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आतंकी संगठन दाइश पैदाइश से विनाश तक एक विश्लेषण(1)

ISIS आतंकी संगठन की बुनियाद रखने वाला अबू मसअब ज़रक़ावी था, जो जॉर्डन का रहने वाला था, ज़रक़ावी द्वारा रखी गई यह बुनियाद 2003 में अमेरिका और इराक़ की जंग के दौरान पूरी इमारत बन चुकी थी, 2001 में इराक़ भाग कर आने से पहले ज़रक़ावी अफ़्ग़ानिस्तान के हथियार बंद लड़ाकों का सरगना था, इसने इराक़ पहुंच कर कुर्द अलगाव वादी संगठन अंसारुल इस्लाम के नाम से बनाया और पूरे अरब में इस संगठन का ख़ुद सरगना बन गया

विलायत पोर्टलः दाइश, ISIS, तकफ़ीरी टोला सब एक ही नाम हैं, लेकिन आप इनके बारे में कितना जानते हैं? यह आतंकी संगठन दाइश क्यों और कैसे बना? इस संगठन का समर्थन और सपोर्ट करने वाले कौन लोग हैं? कैसे दाइश एक ताक़तवर और मालदार संगठन के रूप में ज़ाहिर हुआ? इन्ही सब सवालों के जवाब को जानने के लिए यह सिलसिलेवार आर्टिकल आपके सामने पेश किया जा रहा है।

दाइश जो अब बिल्कुल ख़त्म होने की कगार पर है जिसने अपना नाम ISIS यानी Islamic State of Iraq and Syria रखा, यह संगठन ख़ुद को एक सुन्नी जिहादी संगठन कहता है और अपना मक़सद एक ऐसी इस्लामी हुकूमत बनाना बताता है जो शरीयत के आधार पर हो, यह संगठन अल-क़ायदा नामी आतंकी संगठन के बचे हुए अंश से तैय्यार हुआ, अल-क़ायदा वही आतंकी संगठन है जो अमेरिका द्वारा सद्दाम के तख़्ता पलट के लिए इराक़ में उतारा गया था और जिसने पूरे इराक़ और इराक़ियों के ज़िंदगी को अमेरिका के इशारे पर बर्बाद करके रख दिया था।

अमेरिका की ओर से आतंकवाद से लड़ने के कैंपेन और अहले सुन्नत की ओर से क़ौमी बेदारी के नाम से अपने इलाक़े को बचाने की मुहिम शुरू होने के बाद से 2006-2007 से आतंकी संगठन अल-क़ायदा का पतन शुरू हो गया, लेकिन 2011 में अमेरिका के इराक़ से निकलने के बाद से दोबारा इस संगठन ने विशेष कर शिया बहुल इलाक़ों में आत्मघाती हमले और ब्लास्ट शुरू कर दिए, और इनके इस आतंकी हमलों के पीछे मक़सद नूरी मालिकी का सत्ता में आना था।

इस आतंकी संगठन कि शिया दुश्मनी की भावना ने 2013 में 8000 लोगों की जान ले ली, और संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2008 के बाद यह तादाद सबसे अधिक थी, इस आतंकी संगठन ने 2012 में इराक़ में अपना नाम अल-क़ायदा से बदल कर पहले ISIL उसके बाद Islamic State of Iraq and Syria यानी ISIS रख लिया, इराक़ के बाद इन लोगों ने सीरिया में तख़्त पलट के इरादे से आतंक फैलाना शुरू किया, और नतीजे में जून 2014 तक में इराक़ी अहम शहर फ़लूजा, मूसल और कई शहरों से इराक़ी सेना को बाहर खदेड़ते हुए उन पर क़ब्ज़ा कर लिया और इसी तरह सीरिया के सरहदी इलाक़ों के कई शहर पर क़ब्ज़ा करते हुए अपने आतंक को और अधिक लोगों के दिलों में बिठाने में कामयाब हो गए।

दाइश के सरगना अबू बक्र बग़दादी की पहले केवल इराक़ पर नज़र थी लेकिन जब सीरिया में संकंट और कुछ लोगों को हूकूमत के विरुध्द नारेबाज़ी करते हुए देखा तो वह सीरिया पर भी क़ब्ज़ा करने के ख़्वाब देखने लगा, अल-क़ायदा और दाइश के विचारों में सबसे बड़ा फ़र्क़ यह था कि अल-क़ायदा केवल आत्मघाती हमले और गोरिल्ला युध्द कर के अपना ख़ौफ़ लोगों के दिलों में बिठाता था लेकिन दाइश का मक़सद हमले करने और ख़ौफ़ फैलाने के साथ शहरों और राज्यों पर अपना क़ब्ज़ा करना था।

