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अल्लामा अस्करी की जीवनी।

अल्लामा मुर्तुज़ा अस्करी की इराक़ में उपस्थिति के समय विभिन्न प्रकार की धार्मिक , वैचारिक और राजनीतिक विचारधाराओं के लोग सक्रिय थे। राष्ट्रवादी, साम्यवादी, उदारवादी तथा धर्म निरपेक्ष और सलफी चरमपंथी जैसे विभिन्न गुटों का केन्द्र इराक़ की राजधानी बगदाद था और इराक के महत्वपूर्ण विश्व विद्यालयों पर इन्ही का अधिकार था

विलायत पोर्टलः

अल्लामा मुर्तुज़ा अस्करी की इराक़ में उपस्थिति के समय विभिन्न प्रकार की धार्मिक , वैचारिक और राजनीतिक विचारधाराओं के लोग सक्रिय थे। राष्ट्रवादी, साम्यवादी, उदारवादी तथा धर्म निरपेक्ष और सलफी चरमपंथी जैसे विभिन्न गुटों का केन्द्र इराक़ की राजधानी बगदाद था और इराक के महत्वपूर्ण विश्व विद्यालयों पर इन्ही का अधिकार था। इन सब गुटों को पूर्व सोवियत संघ और पश्चिम की ओर से इराक़ में स्थापित किया गया था और इन धड़ों का एक मुख्य उद्देश्य, इराकी जनता में धर्म की स्थिति व लोकप्रियता को कमजोर और कम करना था। अल्लामा अस्करी ने अपनी तेज़ बुद्धि से परिस्थितियों की समीक्षा की और वे यह समझ गये कि बगदाद में एक इस्लामी और शीआ केन्द्र की स्थापना आवश्यक है और इस प्रकार से इराक़ की राजधानी में धर्म की पुकार हरेक के कानों तक पहुंचायी जाए। उन्होंने आयतुल्लाह मुहम्मद बाकिरूस्सद्र और आयतुल्लाह सैयद मोहसिन हकीम जैसे कुछ इराकी धर्मगुरुओं के सहयोग से इस प्रकार के सभी धर्म विरोधी संगठनों और आंदोलनों के विरुद्ध संघर्ष आरंभ किया और शीआ मुसलमानों के नेतृत्व का बीड़ा उठाया। अल्लामा अस्करी ने निर्णय लिया कि वे अपने अभियान का आरंभ इमामबाड़ों और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शोक सभाओं से किया जाए। इसके लिए उन्होंने छात्रों और आम लोगों पर आधारित शोक संगठनों के गठन का काम तेज़ी से आरंभ किया यहां तक कि उन्होंने एसे वक्तताओं का भी प्रशिक्षण किया जो आशूर और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन की वास्तविकताओं से लोगों को अवगत कराते। अल्लामा अस्करी ने यह काम आरंभ में बगदाद के निकट स्थित काज़मैन नगर में किया और फिर उसके बाद हर वर्ष इराक़ के विभिन्न नगरों में इस प्रकार के समूहों का गठन होता गया। अल्लामा अस्करी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक मनाने वाले इन संगठनों द्वारा लोगों को अत्याचारों और अन्याय की शैलियों से अवगत कराते और इस प्रकार से वे जनमत को देश की राजनीतिक स्थिति से अधिक से अधिक अवगत कराने में सफल रहे।

अल्लामा अस्करी और उनके साथियों ने इराक़ की तत्कालीन परिस्थितियों के दृष्टिगत, बगदाद काज़मैन के बुद्धिजीवियों के संगठन के गठन का निर्णय लिया। क्योंकि समाज को बहकाने वालों ने भी अपनी गतिविधियां विस्तृत कर ली थीं। वे सांस्कृतिक केन्द्र बना कर समाज को सही मार्ग से हटाने का प्रयास कर रहे थे।  अल्लामा अस्करी ने इराक में इस प्रकार के संगठनों की गतिविधियों की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि केवल इस्लामी सत्ता द्वारा समाज को सही मार्ग पर लाया जा सकता है और वैचारिक व राजनीतिक रूप से पथभ्रष्टताओं के शिकार समाज में यह काम संभव नहीं होगा। इसी लिए उन्होंने कुरआने मजीद, पैगम्बरे इस्लाम और उनके परिजनों की शिक्षाओं के आधार पर कुछ विशेष लोगों के प्रशिक्षण का इरादा किया। उन्होंने इस काम को छोटे छोटे सांस्कृतिक केन्द्रों की स्थापना से  आरंभ कर दिया ।

