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अज़ादारी और इंतेज़ार का आपसी रिश्ता

इमाम हुसैन अ.स. और इमाम ज़माना अ.स. के बीच बहुत गहरा रिश्ता पाया जाता है, इन दोनों अज़ीम हस्तियों में से हर एक ने दूसरे को पहचनवाया है और एक दूसरे की सिफ़ात बयान किए हैं

विलायत पोर्टलः इतिहास गवाह है कि जितने ज़ुल्म अहलेबैत अ.स. के नाम लेने वालों पर ढ़हाए गए हैं उनकी दुनिया में कोई मिसाल नहीं मिलती, उन ज़ुल्म और अत्याचार को देखते हुए होना तो यह चाहिए था कि अब तक शीयत और शियों का नाम और निशान भी मिट जाता लेकिन यह अल्लाह की मर्ज़ी है कि न केवल यह कि शीयत आज तक बाक़ी है बल्कि दिन प्रतिदिन दुनिया भर में फैलती जा रही है और आज शीयत दुनिया की एक बहुत बड़ी ताक़त बन चुकी है और वह दिन दूर नहीं जब अल्लाह के इस दीन का पूरी दुनिया लोहा मानेगी और व अशरक़तिल अरज़ो बेनूरे रब्बेहा की तस्वीर बन कर पूरी दुनिया को अल्लाह के नूर से रौशन कर देगी।

यह बात भी दिन के उजाले की तरह साफ़ और ज़ाहिर है कि अल्लाह कुन फ़यकून का मालिक होते हुए भी चीज़ों को उनके नेचुरल तरीक़ों और प्रोसेस से पैदा करता है, अब ज़ाहिर है कि शीयत जैसे शजर-ए-तूबा और अल्लाह के नूर के मज़हर के बाक़ी रहने के पीछे भी कुछ नेचुरल कारण हैं जिनमें से सबसे अहम अज़ादारी और इंतेज़ार हैं, अज़ादारी और इंतेज़ार के आपसी रिश्ते को बयान करने से पहले हम इमाम हुसैन अ.स. और इमाम ज़माना अ.स. के बीच समानता और आपसी रिश्ते पर एक निगाह डालते हैं।

इमाम हुसैन अ.स. और इमाम ज़माना अ.स. का आपसी रिश्ता

इमाम हुसैन अ.स. और इमाम ज़माना अ.स. के बीच बहुत गहरा रिश्ता पाया जाता है, इन दोनों अज़ीम हस्तियों में से हर एक ने दूसरे को पहचनवाया है और एक दूसरे की सिफ़ात बयान किए हैं, जैसाकि इमाम हुसैन अ.स. ने कुछ आयतों की तफ़सीर बयान करते हुए फ़रमाया इससे मुराद इमाम ज़माना अ.स. हैं, या जैसे सूरए शम्स की तफ़सीर बयान करते हुए फ़रमाया कि शम्स से मुराद पैग़म्बर स.अ. हैं, क़मर से मुराद इमाम अली अ.स. हैं और नहार से मुराद इमाम ज़माना अ.स. हैं।

दूसरी तरफ़ इमाम ज़माना ने सूरए मरयम के शुरू में आने वाले हुरूफ़े मोक़त्तआत की तफ़सीर करते हुए फ़रमाते हैं कि इससे मुराद कर्बला और इमाम हुसैन अ.स. हैं।

जबकि एक हदीस में हैं कि इस एक आयत وَ مَنْ قُتِلَ مَظْلُوماً فَقَدْ جَعَلْنا لِوَلِيِّهِ سُلْطاناً فَلا يُسْرِفْ فِي الْقَتْلِ إِنَّهُ كانَ مَنْصُورا में इमाम हुसैन अ.स. और इमाम ज़माना अ.स. दोनों का ज़िक्र है, मज़लूमा से मुराद इमाम हुसैन अ.स. हैं और मंसूरा से मुराद इमाम ज़माना हैं।

इसी तरह ज़ियारते आशूरा जो एक बहुत ही फ़ज़ीलत और अज़मत वाली ज़ियारत है और इमाम हुसैन अ.स. की फ़ज़ीलतों और मुसीबतों के बारे में मालूमात और मआरिफ़ का समंदर है, इसमें मंसूर का शब्द इमाम ज़माना अ.स. के लिए इस्तेमाल हुआ है, दूसरी तरफ़ दुआए नुदबा जो इमाम ज़माना अ.स. की दुआ है उसमें इमाम हुसैन अ.स. की फ़ज़ीलतों और मुसीबतों बयान किया गया है, इस दुआ में इमाम हुसैन अ.स. को ऐनल हसन और ऐनल हुसैन कह कर याद किया है और भी इसके अलावा कई जुमले हैं जो साफ़ तौर से इमाम हुसैन अ.स. की फ़ज़ीलत और उनकी मुसीबत को बयान करते हैं।

या एक दूसरे मौक़े पर इमाम हुसैन अ.स. ने इमाम ज़माना अ.स. के लिए फ़रमाते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल से सुना है कि अगर दुनिया ख़त्म होने में केवल एक दिन बचा हो तो अल्लाह उस दिन को इतना बड़ा कर देगा कि मेरा बेटा ज़ुहूर करेगा और ज़ुल्म और अत्याचार से भरी दुनिया को न्याय और अद्ल से भर देगा।

