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Date of publication : 3/10/2016 15:55
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इमाम हुसैन अ. एक बेमिसाल हस्ती।

अल्लाह तआला ने कुरआन में अपने मोमिन बंदों को हुक्म दिया है कि कोई भी काम केवल उसकी खुशी और मर्ज़ी के लिए अंजाम दें। ("صبغۃ اللہ و من احسن اللہ صبغۃ") कि ख़ुद पर ख़ुदाई रंग चढ़ा लो क्योंकि ख़ुदा के रंग से बेहतर कौन सा रंग है और एक और आयत में पैगंबर मोहम्मद स.अ. को सम्बोधित करके कहा कि ("ان تقوموا للہ مثنیٰ و فرادیٰ") दो दो होकर या अकेले अकेले अल्लाह के लिये उठ खड़े हो। कुरआन अल्लाह की राह में जिहाद करने वालों की प्रशंसा में कहता है कि ("اِنَّ اللہَ اشْتَرٰي مِنَ الْمُؤْمِنِيْنَ اَنْفُسَھُمْ وَ اَمْوَالَھُمْ بِاَنَّ لَھُمُ الْجَنَّۃَ") बेशक अल्लाह मोमिनों से उनकी जान व माल को जन्नत के बदले में खरीद लेता है। सन 4 हिजरी में शाबान महीने की तीसरी तारीख थी जब हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स.अ. की गोद में इमाम हुसैन अ. का आगमन हुआ। यह परिवार है जिसकी पवित्रता और सदाचार की गवाही अल्लाहअपने कलाम में इन शब्दों में देता है।
’’انما یُرید اللہ لیذھب عنکم الرّجس اھل البیت و یطھرکم تطھیرا‘‘
वास्तव में अल्लाह का इरादा है कि ऐ अहलेबैत (अ.ह) तुमसे नापाकी व अपवित्रता को इस तरह दूर रखे जिस तरह दूर रखने का हक़ है।
यही वह आयत है जिसे सामने रखते हुए इमाम हुसैन अ. ने मदीने में यज़ीद के गवर्नर के सामने बैअत से इंकार किया कि आप रसूले इस्लाम स.अ. के अहलेबैत और रेसालत की खान हैं और यज़ीद पापी, भ्रष्ट और अत्याचारी है उसकी बैअत नहीं कर सकता। कुरआन इस परिवार की पवित्रता का गवाह है। उस घर में जिसका प्रशिक्षण रसूले इस्लाम स.अ. की देखरेख में हुआ था जब इमाम हुसैन अ.ह का जन्म हुआ तो अरब की परम्परा के विपरीत कि जिसमें जब कोई बच्चा पैदा होता है तो नाम रखने वाले बढ़त लेने की कोशिश करते हैं, इस स्थान पर हम देखते हैं कि इस परंपरा से हटकर किसी ने रसूलुल्लाह स.अ. से बढ़त नहीं ली बल्कि आपका इंतजार किया कि वही (अल्लाह के संदेश) की ज़बान से नाम सामने आता है हालांकि आपकी माँ माता दुनिया भर की औरतों की सरदार और रसूले इस्लाम की बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा हैं और आपके बाप रसूले इस्लाम स.अ. के चचेरे भाई और दामाद अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली अ. हैं।
इतिहास में दर्ज है कि जब आपके जन्म की खबर हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम तक पहुंचाई गई तो आपने बहुत खुशी और आनन्द व प्रसन्नता व्यक्त की और प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन को अपने हाथों पर उठाकर अपने मुबारक व पवित्र थूक को पहले आहार के रूप में आपके मुंह में लगाया और नवजात का नाम हुसैन रखा और कहा कि हज़रत मूसा के भाई हारून के दो बेटे थे उनके नाम शब्बर और शब्बीर थे उनके नाम पर अपने नवासों के नाम रखता हूँ। याद रहे कि शब्बर का अरबी में अनुवाद है हसन जिसपर बड़े बेटे इमाम हसन का नाम रखा गया और शब्बीर का अनुवाद हुसैन है इसलिए आपका नाम हुसैन रखा गया और उलमा ने इस बात को बयान किया है कि यह नाम अरब में पहले नहीं थे और सबसे पहले यह नाम इमाम हसन और इमाम हुसैन के लिए चुने गए। हज़रत रसूले इस्लाम स.अ. ने हज़रत इमाम हुसैन का अक़ीक़ा खुद किया और एक मेढ़े को बतौर अकीका ज़िबह किया और जन्म के सातवें दिन आपने इमाम हुसैन के बाल मुंडवाये और बालों के बराबर चांदी ख़ुदा की राब में दान कर दी।
