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Date of publication : 10/7/2015 23:41
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रमज़ानुल मुबारक-10

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम फ़रमाते हैं कि रमज़ान को इसलिए रमजान कहा जाता है क्योंकि यह गुनाहों को जला देता है। अल्लाह की ख़ुशी के लिये रोज़ा रखने वालों पर हमारा सलाम हो। हमें उम्मीद है कि सभी मोमिनीन इस शुभ महीने में आत्म सुधार और आध्यात्मिक गुणों को हासिल करने के लिये पहले से ज़्यादा कोशिश कर रहे होंगे। यहां हम आपको क़ुरआने करीम में मौजूद उस दुआ से परिचित करवा रहे हैं जो माँ - बाप के संबन्ध में है ।

विलायत पोर्टलः


قال رسول الله صلى ‏الله ‏علیه ‏و ‏آله: إنَّما سُمِّیَ رَمَضانُ؛ لِأَنَّهُ یُرمِضُ الذُّنوبَ

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम फ़रमाते हैं कि रमज़ान को इसलिए रमजान कहा जाता है क्योंकि यह गुनाहों को जला देता है। अल्लाह की ख़ुशी के लिये रोज़ा रखने वालों पर हमारा सलाम हो। हमें उम्मीद है कि सभी मोमिनीन इस शुभ महीने में आत्म सुधार और आध्यात्मिक गुणों को हासिल करने के लिये पहले से ज़्यादा कोशिश कर रहे होंगे। यहां हम आपको क़ुरआने करीम में मौजूद उस दुआ से परिचित करवा रहे हैं जो माँ - बाप के संबन्ध में है । माँ - बाप को इस्लाम में बहुत ज़्यादा महत्व हासिल है क्योंकि वह हमारे लिये बहुत कष्ट व तकलीफ़े उठाते हैं। क़ुरआने करीम लोगों से सिफ़ारिश करता है कि अपने माँ - बाप के लिये दुआ किया करो। क़ुरआन में मौजूद एक दुआ इस तरह है: ऐ हमारे मालिक, जिस दिन कामों का हिसाब लिया जायेगा, तू हमारे माँ - बाप और ईमान वालों को माफ़ कर दे। एक दूसरी दुआ इस तरह है: ऐ परवरदिगार मुझे इस बात की योग्यता प्रदान कर कि तूने मुझे और मेरे माँ - बाप को जो अनुकंपाये प्रदान की हैं उनके लिये तेरा शुक्रिया अदा कर सकूं। और ऐसे भले काम करुं कि जिससे तू ख़ुश रहे।इस हिस्से में हम इफ़तारी देने के संबन्ध में बात करेंगे: इफ़तारी देना वह प्रशंसनीय और सवाब का काम है जिसे बहुत से मुसलमान रमज़ान के पाक महीने में करते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने इस ख़ूबसूरत काम के सम्बन्ध में कहा है: ऐ लोगों, जो कोई इस महीने में किसी रोज़ा रखने वाले को इफ़तार करायेगा अर्थात उसका रोज़ा खुलवायेगा, तो यह काम ऐसा है जैसे उसने एक बंदे को आज़ाद किया हो और उसका यह काम उसके पिछले गुनाहों के अल्लाह द्वारा माफ़ किये जाने का कारण बनता है। स्पष्ट है कि इफ़तारी देते समय इंसान की भावना केवल अल्लाह को ख़ुश करने और उसकी नज़दीकी व क़ुरबत हासिल करने की ही हो। और उसमें दिखावा और घमन्ड बिल्कुल नहीं होना चाहिये क्योंकि उस स्थिति में उसके इस काम की कोई क़ीमत नहीं रह जाएगी और अल्लाह उसे क़बूल नहीं करेगा। इसी तरह इफ़तारी के लिये ख़र्च किया गया माल हलाल होना चाहिये। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम हलाल रोज़ी के महत्व के संबन्ध में कहते हैं: जो इंसान अपनी मेहनत की हलाल कमाई से खाता है वह क़यामत के दिन पुले सेरात से बिजली की तरह तेज़ी से गुज़र जायेगा और अल्लाह जन्नत का दरवाज़ा उस के सामने खोल देगा कि जिस दरवाज़े से चाहे प्रवेश करे। इसी तरह इफ़तारी देने वाले को भी ख़ुद को कठिनाई में नहीं डालना चाहिये तथा संकोच के कारण बहुत सादगी के साथ ही इफ़तारी का प्रबन्ध करना चाहिये। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने उस इंसान के जवाब में जिसने कहा था कि मुझ में इफ़तारी देने की क्षमता नहीं है, कहा था कि एक खजूर या कम से कम थोड़े पानी से इफ़तार करवा दो।


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