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आयतुल्लाह ख़ामनेई का अमेरिका और यूरोप के जवानों के नाम पत्र

अमेरिका और यूरोपीय देश गुलामी जैसी प्रथा से शर्मसार हैं, साम्राज्य कूट कूट कर भरा है, ईसाईयों और गोरों के अलावा हर किसी पर अत्याचार कर के शर्म से इन देशों का सर झुका हुआ है, आपके विद्वानों और इतिहासकारों ने कैथोलिक, इंजील और और दूसरे किसी धर्म और ज़ात के नाम से पहले और दूसरे विश्व युध्द में जो ख़ून ख़राबा किया है उस पर गहरा अफ़सोस जताया है।

विलायत पोर्टलः कुछ साल पहले फ़्रांस में होने वाली घटनाओं और इस्लामी जगत से जुड़े उनके कई आस्था के केंद्रों का फ़्रांस की मैगज़ीन द्वारा मज़ाक़ उड़ाए जाने और पश्चिमी मीडिया और उनके उच्च अधिकारियों द्वारा इस्लाम विरोधी बातें करने और इस्लाम को ख़तरा बताए जाने पर आयतुल्लाह ख़ामेनई ने यूरोप और उत्तरी अमेरिकी देशों के नाम एक ख़त लिखा था जो कि इंग्लिश में छपा था बाद में अनेक ज़बान में उसका तर्जुमा भी हुआ, हम यहां उसका हिंदी तर्जुमा पेश कर रहे हैं।

यूरोप और उत्तरी अमेरिका के आम नागरिकों के नाम

फ़्रांस में हाल ही में होने वाली घटना और यूरोप की कुछ घटनाओं ने मुझे आप लोगों से सीधे बात चीत करने पर मजबूर कर दिया, मैं केवल आप जवानों से अपनी बात कहना चाहता हूं, इसका मतलब यह नहीं कि मैं आप लोगों के मां बाप को अनदेखा कर रहा हूं, बल्कि इसलिए क्योंकि आपके अपने अपने देशों का भविष्य आप के हाथों में देख रहा हूं और हक़ीक़त को जानने की भूख आपने वालेदैन से अधिक आप लोगों के अंदर महसूस कर रहा हूं, और इसी तरह मेरे इस पत्र का आपके राजनेताओं और अदिकारियों से भी कोई लेना देना नहीं है क्योंकि मेरा मानना है कि उन्होंने जान बूझ कर राजनीति को सच्चाई और ईमानदारी से अलग कर दिया है।

मैं इस्लाम के बारे में अपनी बात केवल आप जवानों से कहना चाहता हूं विशेष कर इस्लाम का जो चेहरा आपके लिए पेश किया गया है उसको लेकर कुछ बातें कहनी है।

दो दशक पहले से आज तक (सोवियत संघ के पतन से अब तक) काफ़ी बड़े पैमाने पर कोशिशें की गई हैं ताकि इस महान धर्म के चेहरे को ख़ौफ़नाक बना कर पेश किया जाए, डर और नफ़रत की भावना पैदा करना और फिर उसका फ़ायदा उठाना पश्चिमी देशों के राजनीतिक इतिहास का अहम पन्ना है, मैं इस पत्र द्वारा आपसे उस डर और भय के बारे में बात नहीं करना चाहता जिस से बहुत से पश्चिमी देश प्रेरित हो गए हैं, क्योंकि आप लोग ख़ुद हालिया इतिहास के अध्ययन से यह बात समझ सकते हैं क्योंकि इस नए ऐतिहासिक विष्लेषणों में पश्चिमी देशों द्वारा दूसरे देशों के साथ की गई बे ईमानियों और धोखा धड़ी को ज़िक्र मौजूद है।

अमेरिका और यूरोपीय देश गुलामी जैसी प्रथा से शर्मसार हैं, साम्राज्य कूट कूट कर भरा है, ईसाईयों और गोरों के अलावा हर किसी पर अत्याचार कर के शर्म से इन देशों का सर झुका हुआ है, आपके विद्वानों और इतिहासकारों ने कैथोलिक, इंजील और और दूसरे किसी धर्म और ज़ात के नाम से पहले और दूसरे विश्व युध्द में जो ख़ून ख़राबा किया है उस पर गहरा अफ़सोस जताया है।

यह और बात है कि इस बात का ज़िक्र अपनी जगह प्रशंसनीय है और मेरा इस लंबी सूची के कुछ हिस्से को दोहराने का मतलब इतिहास को दोषी ठहराना नहीं है बल्कि मेरा केवल इतना कहना है कि आप अपने विद्वानों और इतिहासकारों से पूछिए कि आख़िर उनका ज़मीर क्यों दस बीस साल और कभी कभी कई सौ साल बाद ही क्यों जागता है? और उनकी अंतरआत्मा क्यों सालों पहले पेश आने वाली घटनाओं के लिए जागती है क्यों हाल में हो रही घटनाओं पर उनकी अंतरआत्मा नहीं जागती? क्यों जनता को महत्वपूर्ण मुद्दे जिस से जागरुकता पैदा हो जैसे इस्लामी संस्कृति और उसके विचारों के बारे में बहस करने और उसके बारे में किसी भी प्रकार की बात चीत करने से रोक देते हैं?

