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Date of publication : 14/5/2015 22:35
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इमाम मूसा काज़िम (अ.ह.) की ज़िंदगी पर एक नज़र।

इमाम मूसा काज़िम (अ.ह.) ने विभिन्न अत्याचारी शासकों के दौर में ज़िंदगी बिताई। आपका युग, परिस्थितियों के हिसाब से बहुत दुखद और कठिनाइयों एंव दम घुट जाने वाला दौर था। हर आने वाले राजा ने इमाम पर सख्त नज़र रखी लेकिन यह आपका कमाल था कि आप दुखों और कठिनाईयों के दौर में भी कदम कदम पर लोगों को शिक्षा, ज्ञान और निर्देश देते रहे, इतने अनुचित हालात में आपने उस पाठशाला की जिसकी नींव आपके स्वर्गीय पिता ने रखी थी रक्षा की। आपका मख्य उद्देश्य उम्मत का निर्देशन और ज्ञान प्रसारण था जिसका आपने कदम कदम पर प्रचार किया।


विलायत पोर्टलः इमाम मूसा काज़िम (अ.ह.) ने विभिन्न अत्याचारी शासकों के दौर में ज़िंदगी बिताई। आपका युग, परिस्थितियों के हिसाब से बहुत दुखद और कठिनाइयों एंव दम घुट जाने वाला दौर था। हर आने वाले राजा ने इमाम पर सख्त नज़र रखी लेकिन यह आपका कमाल था कि आप दुखों और कठिनाईयों के दौर में भी कदम कदम पर लोगों को शिक्षा, ज्ञान और निर्देश देते रहे, इतने अनुचित हालात में आपने उस पाठशाला की जिसकी नींव आपके स्वर्गीय पिता ने रखी थी रक्षा की। आपका मख्य उद्देश्य उम्मत का निर्देशन और ज्ञान प्रसारण था जिसका आपने कदम कदम पर प्रचार किया।

इसलिए इतिहास में मिलता है कि एक बार मेहदी जो अपने ज़माने का शासक था मदीना आया और इमाम मूसा काज़िम अ.ह. से शराब के हराम होने पर चर्चा करने लगा वह अपने मन में सोच रहा था कि इस प्रकार वह इमाम को अपमानित कर देगा लेकिन शायद वह यह नहीं जानता था कि आप मदीनतुल इल्म (इल्म का शहर) के वारिस हैं। वह इमाम से सवाल करता है कि आप शराब के हराम होने पर कुरान से तर्क पेश करें। इमाम ने कहा अल्लाह ने पवित्र कुरआन के सूरा-ए-आराफ में कहा है कि मेरे ऐ हबीब! कह दो मेरे ख़ुदा ने बुरे कामों चाहे खुल्लम खुल्ला हो चाहे छुपके व इस्म व अत्याचार को हराम घोषित किया है और यहाँ इस्म का अर्थ शराब है, इमाम यह कहकर चुप नहीं होते हैं बल्कि कहते हैं खुदा सूरा-ए-बक़रा में कहता है कि ऐ मेरे हबीब!

लोग तुमसे शराब और जुये के बारे में सवाल करते हैं कह दो कि ये दोनों बड़े पाप हैं इसलिए शराब को कुरान में स्पष्ट रूप से हराम घोषित किया गया है। महदी, इमाम के इस जवाब से बहुत प्रभावित हुआ और बेइख़्तियार कहने लगा ऐसा ज्ञानात्मक जवाब पैग़म्बरे इस्लाम की संतान के अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता यही कारण था कि लोगों के दिलों पर इमाम की हुकूमत थी यद्यपि लोगों के शरीर पर शासक हुकूमत कर रहे थे। हारून के हालात में मिलता है कि एक बार पैगम्बर स.अ. की क़ब्र पर खड़ा एस होकर कहता हैः हे अल्लाह के रसूल आप पर सलाम ऐ मेरे चचा के बेटे आप पर सलाम, वह यह चाहता था कि मेरे इस प्रकार से लोग यह जान लें कि खलीफा, रसूल का रिश्तेदार है।

