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अरबईन बिलियन मार्च और ज़ियारत के आदाब

अरबईन पर नजफ़ से कर्बला लगभग 80 किलोमीटर की दूरी के पैदल सफ़र से इस सफ़रे इश्क़ में और चार चांद लग जाते हैं, बच्चे, बूढ़े, जवान, औरत, मर्द सब इस अरबईन बिलियन मार्च पर पैदल चलते दिखाई देते हैं और कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो कई सौ किलोमीटर पैदल चल कर कर्बला पहुंच कर इमाम ज़माना अ.स. को ताज़ियत पेश करते हैं,

विलायत पोर्टल: अरबईन क़रीब है, बड़ी तादाद में पूरी दुनिया से एक के बाद एक टूर कर्बला की पाक ज़मीन पर पहुंच रहे हैं, जो नहीं जा सके वह अपने गांव अपने शहर अपने देश में ही अरबईन के दिन पढ़ी जाने वाली ज़ियारत और इमाम के चेहेल्लुम की पूरे जोश के साथ तैयारी में लगे हैं, और यह मंज़र पैग़म्बर स.अ. की उस हदीस को याद करने पर मजबूर कर देता है कि जिसमें आपने फ़रमाया: इमाम हुसैन अ.स. की शहादत से मोमेनीन के दिलों में ऐसी हरारत और गर्मी पैदा हो गई है जो कभी ठंडी नहीं हो सकती।
और अरबईन पर नजफ़ से कर्बला लगभग 80 किलोमीटर की दूरी के पैदल सफ़र से इस सफ़रे इश्क़ में और चार चांद लग जाते हैं, बच्चे, बूढ़े, जवान, औरत, मर्द सब इस अरबईन बिलियन मार्च पर पैदल चलते दिखाई देते हैं और कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो कई सौ किलोमीटर पैदल चल कर कर्बला पहुंच कर इमाम ज़माना अ.स. को ताज़ियत पेश करते हैं, और सबसे ज़्यादा इस बिलियन मार्च पर जो लोगों के ध्यान को अपनी ओर खींचता है वह इराक़ के मोमेनीन द्वारा हर कुछ क़दम पर ज़ायरीन के लिए खाने पीने और रात गुज़ारने का बंदोबस्त और बाक़ी ज़ायरीन के बीच मफ़लूज और माज़ूर लोगों का ज़मीन पर रेंगते हुए मज़लूम इमाम के रौज़े तक पहुंचना है, जिन्हें देख कर इमाम की मज़लूमी और लोगों के दिलों में इमाम की मोहब्बत दोनों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
यह वह मौक़ा होता है जिसे कवर करने के लिए पूरी दुनिया से मीडिया और रिपोर्टर भी पहुंचते हैं जो छोटे से छोटे अमल से लेकर बड़े से बड़े अमल को कैमरे में क़ैद कर के पूरी दुनिया के सामने हमारे अमल को पेश करते हैं, इसलिए हमारे लिए और भी ज़रूरी हो जाता है कि हम ऐसे मौक़े पर अपनी अक़ीदत को ज़ियारत के बताए जाने वाले आदाब के दायरे में रह कर इज़हार करें ताकि कहीं ऐसा न हो कि किसी एक या कुछ लोगों के अमल की वजह से पूरी दुनिया में शियों का अमल बता कर पेश किया जाए जिसके नकारात्मक असर का सभी ज़ायरीन और मोमेनीन को सामना करना पड़े।
 इमाम हुसैन अ.स. या दूसरे सभी मासूमीन अ.स. की ज़ियारत के दो तरह के आदाब बताए गए हैं, एक मानवी और दूसरे ज़ाहिरी।
मानवी और बातिनी आदाब में इमाम मासूम की सच्ची मारेफ़त, ख़ुलूस, हुज़ूरे क़ल्ब (यानी पूरे वजूद को केवल इमाम की ज़ियारत के लिए समर्पित कर देना) और साथ ही दिल में ग़म का होना, और ज़ाहिरी आदाब में ग़ुस्ल करना, पाक साफ़ कपड़े पहनना, ख़ुशबू और हर तरह के सजने संवरने की चीज़ों से परहेज़ करना, ख़ामोशी और सुकून के साथ ज़ियारत पढ़ना, हरम में दाख़िल होने से पहले अल्लाह उसके रसूल और अहलेबैत अ.स. से इजाज़त मांगना और ख़ास ज़ियारतों जैसे जैसे ज़ियारते जामेआ-ए-कबीरा वग़ैरह का पढ़ना।
साथ ही हमें पूरी ज़ियारत के इस सफ़र पर किसी एक पल यह नहीं भूलना चाहिए कि इमाम हमें देख रहे हैं उनकी निगाहें हमारे हर अमल पर हैं।
ज़ायरीन और साथ के लोगों के साथ हमारा बर्ताव, कमज़ोर और बुज़ुर्गों की ज़ियारत करने में मदद करना हमें नहीं भूलना चाहिए।
हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ज़ायरीन में बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई जमा कर के इमाम की ज़ियारत को जाते हैं इसलिए अगर हम हर साल या कई बार जा चुके हैं तो उन लोगों को अपने से आगे रखना चाहिए ताकि वह भी क़रीब से इमाम की ज़ियारत को कर के वह मानवी एनेर्जी को हासिल कर सकें जिससे ईमान को ताज़गी और रूह को सुकून हासिल होता है।
और ज़ियारत पर हमें अपने वालेदैन और उन सभी लोगों को याद रखना चाहिए जो दिल में कर्बला की तमन्ना रखते थे लेकिन किसी वजह से ज़ियारत पर नहीं आ सके।
सबसे अहम हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि जैसाकि कुछ हदीसों में मौजूद है कि इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के बाद ज़ायर के गुनाह माफ़ हो जाते हैं तो हमारी ज़ियारत के बाद की ज़िंदगी और उससे पहले कि ज़िंदगी में फ़र्क़ होना चाहिए।
अल्लाह से दुआ है कि जो मोमेनीन जाना चाह रहे हैं और किसी वजह से मुश्किलों का सामना कर रहे हैं उन्हें हल फ़रमाए और सभी ज़ायरीन की हिफ़ाज़त करे और पूरे आदाब के साथ हमें ज़ियारत करने की तौफ़ीक़ अता करे।

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