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अरबईन को लेकर उलमा की राय

पैग़म्बर स.अ. के सहाबी जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी मदीने से कर्बला इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ लाए, जाबिर वह पहले शख़्स हैं जिन्होंने इमाम हुसैन अ.स. के पहले अरबईन (चेहलुम) पर कर्बला पहुंच कर ज़ियारत की।

विलायत पोर्टल: शैख़ मुफ़ीद, शैख़ तूसी और अल्लामा हिल्ली (र.अ.) इस बारे में लिखते हैं कि: 20 सफ़र का वह दिन है जिस दिन इमाम हुसैन अ.स. के अहले हरम शाम से मदीने वापस हुए, और उसी दिन पैग़म्बर स.अ. के सहाबी जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी मदीने से कर्बला इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ लाए, जाबिर वह पहले शख़्स हैं जिन्होंने इमाम हुसैन अ.स. के पहले अरबईन पर कर्बला पहुंच कर ज़ियारत की। (अल अददुल क़विय्यह, रज़ियुद्दीन अली इब्ने यूसुफ़ मुतह्हर हिल्ली, पेज 219)

और सय्यद इब्ने ताऊस ने इक़बालुल आमाल में, अल्लामा हिल्ली ने अल मुन्तहा में, अल्लामा मजलिसी ने बिहारुल अनवार के मज़ार नामी बाब में, शैख़ यूसुफ़ बहरानी ने हदाएक़ में, हाजी नूरी ने तहिय्यतुज़ ज़ायर में और शैख़ अब्बास क़ुम्मी ने मफ़ातीह में और इन सबने शैख़ तूसी के हवाले से नक़्ल किया है कि:

अरबईन और इमाम हुसैन अ.स. का दो नामों के साथ गहरा रिश्ता है, उनमें एक एक नाम अतिया इब्ने औफ़ कूफ़ी है जो इमाम हुसैन अ.स. के पहले अरबईन पर कर्बला ज़ियारत के लिए आए और इमाम की क़ब्र की ज़ियारत की।

जिस समय इमाम हुसैन अ.स. का सर नैज़े पर चढ़ा दिया गया और अहलेबैत अ.स. को असीर कर के शाम ले जाया गया, उसी समय से कर्बला में हाज़िरी और इमाम हुसैन अ.स. और उनकी औलाद और असहाब की ज़ियारत को बहुत कठिन समझा जा रहा था, क्यों उस समय सारे इस्लामी जगत पर बनी उमय्या के ज़ुल्म का ऐसा साया था कि कोई सोंच भी नहीं सकता था कि उस ज़ुल्म के पर्दे को फाड़ कर इज़्ज़त की ज़िंदगी की उम्मीद भी की जा सकती है, और कोई नेफ़ाक़ के इस मोटे पर्दे को फाड़ कर कोई इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत को भी जा सकता है, लेकिन इमाम हुसैन अ.स. की मोहब्बत की आग इस तरह से आशिक़ों के दिल में रौशन थी कि बनी उमय्या और बनी अब्बास की ज़ालिम हुकूमतों का तो ख़ात्मा हो गया लेकिन यह आग ठंडी नहीं हो सकी।

जी हां! यह मोहब्बत ही थी जो आशिक़ और इमाम हुसैन अ.स. से मोहब्बत करने वालों को खींच कर कर्बला ले गई और इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के चालीस दिन भी नहीं गुज़रे थे कि वही इश्क़ जाबिर को मदीने से खींच कर कर्बला ले गया। 

जाबिर जब कर्बला पहुंचे तो सबसे पहले फ़ुरात के किनारे गए, सबसे पहले फ़ुरात के पानी से ग़ुस्ल किया और फिर पाक साफ़ कपड़े पहन कर इमाम हुसैन अ.स. की क़ब्र की तरफ़ ज़ियारत के लिए निकल पड़े, और जब क़ब्र पर पहुंचे तो एक साथ क़ब्र पर रखा और फिर एक चीख़ मारी और बेहोश हो गए, जब होश आया तो तीन बार "या हुसैन" कहा और फिर इमाम की ज़ियारत पढ़ना शुरू कर दी। 

रिवायतों और इस्लामी तालीमात में जिन आमाल पर बहुत ज़ोर दिया गया है उनमें से एक अरबईन के दिन इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत है। 

मासूमीन अ.स. में से इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत को ख़ास अहमियत हासिल है, जितनी ताकीद इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत पर है दूसरे किसी मासूम के लिए नहीं है। 

इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. ने इब्ने बुकैर (जो इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के रास्ते में होने वाले ख़तरे के बारे में लोगों को बता रहे थे) से फ़रमाया:

क्या तुमको पसंद नहीं कि अल्लाह तुम्हें हमारी राह में खौफ़ और डर की हालत में देखे? क्या तुम नहीं जानते कि जिसे हमारी वजह से डर कर रहना पड़े, आसमान पर अल्लाह उसे अपना साया अता करेगा?

चूंकि अल्लाह ने लोगों के दिलों से मालामाल किया है इसलिए और इश्क़ हर हाल में आशिक़ को माशूक़ तक पहुंचा ही देता है इसलिए इमाम हुसैन अ.स. के आशिक़ बनी उमय्या के ज़ुल्म और पाबंदियों के बावजूद पहले ही अरबईन से ही ज़ियारत को जाते रहे और यह इश्क़ की शिद्दत हमेशा से बाक़ी रही जैसाकि आज भी देखा जा सकता है कि इमाम हुसैन अ.स. का हर चाहने वाला मर्द और औरत अपनी उम्र में एक बार ज़ियारत की तमन्ना ज़रूर रखता है। 

अल्लामा मजलिसी से कुछ और रिवायतें भी नक़्ल हुई हैं:

अल्लाह ने अपने क़रीबी फ़रिश्तों से फ़रमाया: क्या तुम इमाम हुसैन के ज़ायरीन को नहीं देख रहे कि किस तरह पूरे शौक़ और इश्क़ में डूबे हुए ज़ियारत के लिए आते हैं?

इसी तरह रिवायत में है कि: इमाम हुसैन अ.स. का ज़ायर आसमान पर अल्लाह से बात करेगा। 

या यह भी रिवायत में है कि: इमाम हुसैन अ.स. का ज़ायर जन्नत में पैग़म्बर स.अ. और उनके ख़ानदान का पड़ोसी होगा और उनका मेहमान होगा। 

इसी तरह यह भी है कि: इमाम के ज़ायर का मक़ाम बुलंदियों पर क़ायम फ़रिश्तों की तरह होगा।


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