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आतंकी संगठन दाइश पैदाइश से विनाश तक एक विश्लेषण(4)

शुरूआत में बग़दादी का टार्गेट केवल इराक़ में अपनी हुकूमत बनाना था, लेकिन सीरिया के गृह युध्द को देखने के बाद उसकी नीयत ख़राब हो गई और उसने वहां के हालात से फ़ायदा उठाते हुए सीरिया में भी अपने पैर फैला दिए और वहां भी आतंकी गतिविधियां शुरू कर दीं,

विलायत पोर्टलः पिछले लेख में आपके सामने आतंकी संगठन दाइश की आर्थिक मज़बूती का राज़ और इस संगठन और अल-क़ायदा के बीच का अहम फ़र्क़ बयान किया गया अब आगे......

ध्यान देने वाली बात यह है कि इस आतंकी संगठन को आर्थिक मज़बूत होता देख कई देशों से लगातार आतंकी इस संगठन में शामिल हो रहे थे जिसमें से मुख्य सद्दाम के क़रीबी, कुछ सीरिया इराक़ी सरकार के विद्रोही, यूरोप के कई लड़ाके, चेचेन्या, बोस्निया, तुर्किस्तान, लीबिया, अफ़ग़ानिस्तान और भी कई देशों के थे, इन देशों से आने वाले लोग सीधे इस आतंकी संगठन में शामिल हो कर बग़दादी के इशारों पर काम कर रहे थे।

शुरूआत में बग़दादी का टार्गेट केवल इराक़ में अपनी हुकूमत बनाना था, लेकिन सीरिया के गृह युध्द को देखने के बाद उसकी नीयत ख़राब हो गई और उसने वहां के हालात से फ़ायदा उठाते हुए सीरिया में भी अपने पैर फैला दिए और वहां भी आतंकी गतिविधियां शुरू कर दीं, हालांकि कुछ सूत्रों के अनुसार बग़ादादी की नज़र लेबनान, जार्डन और फ़िलिस्तीन पर भी थी लेकिन उसका यह ख़्वाब केवल ख़्वाब ही बन कर रह गया।

सीरिया में घुसपैठ कर के दाइश ने रक़्का, हस्का और दैरुज़्ज़ोर जैसे बड़े शहरों और इराक़ में मूसेल, तिकरित और अल-अंबार जैसे राज्यों और शहरों पर क़ब्ज़ा कर रखा था, और इन इलाक़ों में अपनी ओर से थोपे गए क़ानूनों को इस्लामी हुकूमत का नाम दे कर वहां के लोगों से टैक्स वसूली करता था, और इन जगहों के तेल के कुएं पर अपना क़ब्ज़ा जता के उसकी आमदनी अपनी जेब में भरता जा रहा था, यही सब कारण थे जिनसे दाइश की दिन प्रतिदिन आमदनी बढ़ती जा रही है।

कोई भी इंसान, परिवार, इदारा, ट्रस्ट अगर दाइश के आगे नहीं झुकता था तो बग़दादी उसे अपना दुश्मन घोषित कर देता और सबसे रोचक बात यह कि इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाने वाले उन्हीं मुसलमानों को काफ़िर ऐलान कर रहे थे जो इनके आतंक को क़ुबूल न करते हुए उनके आतंक से उस इलाके की जनता को बचा रहे थे, इस आतंती संगठन ने गिरफ़्तार होने वालों, अपने दुश्मनों और उनके साथ धोखा करने वालों के लिए अपनी अदालत बना रखी थी, और यह लोग आरोपियों को ऐसी सज़ा देते जिससे मानवता भी कांप जाती।

हक़ीक़त में बग़दादी का सबसे बड़ा हथियार लोगों के दिलों में अपनी दहशत और ख़ौफ़ बिठाना ही था।

गार्जियन, स्पाईजेल और कुछ जार्डन, तुर्की और मिस्र के अधिकारियों ने अवगत कराया है कि दाइश जैसे आतंकी संगठन को अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस के माहिर ट्रेनरों द्वारा जार्डन, तुर्की और इस्राईल में ट्रेनिंग दी गई थी, इस रिपोर्ट से ज़ाहिर है कि अमेरिका जो केवल दिखावा करने के लिए दाइश का विरोध करता है लेकिन इस आतंकी संगठन द्वारा फैलाया गया आतंक उनकी निगाहों के सामने हुआ और उन्हें दाइश की हर छोटी बड़ी गतिविधियों की पूरी ख़बर थी।

और फिर अब बारी इस आतंकी टोले के विनाश की थी, पूरी दुनिया ने देखा जब इस आतंकी संगठन दाइश ने पूरी तरह से मानवता को शर्मसार कर दिया और अमेरिका जैसे देश जो आतंक के सफाया करने की बात करते हैं वह ख़ुद इस संगठन के आतंक को उनको ट्रेनिंग दे कर मज़बूत कर रहे थे, तब कुछ सच्चे मुसलमान जिनमें सुन्नी और शिया दोनों शामिल थे उन्हों ने इराक़ में बुज़ुर्ग मरजा आयतुल्लाह सीस्तानी के दिए गए हुक्म पर अमल करते हुए कफ़न बांध कर मैदान में आ गए और सीरिया हो या इराक़ हर जगह हर छोटे बड़े शहर से उनके विनाश की कमर कस ली।

जनरल क़ासिम सुलैमानी हों या अबू इज़्राईल, शहीद हुसैन हमदानी हों या हश्दुश् शअबी के कमांडर हादी अल-आमेरी या और दूसरे बहादुर इस्लामी सिपाही उन्होंने अपनी बेहतरीन रणनीति से न केवल दाइश के क़ब्ज़ा किए हुए शहरों को आज़ाद कराया बल्कि उनको वहां से भागने पर मजबूर किया, हां यह और बात है कि इस काम के लिए हज़ारों जवानों की क़ुर्बानी भी देनी पड़ी।


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