आप लोग अच्छी तरह जानते हैं कि अपमान करना, नफ़रत फैलाना और दूसरों के बारे में फ़र्ज़ी अफ़वाह फैला कर लोगों के दिलों में उनका ख़ौफ़ पैदा करना हमेशा से साम्राज्यवादी ताक़तों का हथकंडा रहा है, मैं चाहता हूं आप लोग ख़ुद अपने आप से सवाल करें कि आख़िर नफ़रत फैलाने और डर पैदा करने की यह पुरानी राजनीति को क्यों और बढ़ा चढ़ा कर इस्लाम और मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? क्यों पूरी दुनिया इस्लामी विचारधारा को एकदम किनारे अलग थलग रखना चाहती है? इस्लामी सिध्दांतों से उनको कौन सी हानि पहुंच रही है और इस्लाम की ग़लत छवि पेश कर के वह कौन सा लाभ हासिल करना चाहते हैं? इसलिए सबसे पहले मेरा आप लोगों से यह कहना है कि इस्लाम के विरुध्द ऐसी विचारधारा लोगों तक पहुंचाने के पीछे क्या कारण था इसके बारे में आप सोंचें और इन लोगों से सवाल करें।

दूसरी बात जो मैं आप लोगों से चाहता हूं वह यह कि नकारात्मक प्रचार और पहले से ही मन में बातों को बिठा लेने के विरुध्द आपकी प्रतिक्रिया यह होना चाहिए कि आप ख़ुद बिना किसी को बीच मे लाए इस्लाम के बारे में मालूमात हासिल करें, अक़्ल और तर्क ख़ुद इस बात को आपसे चाहता है कि जिस चीज़ से आपके दिलों में नफ़रत भरी जा रही है और डराया जा रहा है उसके बारे में जानें तो सही वह है क्या चीज़.... मैं इस बात पर बिल्कुल भी ज़ोर नहीं दे रहा हूं कि मेरी या और दूसरे किसी की भी इस्लाम की अच्छाई से संबंधित बातों को आंख बंद कर के मान लो, बल्कि मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि धर्म की राजनीति करने वालों की इस्लाम विरोधी हर बात को आंख बंद कर के मत मानिए, साम्राज्यवादी ताक़तों द्वारा बनाए गए इस्लाम के ठेकेदारों से इस्लाम मत सीखिए, इस्लाम के बारे में जानकारी के लिए उसके मूल स्रोत यानी क़ुर्आन और पैग़म्बर स.अ. की जीवनी को पढ़िए, मेरा यहां पर आपसे एक सवाल है क्या अभी तक आप ने ख़ुद मुसलमानों की मज़हबी किताब क़ुर्आन को एक बार भी पढ़ा है? क्या ख़ुद आपने नैतिकता और मानवता के लिए पैग़म्बर स.अ. के दिल में पाए जाने वाले दर्द का उनकी जीवनी में अध्ययन किया है? क्या आपने अभी तक मीडिया के अलावा किसी दूसरे रास्ते से भी इस्लामी संदेश को हासिल करने की कोशिश की है? क्या आपने कभी ख़ुद से यह सवाल पूछा है कि इस इस्लाम ने पिछली इतनी शताब्दियों से कैसे और किन आधार पर दुनिया में विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में इतनी तरक़्क़ी की और बड़े बड़े विद्वान और विचारकों को पेश किया?

हमेशा होशियार रहिए कहीं आपके और सच्चाई के बीच कुछ अपमानजनक और अशोभनीय चेहरों द्वारा भावनाओं की दीवार न खड़ी कर दी जाए जिस से आप निष्पक्ष निर्णय ही न ले सकें, आज जबकि एक दूसरे संबंध बनाए रखना इतना आसान हो गया है जिस से सरहदी सीमाओं की भी कोई हैसियत नहीं रह गई होशियार रहिए कहीं आपको काल्पनिक और मानसिक सीमाओं में न घेर दिया जाए, हालांकि व्यक्तिगत रूप से यह दरारें नहीं भरी जा सकतीं लेकिन आप में से हर कोई अपने उच्च विचारों द्वारा इन दरारों पर एक पुल बना गर गुज़र सकता है, इस्लाम और आप जवानों के बीच यह दरार सोंची समझी साज़िश का नतीजा है, मुमकिन है किसी को बुरा लगे, लेकिन इन बातों के बाद हो सकता है आपके दिमाग़ में बहुत सारे नए सवाल पैदा हों और इन्हीं सवालों के जवाब की खोज एक बढ़िया मौक़ा है आपके सच्चाई को समझने के लिए।

इसलिए इस मौक़े को इस्लाम की सही तस्वीर समझने के लिए सुनहरा अवसरे समझें और पहले से किसी फ़ैसले के बिना हक़ीक़त को समझें, ताकि आने वाले समय में इतिहासकार आपके बारे में अफ़सोस न करें।

सैय्यद अली ख़ामनेई

    21/01/2015


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