उन्होंने अपने निकट साथियों के सहयोग से बगदाद में इस  प्रकार के कई छोटे छोटे सांस्कृतिक केन्द्र स्थापित किये और वहां युवाओं को इस्लामी शिक्षाओं और इराक की तत्कालीन समस्याओं से अवगत कराने का काम आरंभ किया। अल्लामा अस्करी , शहीद बाकिरूस्सद्र और आयतुल्लाह हकीम के विचारों के इराक़ी समाज में आम होने के बाद, अल्लामा अस्करी पूर्ण रूप से राजनीति में आ गये और उन्होंने अद्दावतुल इस्लामिया पार्टी की स्थापना की। अल्लामा अस्करी, अपने संघर्ष भरे जीवन के इस काल को याद करते हुए कहते थेः  परिस्थितियां अत्याधिक कठिन थीं और दिन प्रतिदिन अधिक कठिन होती जा रही थीं। वर्ष १९५८ में शाही व्यवस्था के पतन और अब्दुल करीम क़ासिम का विद्रोह, १९६३ में अब्दुस्सलाम आरिफ का विद्रोह और अहमद हसन अलबक्र का प्रधानमंत्री बनना, वर्ष १९६८ में बास पार्टी का विद्रोह और पूरे इराक  पर बास पार्टी की सत्ता वह घटनाएं हैं जिनसे इराक की परिस्थितियों में अत्याधिक जटिलता उत्पन्न हो गयी थी किंतु हम भी अपनी सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक गतिविधियों को परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते थे।

इराक पर बास पार्टी की सत्ता को कुछ ही समय बीता था कि इस पार्टी के भ्रष्टाचार और अत्याचार के कारण अल्लामा अस्करी ने आयतुल्लाह मोहसिन हकीम का अनुसरण करते हुए बास की अत्याचारी सरकार के विरुद्ध संघर्ष का ध्वज लहरा दिया जिसके बाद बासी सरकार ने अल्लाम अस्करी को गिरफ्तार करने के लिए व्यापक प्रयास आरंभ कर दिये किंतु वे वर्ष १३८९ हिजरी कमरी में गुप्त रूप से इराक़ से निकलने में सफल रहे। वे स्वंय इस संदर्भ में कहते हैं कि मैं इराक़ से जब भाग रहा तो तो मुझे अपने प्राण की चिंता नहीं थी बल्कि मुझे चिंता इस बात की थी कि यदि पकड़ा गया तो निश्चित रूप से इराक़ की बास सरकार मेरी ओर से झूठा बयान जारी करके यह प्रचार कर सकती है कि सैयद मुर्तुज़ा अमरीकियों के जासूस थे और यह उन्होंने स्वंय स्वीकार किया है और इस प्रकार से शीआ धर्मगुरुओं का सम्मान खतरे में पड़ जाता। बासी यह बहुत करते थे। कुरआने मजीद की समीक्षा और पैगम्बरे इस्लाम की जीवनी से लगाव यह कारक थे जिनके आधार पर मैंने कुरआन और पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के मत के आधार पर समाज की रचना का निर्णय लिया। मुझे आरंभ से ही मालूम था कि मेरा रास्ता बहुत कठिन है। मेरे घर पर नज़र रखी जा रही थी और बार बार तलाशी ली जाती।  बासियों के विरुद्ध संघर्ष में जब मुझे पराजय का सामना करना पड़ा तो मैं बैरूत चला गया। इराकी सेना ने मेरे परिवार वालों को जार्डन की सीमा पर गिरफ्तार कर लिया और बैरूत में भी बास पार्टी के एजेन्ट मेरा अपहरण करने के प्रयास में थे इसी लिए मैं ईरान आ गया अन्यथा मैं अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष से कदापि थका नहीं था।

अल्लामा अस्करी ने वर्षों तक इराक़ में संघर्ष के बाद जब वहां की स्थिति अपने लिए अत्याधिक खराब देखी तो अपनी पैतृक भूमि व जन्म स्थली ईरान चले आए। वे अत्याचार व अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में सीमाओं में विश्वास नहीं रखते थे। जहां भी अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठती वे उसका समर्थन करते।

अल्लामा अस्करी, कुम के धार्मिक शिक्षा केन्द्र में इमाम खुमैनी के शिष्य थे। उन्होंने इसी प्रकार जब इमाम खुमैनी को देश निकाला देकर इराक भेज दिया गया था तो उन्होंने इमाम खुमैनी से कई बार भेंट भी की।  वे इमाम खुमैनी के आंदोलन का भरपूर समर्थन करते थे। अल्लामा अस्करी, इमाम खुमैनी के आंदोलन और उनके उद्देश्य से इस इतना लगाव रखते थे कि स्वंय इस बारे में कहते हैं कि इमाम खुमैनी के मन में अपार शांति, असत्य के विरुद्ध उनका निरंतर संघर्ष, समस्याओं और दुखों पर वह सहनशीलता, वास्तव में ज्ञान व ईश्वरीय पहचान की प्राप्ति में इमाम खुमैनी की गंभीरता व अथक परिश्रम का परिणाम था। मैंने यह बात, इमाम खुमैनी के आंदोलन के आरंभ में ही समझ ली थी। और इसी लिए न क्रांति के पहले और न क्रांति की सफलता के बाद कभी उनके मार्ग के सही होने और उनकी दूरदर्शिता में किसी भी प्रकार की शंका मन में पैदा हुई।