देखने में आया है कि जब कोई नवजात इस दुनिया में आता है तो उसका निजी परिचय नहीं होता उसके बारे में लोग सवाल करते हैं कि उसके पिता का नाम क्या है, उसके दादा का नाम क्या है, उसका परिवार कौन सा है किस परिवार का चिराग़ है, इस परिवार की विशेषताएं क्या हैं, क्या कारनामे अंजाम दिये हैं, समाज में क्या स्थान है, यह वह बातें हैं जो आमतौर पर किसी भी बच्चे के लिए पैदा होने से लेकर ज़िंदगी की अंतिम सांस तक परिचय के तौर पर पूछी जाती हैं और यही उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक और आध्यात्मिक परिवार से सम्बंध रखता है या किसी बड़े राजनीतिक व सामाजिक व्यक्ति या परिवाटर से संबंध रखता है किसी विश्वसनीय इल्मी नाम, मशहूर वक्ता व खतीब, प्रसिद्ध लेखक, प्रमुख कवि, किसी नामवर मुजाहिद और जंगजू, किसी राज परिवार की यादगार हो तो कई पुश्तों तक उसका नाम लोगों की जबान पर सुना जाता है, उसे महत्व दिया जाता है और अगर वह अधिक कारनामे अंजाम दिए, कोई इल्मी, धार्मिक, वैज्ञानिक या सामाजिक सेवा की और कोई बड़ा कारनामा किया तो उसके बाद आने वाली पीढ़ियों को उसके हवाले से याद रखा जाता है, उसका सम्मान किया जाता है, उसका आदर किया जाता है, यह सोने पा सुहागा वाली बात हो जाती है। इमाम हुसैन अ. मानव इतिहास की बहुत ही बेमिसाल हस्ती हैं जिन्हें चौदह सदियां बीत जाने के बाद भी पढ़ा लिखा और समझा जा रहा है। अनुसंधान और रिसर्च के माहिर उन पर रिसर्च चाहते हैं, उन्हें प्यार और इश्क़ करने वाले अपनी सीमाओं को छूने के लिए बेकरार दिखाई देते हैं।
इस बात को मद्देनजर रखते हुए जब हम हज़रत अली अ. व हज़रत फ़ातिमा अ. के बेटे हज़रत इमाम हुसैन के इतिहास का धारा मोड़ने वाले महान व्यक्तित्व की समीक्षा करते हैं तो एक सुखद आश्चर्य होता है कि इमाम हुसैन अ. अपनी अन्य विशेषताओं की तरह इस विशेषता में भी बेमिसाल शान वाले दिखाई देते हैं। क्या कोई इंसान अनुमान लगा सकता है कि क्या रिश्ते और कैसी कैसी महानताएं हज़रत इमाम हुसैन अ. के हिस्से में आई हैं वह किसके नवासे, किसकी आंखों के तारे हैं, किसके दिल के टुकड़े हैं और किसके भाई हैं? एक एक रिश्ते की महानता को देखने के लिए हिमालय जैसा कद चाहिए।
यह अनन्त श्रेय व उच्च स्थान केवल इमाम हुसैन अ. को हासिल है कि वह सैयदुल मुरसलीन के नवासे हैं। हुसैन का नाना कोई आम नाना नहीं है, यह वही हैं जिनके नाम के कारण ज़मीन व आसमान अपनी जगह पर टिके हैं, वही सैयदुल मुरसलीन जिनके कदमों की आहट सुनकर कोई ख़िज़्र बना और जिनके दर की भीख पाकर कोई सिकंदर कहलाया।
हुसैन का बाबा कौन? अली जिसका माथा कभी अल्लाह के अलावा किसी के लिये नहीं झुका, जिसकी एक एक सांस में नबी स.अ. की ख़ुशबू बसी रही, जो “बाबुल इल्म अर्थात इल्म का दरवाज़ा” है, जो हर रणभूमि में हैदर कर्रार कहलाया, जिसकी राजनीति पर इबादत का रंग हावी, जिसे काबे में विलादत और मस्जिद में शहादत नसीब हुई। हुसैन ने किसकी गोद में जन्म लिया? ख़ातूने जन्नत की गोद में! जिसकी की पवित्रता की गवाही क़ुरआन ने दी है, जिसकी चादर का कोना जन्नत की छाया है, जिसके घर की चहार दीवारी का जिबरईल ने कई बार तवाफ़ (चक्कर लगाना) किया है, जिसको रसूले इस्लाम ने दिल और जिगर का टुकड़ा कहा, जिसकी इस्मत क़ुरआन से साबित है जिसे कुरआन ने चादरे ततहीर ओढ़ाई जिसका नाम लेने के लिए ज़बान को कई बार मुश्क व अम्बर से वुज़ू करना पड़ता है, जिसकी नाराज़गी रसूल को भी बर्दाश्त नहीं, जिसके घर के सम्मान में सूरज की किरणों ने कभी झांक कर भी नहीं देखा। हुसैन भाई किसके हैं? उसके भाई जिसने सुलह का झंडा बुलंद किया ताकि दीन बाकी रहे, सिद्धांत बाक़ी रहें।