इसी तरह एक रिवायत में है कि जब इमाम ज़माना अ.स. का ज़ुहूर होगा तो वह अपने जद इमाम हुसैन अ.स. को याद करते हुए कहेंगे कि ख़बरदार ऐ दुनिया वालों मैं ग़ैब में रहने वाला इमाम हूं, मैं इंतेक़ाम लेने वाला हूं, ऐ दुनिया वालों मेरे जद हुसैन अ.स. को प्यासा क़त्ल कर डाला गया, ऐ दुनिया वालों मेरे जद हुसैन अ.स. की लाश को बिना कफ़न के छोड़ दिया गया, ऐ दुनिया वालों मेरे जद हुसैन अ.स. को दुश्मनी के चलते क़त्ल किया गया।

अज़ादारी और इंतेज़ार का आपसी रिश्ता

अब हम अपने असली विषय पर रौशनी डालते हैं, लेकिन फिर भी उससे पहले हमें अज़ादारी और इंतेज़ार के मतलब को समझना होगा...

अज़ादारी और इंतेज़ार

इमाम हुसैन अ.स. और उनके अहलेबैत अ.स. पर ढहाई जाने वाली मुसीबतों पर उनके चाहने वालों का अज़ादारी करना एक फ़ितरी और नेचुरल अमल है, इस बे मिसाल ग़म पर ग़मगीन और दुखी होना और अपने सर और सीने को पीटना बिल्कुल फ़ितरी बात है, पैग़म्बर स.अ. ने इसी फ़ितरी अमल की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया था कि इमाम हुसैन अ.स. की शहादत ने मोमेनीन के दिलों में ऐसी गर्मी और हरारत पैदा कर दी है जो क़यामत तक ठंडी नहीं हो सकती।

शीयत की ताक़त और पावर और मोमेनीन के हौसले का स्रोत यही आशूरा, इमाम हुसैन अ.स. का ज़ुल्म के अत्याचार के मुक़ाबले प्रतिरोध और आपकी क़ुर्बानी है, यह इमाम अ.स. का ग़म है जिसकी वजह से मोमेनीन अपने सारे दुख और ग़म भुला देते हैं और दीन और अहलेबैत अ.स. की राह में क़ुर्बानी और शहादत दे कर भी उनमें नया जोश नया जज़्बा और हौसला मिलता है, कहने का मतलब यह है कि यह अज़ादारी इंसानी रूह को नई ताज़गी देती है, इन्हीं सब सच्चाईयों को महसूस करके और अपनी आंखों से देख के इतिहास के अज़ीम इस्लामी इंक़ेलाब की बुनियाद रखने वालो इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने फ़रमाया था कि इसी मोहर्रम और सफ़र (के महीनों) से इस्लाम ज़िंदा है, और इस्लामी इंक़ेलाब के अज़ीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई फ़रमाते हैं कि शहीदों को याद करना, शहादत से कम नहीं है, यानी कल अगर शहीदों ने इस्लाम को ज़िंदा रखा तो आज उनकी याद इस्लाम को ज़िंदा रखेगी।

एक विश्व स्तरीय और आदिल हुकूमत को क़ायम करने के लिए बहुत बड़ी प्लानिंग और लगातार कोशिश करने की ज़रूरत है और इसी का नाम इंतेज़ार है, ज़ाहिर है एक ऐसे इंक़ेलाब और एक ऐसी हुकूमत का इंतेज़ार केवल हाथ पर हाथ रख कर बैठने से नहीं किया जा सकता।

अज़ादारी और इंतेज़ार शीयत के दो ऐसे पर हैं जिनसे शीयत कामयाबी और सआदत की ऊंची उड़ान उड़ सकती है, इसिलए कि कामयाबी के यही दो राज़ हैं, क्योंकि अगर ज़ुल्म और अत्याचार करने वालों से इंतेक़ाम लेने वाले के पास हौसला और जज़्बा न हो तो वह कभी इंतेक़ाम नहीं ले सकता और वह मायूस हो जाएगा, इंतेज़ार इसी जज़्बे को बाक़ी रखता है।

शीयत के दो परचम हैं, एक ज़ुल्म से इंतेक़ाम और शहादत की तलब का परचम, दूसरा इंतेज़ार का, और यहा दोनों कामयाबी और पूरे विश्व में क्रांति ला सकते हैं, हमारी ज़िम्मेदारी यह है कि इन दोनों को उनकी असली हालत पर और उनकी असली तस्वीर में बाक़ी रखें, अज़ादारी को रस्म नहीं बल्कि इंक़ेलाब बरपा करने के लिए किन चीज़ों की ज़रूरत है उन्हें सीखने का ज़रिया समझें, और इंतेज़ार को दिलासा और ढ़ांढ़स नहीं बल्कि तैयारी समझें, और इस तरह अज़ादारी और इंतेज़ार करें जिस तरह इमाम ज़माना अ.स. फ़रमाते हैं, सलाम हो आप पर ऐ हमारे जद, अगर ज़ुहूर का समय दूर हो गया तो ऐ मेरे जद मैं आप पर सुबह और शाम आंसू बहाऊंगा, और मैं आप पर आंसुओं के बदले ख़ून रोऊंगा।

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