अल्लामा अस्करी ने ईरान आगमन के कुछ ही वर्षों बाद वर्ष १९७८ में अंतरराष्ट्रीय इस्लामी ज्ञान  केन्द्र की तेहरान में स्थापना की। यह संस्था का प्रयास होता है कि यथासंभव प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों को पूरे विश्व के एकत्रित करे और फिर उसे कंप्यूटर में स्थानान्तरित कर दिया जाए और इस प्रकार से पूरे विश्व के सभी शोधकर्ताओं की पहुंच इन स्रोतों तक सरल हो जाए। यह काम उन्होंने एसे समय में आरंभ किया था जब ईरान में कंप्यूटर का चलन बहुत कम और सीमित था इसी लिए उन्हें बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा इस संस्था ने धार्मिक शिक्षण केन्द्रों की पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों पर पुनर्विचार का काम भी आरंभ किया और फिर इन पुस्तकों के मूल ढांचे में परिवर्तन के बिना ही उन्हें आधुनिक रूप दे दिया गया। आज ईरान के धार्मिक शिक्षण केन्द्रों में काफी सीमा तक उनके इस काम का प्रभाव देखा जा सकता है।

अल्लाम अस्करी ने ईरान में इस्लाम के मूल सिद्धान्त के विश्व विद्यालय की स्थपना के लिए भी बहुत प्रयास किया। वे इस प्रकार का विश्व विद्यालय इराक़ में स्थापित कर चुके थे। उन्होंने ईरान की सरकार से इस प्रकार के विश्व विद्यालय की अनुमति ली और तेहरान और उसके बाद ईरान के कई नगरों में उसकी स्थापना की । इस समय अल्लामा अस्करी द्वारा स्थापित विश्व विद्यालयों में पीएचडी तक की डिग्री प्रदान की जाती है और यह सब अल्लाम अस्करी के अथक प्रयासो का परिणाम है। यह विश्व विद्यालय इस स्तर के हैं कि इनमें विदेशों से भी सैंकड़ों छात्र शिक्षा प्राप्त करते हैं।

अल्लाम अस्करी अथक परिश्रम करने वाले बुद्धिजीवी थे और उन्होंने अपने वैज्ञानिक संघर्ष को जारी रखते हुए बहुत से देशों की यात्रा भी की। उन्होंने भारत, पाकिस्तान और विशेषकर कश्मीर की कई बार यात्रा की और वहां के बुद्धिजीवियों से भेंट की। उनके मध्य भाषण दिया और उनकी शंकाओं का निवारण किया। उन्होंने चीन की भी यात्रा की और उपचार के लिए इस देश में कई महीने व्यतीत किये। उपचार के साथ ही उन्होंने चीन और इस देश में मुसलमानों की दशा का भी अध्ययन कर लिया। उन्होंने चीन में इस्लामी धार्मिक केन्द्रों का निरीक्षण किया और वहां से बुद्धिजीवियों और छात्रों से भेंट की।  अल्लामा अस्करी ने इसी प्रकार, स्वीडन, डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, और ब्रिटेन की भी यात्रा की। वे मिस्र, सीरिया, लेबनान, तुर्की, सऊदी अरब और फार्स के खाड़ी के तटवर्ती देशों की प्रायः यात्रा करते रहते।

अन्नतः इस्लामी जगत के इस महान बुद्धिजीवी और संघर्षकर्ता का वर्ष २००७ में तेहरान में ह्रदय गति रुक जाने से देहान्त हो गया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने उनके देहान्त पर अपने शोक संदेश में लिखाः इस महान धर्म गुरु ने अपनी बहुमूल्य आयु के दसियों वर्ष अध्ययन व शोध में व्यतीत किये और उसके फल स्वरूप एसे आलेख और एसी पुस्तकें लिखीं जिसका पूरे इस्लामी जगत में स्वागत किया गया। उन्होंने पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के मत के प्रचार में अत्याधिक सफलताएं अर्जित कीं। ईश्वर की कृपा हो इस महान व ज्ञानी व कभी न थकने वाले  बुद्धिजीवी पर ।

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