इसी बीच इमाम मूसा काज़िम अ.ह. पैगम्बर स.अ. की क़ब्र के पास आये और फ़रमायाः ''ऐ अल्लाह के रसूल आप पर सलाम, ऐ मेरे दादा आप पर सलाम। हारून इमाम के इस वाक्य से बहुत ग़ुस्सा हुआ तुरंत इमाम की तरफ़ रुख़ करके कहता हैः आप रसूल के बेटे होने का दावा कैसे कर सकते हैं? जब कि आप अली मुर्तज़ा के बेटे हैं। इमाम ने फरमाया तूने कुरआन में सूरा-ए-अनआम की आयत नहीं पढ़ी जिसमें अल्लाह कहता है इब्राहीम की संतान से दाऊद, सुलैमान, अय्यूब, यूसुफ, मूसा, हारून, ज़करिया, याह्या, ईसा और इलयास यह सब हमारे नेक बंदे थे हमने उनका मार्गदर्शन किया। इस आयत में अल्लाह ने हज़रत ईसा को पिछले पैग़म्बरों का बेटा बताया है हालांकि ईसा बिना बाप के पैदा हुए थे, हज़रत मरियम की ओर से पिछले पैग़म्बरों की ओर निस्बत दी गई है इस आयत के हिसाब से बेटी की संतान को बेटा माना जाता है, इस तर्क के हिसाब से मैं अपनी माँ फातिमा की ओर से रसूले इस्लाम स.अ. का बेटा हूँ।

इसके बाद इमाम कहते हैं कि हे हारून! यह बता कि अगर इस समय पैगम्बर दुनिया में आ जाये और अपने लिए तेरी बेटी का रिश्ता दें तो तुम अपनी बेटी का निकाह पैगंबर से करोगे कि नही? हारून फौरन जवाब देता है कि न केवल यह कि मैं अपनी बेटी की शादी पैग़म्बर से कर दूंगा बल्कि इस कारनामे पर पूरे अरब और ग़ैर अरब पर गर्व भी करूंगा, इमाम कहते हैं कि तो इस संबंध में तुम सारे अरबों और अजमों (गैर अरब) पर गर्व करोगे लेकिन पैग़म्बर हमारी बेटी से रिश्ता नहीं दे सकते इसलिए कि हमारी बेटियों पैग़म्बर की बेटियाँ हैं और बाप पर बेटी से शादी हराम है, इमाम के इस तर्क से हारून उस समय बहुत लज्जित हो गया। इमाम मूसा काज़िम अ.ह. ने इमामत के आधार पर बड़े बड़े घमंडी राजाओं से अपने ज्ञान का सिक्का मनवा लिया। इमाम कदम कदम पर लोगों का मार्गदर्शन करते रहे, इसलिए जब हारून ने अली बिन यक्तीन को अपना मंत्री बनाना चाहा और अली इब्ने यक्तीन ने इमाम मूसा काज़िम अ.ह. से परामर्श किया तो आपने अनुमति देदी, इमाम का उद्देश्य था कि इस तरीक़े से शियों के जान-माल व अधिकार सुरक्षित रहेंगे।

इमाम ने अली बिन यक्तीन से कहा तुम हमारे शियों की जान व माल को हारून के शर से बचाना हम तुम्हारी तीन चीज़ों की गारंटी लेते हैं कि अगर तुमने इस मिशन को पूरा किया तो हम गारंटी लेते हैं तुम तलवार से कभी मारे नहीं जाआगे, कभी दरिद्र व फ़क़ीर नहीं होगे, तुम्हें कभी बंदी नहीं बनाया जाएगा। अली इब्ने यक्तीन हमेशा इमाम के शियों को हुकूमत की बुराईयों से बचाते रहे और इमाम का वादा भी पूरा हुआ। न हारून, अली इब्ने यक्तीन की हत्या कर सका, न वह फ़क़ीर हुए, न बंदी बनाये गये। लोगों ने बहुत चाहा कि अली इब्ने यक्तीन की हत्या करा दी जाए लेकिन इमाम की गारंटी, अली बिन यक्तीन की सुरक्षा करती रही। एक बार हारून ने अली इब्ने यक्तीन को कीमती कपड़े उपहार में दिये, अली बिन यक्तीन ने इस कपड़े को इमाम मूसा काज़िम अ.ह. की सेवा में पेश किया कि मौला यह आपके लिये है।

इमाम ने उस कपड़े को वापस कर दिया और कहा ऐ अली इब्ने यक्तीन इस कपड़े को अपने पास रखो यह बुरे समय में तुम्हारे काम आयेगा। उधर दुश्मनों ने राजा से शिकायत की कि अली इब्ने यक्तीन, इमाम काज़िम की इमामत का मानता है यह उन्हें ख़ुम्स की राशि देता है यहां तक ​​कि जो कपड़े आपने अली इब्ने यक्तीन को उपहार दिये थे वह भी उसने इमाम काज़िम अ. को दे दिया है। राजा को बहुत ग़ुस्सा आया और उसने अली इब्ने यक्तीन को फ़ांसी देने की ठान ली, तुरंत अली इब्ने यक्तीन को तलब किया और कहा वह कपड़े कहाँ है जो मैंने तुम्हें उपहार में दिये थे? अली इब्ने यक्तीन ने गुलाम को भेजकर कपड़े, हारून के सामने पेश कर दिये हारून बहुत ज़्यादा शर्मिंदा हुआ है इमाम के उपाय से अली इब्ने यक़्तीन की जान बच गई।



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