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अरबईन बिलियन मार्च यानी लब्बैक या हुसैन अ.स.

इमाम हुसैन अ.स. की आवाज़ पर लब्बैक कहने वालों की इतनी बड़ी तादाद ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींच रखा है, इस इंटरनेशनल बिलियन मार्च के सबसे बेहतर टाइटल इमाम हुसैन अ.स. को लब्बैक कहने के लिए पैदल कर्बला जाना है, जिस तरह हज अल्लाह को लब्बैक कहने की जगह है उसी तरह अरबईन इमाम हुसैन अ.स. को लब्बैक कहने की जगह है।

विलायत पोर्टल: यह दिन इमाम हुसैन अ.स. के अरबईन के दिन हैं, इमाम हसन असकरी अ.स. की वह मशहूर हदीस जिसमें अरबईन की ज़ियारत को मोमिन की निशानियों में से बताया है, हालांकि इसके दो मतलब हो सकते हैं; एक उसका ज़ाहिरी मतलब यानी अरबईन के दिन कर्बला इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के लिए जाना, और कुछ बुज़ुर्ग उलमा ने इसका मतलब अरबईन की ज़ियारत का पढ़ना बताया है, दोनों सूरतों में नतीजा यह है कि एक शिया मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि अरबईन पर ख़ास ध्यान दे, और ध्यान देने का मतलब यह है कि वह जिस जगह भी हो जिस शहर में भी हो वहां इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी बरपा करे, और साथ ही उसका एक मिसदाक़ अरबईन के दिन इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के लिए जाना है और इसका सबसे बेहतरीन और अहम मिसदाक़ दूर के इलाक़ों से पैदल चल कर अरबईन की ज़ियारत करना है, विशेष तौर पर इमाम हुसैन अ.स. की पैदल चल कर ज़ियारत करने पर हदीसों में बहुत ज़ोर दिया गया है।

अगर अरबईन आए और यूंही गुज़र जाए और उसपर न ही कोई ध्यान दे और न ही अज़ादारी बरपा करे तो यह उस इंसान के कमज़ोर शिया होने की अलामत है, इसीलिए हर शिया की ज़िम्मेदारी है अरबईन पर ख़ास ध्यान रखे।

दूसरी अहम बात यह कि अल्लाह के इनायत से पिछले कुछ सालों में अरबईन पर अक़ीदतमंदों की तादाद में ज़बर्दस्त बढ़ोतरी हुई है जिसमें शिया, सुन्नी, ईसाई और भी दूसरे धर्म और मज़हब के लोग बड़ी तादाद में शामिल हो रहे हैं, और पिछले कुछ सालों के मंज़र को देख कर कहा जा सकता है कि इन सालों में अरबईन पर इमाम हुसैन अ.स. पर लब्बैक कहने वालों की इतनी बड़ी तादाद ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींच रखा है, इस इंटरनेशनल बिलियन मार्च के सबसे बेहतर टाइटल इमाम हुसैन अ.स. को लब्बैक कहने के लिए पैदल कर्बला जाना है, जिस तरह हज अल्लाह को लब्बैक कहने की जगह है उसी तरह अरबईन इमाम हुसैन अ.स. इमाम हुसैन अ.स. को लब्बैक कहने की जगह है।

और जो भी इस अज़ीम अरबईन बिलियन मार्च पर गया है उसको हर पल यह ध्यान में रखना चाहिए कि उसका मक़सद इमाम हुसैन अ.स. को लब्बैक कहना है, इसलिए दूसरी हर बात से पहले लब्बैक या हुसैन के तक़ाज़ों को ध्यान में रखना होगा, और साथ ही यह भी ध्यान में रखना है कि कुछ बुज़ुर्ग मराजे के मुताबिक़ यही अरबईन इमाम महदी अ.स. के ज़ुहूर के रास्ते को मुमकिन बनाएगा, इसलिए अरबईन पर जाने वाले हर ज़ायर को यह भी ध्यान में रखना है कि हर एक पल यह एहसास रहे कि कहीं कोई भी एक क़दम ऐसा न उठे जो इमाम ज़माना अ.स. के ज़ुहूर में देरी का कारण बने।

और अरबईन बिलियन मार्च का एक और मक़सद हज की तरह दुनिया भर के मुसलमानों के हालात से जानकारी होना चाहिए, क्योंकि इसी पैदल मार्च में लाखों मुसलमान अलग अलग देशों से शामिल होते हैं, हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम एक दूसरे के हालात से आगाह हों और अगर मुमकिन हो तो एक दूसरे की मुश्किलों को हल करने की कोशिश करें।

और अरबईन पैदल बिलियन मार्च पर इमाम ज़माना अ.स. को अपने आसपास ही महसूस करना चाहिए क्योंकि बहुत सारे उलमा और मराजे के अक़वाल की रौशनी में कहा जा सकता है कि इमाम हुसैन अ.स. के ख़ून का वारिस भी इसी क़ाफ़िले में शामिल रहता है।

और जब ज़ियारत कर के वापस हों तो इमाम से हमारी अलविदा का मतलब यह न हो कि बस अब अगले साल ही हमें लब्बैक कहने आना है, बल्कि उस लब्बैक का मतलब हमारी ज़िंदगी के हर मोड़ और हर छोटे बड़े कामों में होनी चाहिए, और हमें यह वादा कर के आना चाहिए कि इमाम हुसैन अ.स. और कर्बला के मक़सद को हम अगले अरबईन तक इसी तरह दुनिया भर की लोगों तक पहुंचाते रहेंगे।

अगर अरबईन पर जा कर और बिलियन मार्च में शरीक हो कर हमारे अंदर मज़लूमों की आवाज़ बनने का शऊर और हिम्मत पैदा नहीं हुई तो यक़ीन जानिए हमने लब्बैक या हुसैन ज़ुबान से कह तो दिया है लेकिन अभी हमें उसका मतलब पता नहीं चल पाया है, इसलिए अरबईन पर जाकर हमें साम्राज्यवाद आतंकवाद और अहंकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने और उसको जड़ से मिटाने और साथ ही मज़लूमों की आवाज़ बनने का इरादा और जज़्बा लेकर वापस आना है।

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