्जों पर पहुंचेगा और अगर कोई यह काम करे और उन मानवी और रूहानी दर्जों तक न पहुंचे तो मुझ पर लानत भेजे। (नफ़्से मुतमइन्ना, पेज 28)

अल्लाह के वलियों के साथ उठना बैठना

इन्हीं बुलंद दर्जों में से एक नबियों और वलियों के साथ उठना बैठना और उनसे क़रीब होना है, आज के दौर में हम यह बहाना नहीं कर सकते कि नबी और वली हमारे दौर में मौजूद नहीं हैं, अगर वह हमारे बीच होते तो हम उनके साथ उठते बैठते, और यह बहाना इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि हमरे पास उन पाक हस्तियों से जुड़ी ऐसी चीज़ें मौजूद हैं जिनसे क़रीब होना उन पाक हस्तियों से क़रीब होने जैसा है, हमारे बीच क़ुर्आन है जिसके साथ उठना बैठना (यानी उसे अपनी ज़िंदगी में उतारना) ऐसा ही है जैसे हम पैग़म्बर स.अ. के साथ उठ बैठ रहे हैं, नहजुल बलाग़ा और सहीफ़-ए-सज्जादिया को हमेशा साथ रखना ऐसा ही है जैसे हमने इमाम अली अ.स. और इमाम सज्जाद अ.स. के साथ उठ बैठ रहे हों, यानी इन किताबों को पढ़ना इन पर अमल करना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे हमने ख़ुद पैग़म्बर स.अ. को सुना और उनकी इताअत की, नहजुल बलाग़ा और सहीफ़-ए-सज्जादिया की शक्ल में इमाम अली अ.स. और इमाम सज्जाद अ.स. हम से बातें कर रहे हैं, हो सकता है कि हम इन पाक हस्तियों से जुड़ी इन पाक किताबों के बताए हुए नुस्ख़ों पर अमल कर के कामयाब हो जाएं और उन ऊंचे और बुलंद मानवी दर्जों तक पहुंच जाएं कि जहां पहुंच कर हमारे काम उनकी आवाज़ सुनने लगें, और यह मुमकिन है, इसे हम न होने वाली चीज़ नहीं कह सकते, क्योंकि उनकी आवाज़ आज भी फ़िज़ा में मौजूद है। (गौहरहाए हकीमाने, महदी आसमी, पेज 30)

ज़ुबान की हिफ़ाज़त

आयतुल्लाह बहजत र.ह. फ़रमाते हैं, इंसान को अपनी ज़ुबान से निकलने वाले शब्दों पर ध्यान देना चाहिए, और बातचीत में बहुत एहतियात बरतनी चाहिए, क्या कोई यह ज़िम्मेदारी ले सकता है कि उसकी ज़ुबान से निकले हुए शब्द दस लोगों के बयान करने के बाद वही रहेंगे जो उसने कहे थे? इसलिए हर वह काम जिसे इंसान अपने लिए जाएज़ समझे, अल्लाह से तौफ़ीक़ की दुआ मांगते हुए उसे अंजाम दे और अल्लाह से निजात की दुआ करे ताकि उसकी ज़िंदगी का अंजाम ख़ैर पर हो और महशर के दिन उसकी गर्दन किसी ज़िम्मेदारी को बोझ से झुकी हुई न हो जिसे उसने पूरा न किया हो। (गौहरहाए हकीमाने, महदी आसमी, पेज 24)




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