दाइश का गठन

इस आतंकी संगठन की बुनियाद रखने वाला अबू मसअब ज़रक़ावी था, जो जॉर्डन का रहने वाला था, ज़रक़ावी द्वारा रखी गई यह बुनियाद 2003 में अमेरिका और इराक़ की जंग के दौरान पूरी इमारत बन चुकी थी, 2001 में इराक़ भाग कर आने से पहले ज़रक़ावी अफ़्ग़ानिस्तान के हथियार बंद लड़ाकों का सरगना था, इसने इराक़ पहुंच कर कुर्द अलगाव वादी संगठन अंसारुल इस्लाम के नाम से बनाया और पूरे अरब में इस संगठन का ख़ुद सरगना बन गया।

2003 में अमेरिका के इराक़ पर हमला करने से पहले कई वहां के उच्च सैन्य अधिकारियों ने ज़रक़ावी और ज़वाहिरी के गठजोड़ की ख़बर संयुक्त राष्ट्र को दी, बहुत से विशेषज्ञों का कहना है कि अक्टूबर 2004 में ज़रक़ावी ने ज़वाहिरी का विरोध किया जिससे दोनों के बीच मन मुटाव हुआ और ज़वाहिरी ने इसको अपने से अलग कर दिया, ज़रक़ावी द्वारा बनाया हुआ संगठन अल-क़ायदा से अलग हो गया और उसी महीने अक्टूबर 2004 में अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया, न्यू अमेरिकन स्टडीज़ सेंटर के एक सदस्य के अनुसार ज़रक़ावी का अल-क़ायदा से जुड़ा रहा हो या अलग अपना उसका ख़ुद का संगठन हो लेकिन ज़वाहिरी से मिलने का उसने पूरा फ़ायदा उठाया और अपने कुछ ख़ास लोगों को अल-क़ायदा में उसकी गतिविधियों का जानने के लिए छोड़ दिया।

रणनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार 2011 में इराक़ में अल-क़ायदा संगठन की शाखा ने अमेरिकी गठबंधन को हराने के लिए चौगुनी रणनीती बनाई, अमेरिकी सैन्य बल और उसके सहयोगियों को मिटाने के लिए इराक़ियों को किसी भी तरह की अमेरिकी सैनिकों की मदद न करने की धमकी दी ताकि पहले वह इराक़ी सरकार के बुनियादी ढ़ांचे को कमज़ोर कर सकें और इसी तरह मानवीय सहायता करने वालों को भी निशाना बनाना शुरू किया और अमेरिका को शिया सुन्नी के बीच ग्रह युध्द में इस नीयत से खींच कर लाना चाहा ताकि शियों की ज़्यादा से ज़्यादा हत्या हो सके।

दूसरी ओर अंतरिम गठबंधन सरकार ने अमेरिका की अगुवाई में दो अहम फ़ैसले लिए, पहला बाथ पार्टी के सभी सदस्यों को सरकारी पदों से वंचित कर दिया जाए और दूसरे यह कि इराक़ी फ़ौज और इराक़ी सुरक्षा एजेंसियों को भंग कर दिया जाए, यही वह फ़ैसले थे जिससे हज़ारों दुश्मन अमेरिकी गठबंधन के विरुध्द सामने आए।

अल-क़ायदा की इराक़ शाखा के लड़ाकों के ज़रक़ावी के कमांडरों ने पाकिस्तान और अफ़्ग़ानिस्तान से तैय्यार किया उसके बाद सीरिया, इराक़ और आस पास के देशों से और लड़ाकों को इसमें शामिल किया, वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार 2006 में इस संगठन ने पूरी तरह ख़ुद को इराक़ी माहौल में ढ़ाल लिया लेकिन 2006-2007 में इराक़ी ग्रह युध्द जब चरम पर था तो अमेरिका ने एंटी टेरिरिस्ट स्कवाड के तहत इस संगठन की ताक़त को तोड़ कर ख़त्म कर दिया।


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