इमाम हुसैन की कुछ और विशेष बातें जिनकी समीक्षा करना बेहद जरूरी है यहाँ बयान की जा रही हैं। आपके व्यक्तित्व को केवल एक जंगजू, एक मुजाहिद, एक आजादी के अलमबरदार के रूप में नहीं देखनै चाहिए। इतिहास के पन्नों में आप हर हवाले से एक रहबर, लीडर और संपूर्ण इंसान के रूप में सामने आते हैं।
केवल व केवल अल्लाह के लिए आंदोलन
अल्लाह तआला ने कुरआन में अपने मोमिन बंदों को हुक्म दिया है कि कोई भी काम केवल उसकी खुशी और मर्ज़ी के लिए अंजाम दें। ("صبغۃ اللہ و من احسن اللہ صبغۃ") कि ख़ुद पर ख़ुदाई रंग चढ़ा लो क्योंकि ख़ुदा के रंग से बेहतर कौन सा रंग है और एक और आयत में पैगंबर मोहम्मद स.अ. को सम्बोधित करके कहा कि ("ان تقوموا للہ مثنیٰ و فرادیٰ")  दो दो होकर या अकेले अकेले अल्लाह के लिये उठ खड़े हो। कुरआन अल्लाह की राह में जिहाद करने वालों की प्रशंसा में कहता है कि
("اِنَّ اللہَ اشْتَرٰي مِنَ الْمُؤْمِنِيْنَ اَنْفُسَھُمْ وَ اَمْوَالَھُمْ بِاَنَّ لَھُمُ الْجَنَّۃَ")
बेशक अल्लाह मोमिनों से उनकी जान व माल को जन्नत के बदले में खरीद लेता है।
जैसा कि आपने देखा कि इस आयत में अल्लाह ने जन्नत को मुजाहिदों की जान और माल की कीमत बताया है।
और एक और आयत में कुछ महान इंसानों की प्रशंसा में कहा ("و من الناس من یّشری نفسہ ابتغآء مرضات اللہ") इस आयत में इस बात पर बल दिया गया है कि जो लोग अपनी जान और माल को अल्लाह से प्यार के बदले में बेचते हैं और उनका लक्ष्य और उद्देश्य केवल अल्लाह की मर्ज़ी होती है। इमाम हुसैन अ. ने कर्बला की ओर जो सफ़र किया वह केवल और केवल अल्लाह की इच्छा हासिल करने के लिए था, इसलिए यात्रा की शुरुआत के समय आप पैगम्बर स.अ. की कब्र के पास अल्लाह से दुआ करते हुये कहते हैं कि वह उन्हें सफलता दे और उन्हें ऐसे रास्ते पर चलाये कि जिसमें उसकी और उसके रसूल की खुशी और मर्ज़ी हो और इसी बात का पैग़म्बरे इस्लाम के अन्य कथनों में भी देखा जा सकता है।
आपकी उदारता
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उदारता की मिसाल थे। इतिहास में मिलता है कि “अबू हेशाम क़नाद” बसरा से इमाम हुसैन अ. के लिए कुछ माल भेजा करते थे और इमाम हुसैन अ. अपनी जगह से तब उठते थे जब सब कुछ लोगों को दान में बाट दिया करते थे। "इब्न असकरी" रिवायत करते हैं कि एक फ़कीर मदीना की गलियों में भीक मांग रहा था कि चलते चलते वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के दरवाजे पर पहुंचा। दरवाजे पर दस्तक दी और इस तरह का शेर पढ़ने लगा। "(अनुवाद) कि क्या आज वह व्यक्ति निराश पलटेगा जो आपसे उम्मीद लेकर आया है और उसने आपके दरवाजे पर दस्तक दी है। आप दान देने वाले व उदार इंसान हैं और आपके बाप भ्रष्टाचारों को ख़त्म करने वाले थे”। इमाम हुसैन अ. नमाज़ में व्यस्त थे, आपने नमाज़ ख़त्म की और बाहर आये, आपने उसके चेहरे से उसकी गरीबी को समझ लिया था, आप वापस पलट गए और क़म्बर को आवाज दी और कहा हमारे खर्च के पैसे में से कितने बाकी हैं, क़म्बर ने कहा वही दो सौ (200) दिरहम हैं जिनके बारे में आपने कहा ता कि आपके घर वालों में बांट दूं। आपने कहा कि वह सभी (दो सौ दिरहम) लाओ, कोई फ़क़ीर आया है कि जिसको इन दो सौ दिरहम की उनसे (घर वालों से) ज़्यादा ज़रूरत है, उस फ़क़ीर ने वह दिरहम लिये और यह कहता हुआ चला गया कि (اللہ اعلم حیث یجعل رسالتہ) “अल्लाह बेहतर जानता है कि वह अपनी रेसालत को किसे दे।




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