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अल्लाह और बंदे के बीच सबसे बेहतरीन रिश्ता दुआ

दुआ का मतलब पुकारना या बुलाना होता है, सूरए मोमिन में इरशाद होता है कि: तुम्हारे रब का हुक्म है कि मुझे पुकारो और मुझसे ही दुआ मांगो, मैं तुम्हारी दुआ को क़बूल करूंगा, बेशक जो लोग हमारी इबादत से अकड़ जाते हैं वह बहुत जल्द ज़लील हो कर जहन्नम में जाएंगे

विलायत पोर्टलः पैग़म्बर स.अ. की निगाह में माहे रमज़ान दुआ के क़बूल होने का बेहतरीन महीना है, और अल्लाह की बारगाह में राज़ की बातें करने का क़ीमती मौक़ा है, इस मुबारक महीने में अल्लाह अपने मेहमानों के दिलों की धड़कन को सुनता है और उनकी दुआओं, मुनाजात और राज़ की बातों को क़बूल कर लेता है।

जैसाकि आपने रमज़ान के मुबारक महीने से पहले दिए जाने वाले ख़ुत्बे में इरशाद फ़रमाया: तुम्हारी दुआएं इस महीने में मक़बूल हैं।

दुआ का मतलब पुकारना या बुलाना होता है, सूरए मोमिन में इरशाद होता है कि: तुम्हारे रब का हुक्म है कि मुझे पुकारो और मुझसे ही दुआ मांगो, मैं तुम्हारी दुआ को क़बूल करूंगा, बेशक जो लोग हमारी इबादत से अकड़ जाते हैं वह बहुत जल्द ज़लील हो कर जहन्नम में जाएंगे। (सूरए मोमिन, आयत 60)

इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. ने फ़रमाया: इस आयत में इबादत से मुराद दुआ है, यानी जो भी हमारे सामने दुआ करने से मुंह मोड़ेगा अल्लाह उसे जहन्नम में डाल देगा। (उसूल काफ़ी, हदीस न. 3050)

एक शख़्स इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. के पास आया और पूछा मौला: दो आदमी एक साथ मस्जिद में दाख़िल हुए, एक ने नमाज़ें ज़्यादा पढ़ीं और दूसरे ने दुआएं ज़्यादा मांगी, इनमें से कौन बेहतर है?

आपने फ़रमाया: दोनों बेहतर हैं, फिर उसने पूछा: मौला उनमें से कौन अफ़ज़ल है?

आपने फ़रमाया: जिसने दुआएं ज़्यादा की वह अफ़ज़ल है क्योंकि दुआ करना बहुत बड़ी इबादत है। (मजमउल बयान)

दुआ का रोज़े से रिश्ता

दुआ का रोज़े से गहरा रिश्ता है, इसीलिए सूरए बक़रह में रोज़े की आयतों के बीच में दुआ की आयत को रखा गया और सूरए बक़रह आयत न. 186 में इरशाद हुआ कि: जब मेरे बंदे तुमसे पूछें तो कह दो कि मैं उनके पास ही हूं और जब मुझसे कोई दुआ मांगता है तो मैं हर दुआ करने वाले की दुआ सुन लेता हूं, और जो मुनासिब (उसके हक़ में बेहतर) होती है उसे क़बूल कर लेता हूं, इसलिए उन्हें चाहिए कि मेरा कहना मानें और मुझ पर ईमान लाएं ताकि वह सीधे रास्ते पर आ जाएं।

यह आयत रोज़े से संबंधित आयतों के बीच में आई है जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि रोज़े का दुआ से गहरा रिश्ता है और शायद इसी रिश्ते की बिना पर पैग़म्बर स.अ. ने अपने ख़ुत्बे में इरशाद फ़रमाया कि माहे रमज़ान में तुम्हारी दुआएं क़बूल होती हैं।

दुआ के साथ कोशिश भी ज़रूरी

यहां यह बात भी याद रहे कि सारे काम केवल दुआ से ही हल नहीं होते बल्कि दुआ के साथ साथ इंसान की जद्दोजहद और कोशिश भी ज़रूरी है, दिन रात दुआएं पढ़ पढ़ कर दम करने से अगर ज़िंदगी की ज़रूरतें पूरी होतीं तो जिसकी बारगाह में दुआ के लिए हाथ फैलाए जाते हैं वह इंसान के कंधों पर ज़िम्मेदारियां न डालता, मेहनत, कोशिश, शौक़ और लगन की दावत न देता, क्या करना है क्या नहीं यह भी न बताता, आमाल और अख़लाक़ की कोई बात ही न करता, और कमाल तो यह है कि यह जद्दोजहद और रोज़ी को पाने के लिए कोशिश करना अल्लाह ने हर जानदार की फ़ितरत में रखा है, इसलिए चाहे चार पैर वाले जानवर हों या दो पैर वाले, चरने वाले हों या उड़ने वाले, समंदर में रहने वाले हों या उसके बाहर के, ज़मीन पर चलने वाले हों या रेंगने वाले हर जानदार की फ़ितरत में अल्लाह ने रिज़्क़ और रोज़ी के लिए कोशिश करने का जज़्बा रखा है जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि हर काम का हल केवल दुआ ही नहीं है बल्कि कहीं कहीं पर जद्दोजहद और कोशिश भी ज़रूरी है।


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