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Date of publication : 2/4/2015 21:13
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यमन पर सऊदी हमले और पर्दे के पीछे की सच्चाई।

बौखलाहट के हालत में यमन पर हवाई हमलों के पीछे बहुत से कारण छुपे हैं। सबसे पहले इस महत्वपूर्ण प्वाइंट पर ध्यान देना जरूरी है कि यमन में जो कुछ भी हो रहा है, वह पूर्व निर्धारित अमेरिकी योजना का हिस्सा है। पिछले कई महीनों से सऊदी अरब और इस्राईल, अमेरिका पर आरोप लगाते रहे हैं कि उसने क्षेत्र से संबंधित अपनी नीतियों को बदल लिया है और बहुत हद तक तब्दील हो चुका है। वास्तविकता तो यह है कि यही संयुक्त भूराजनीतिक प्वाइंट, इस्राईल और सऊदी अरब को इस हद तक आपस में करीब लाने का कारण बना है।


विलायत पोर्टलः बौखलाहट के हालत में यमन पर हवाई हमलों के पीछे बहुत से कारण छुपे हैं। सबसे पहले इस महत्वपूर्ण प्वाइंट पर ध्यान देना जरूरी है कि यमन में जो कुछ भी हो रहा है, वह पूर्व निर्धारित अमेरिकी योजना का हिस्सा है। पिछले कई महीनों से सऊदी अरब और इस्राईल, अमेरिका पर आरोप लगाते रहे हैं कि उसने क्षेत्र से संबंधित अपनी नीतियों को बदल लिया है और बहुत हद तक तब्दील हो चुका है। वास्तविकता तो यह है कि यही संयुक्त भूराजनीतिक प्वाइंट, इस्राईल और सऊदी अरब को इस हद तक आपस में करीब लाने का कारण बना है।

यमन के खिलाफ शुरू होने वाली लड़ाई निसंदेह मध्यपूर्व में महत्वपूर्ण जयूपोलिटेकल परिवर्तन की एक श्रृंखला जन्म लेने का कारण बनेगी। यह परिवर्तन एक हिसाब से क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले पिछले परिवर्तनों का सिलसिला है, लेकिन एक और निगाह से उसे अरब स्प्रिंग और उसके प्रभावों से हटकर भी देखा जा सकता है। सऊदी अरब ने यमन में कोई विशेष शक्ति प्रदर्शन नहीं किया है और सच तो यह है कि वह ऐसा कर भी नहीं सकता है। सऊदी सेना यहां तक ​​अपने देश की सीमाओं की रक्षा करने में असमर्थ है तो कहां से दूसरे देश में झंडा फहराने की सोच सकती है। इसी तरह उसका सहयोगी देश मिस्र भी अपने क्षेत्र सीना रेगिस्तान को नियंत्रित करने में असमर्थ नजर आता है, लेकिन उसके सिर पर यमनी शियों, जो मां के पेट से ही शेर की तरह बहादुर पैदा होते हैं, को नियंत्रित करने का भूत सवार हुआ है। इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या हुआ जो सऊदी अरब और उसके सहयोगी यमन पर टूट पड़े हैं?

इस सोच से कि अमेरिका क्षेत्र में अपने सहयोगियों को अकेला छोड़ चुका है और गुप्त रूप से ईरान से गठजोड़ करने में व्यस्त है। यह सोच कहती है कि अमेरिका अपने सहयोगियों की खातिर क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का साहस, जुनून और ताकत खो चुका है और एक तरह से अपनी जान क्षेत्र की समस्याओं और मुद्दों से छुड़ाने की कोशिश में है। इस्राईल और सऊदी अरब की ओर से ईरान और अमेरिका के बीच संभावित परमाणु समझौते के कड़े शब्दों में विरोध का मुख्य कारण भी दरअसल इसी आधार पर है। इन दोनों की दृष्टि में ईरान और अमेरिका के बीच जारी परमाणु वार्ता और संभावित परमाणु समझौता बड़े स्तर पर भूराजनीतिक गठजोड़ का नतीजा है, जिसके हिसाब से अमेरिका की नज़र में ईरान की स्थिति दुश्मन से बदल कर ज़्यादा से ज़्यादा एक क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी के रूप में रह जाएगी। अगर हमारी बात सही न हो तो इस्राईल और सऊदी अरब की ओर से ईरान और अमेरिका के बीच जारी परमाणु वार्ता का विरोध बेकार हो जाती है, क्योंकि वह खुद भी इस बात को मानते हैं कि ईरान के साथ परमाणु विवाद के समाधान के लिए सबसे अच्छा तरीका वही है जिसे अमेरिका ने इस समय अपना रखा है।

पिछले कई महीनों से सऊदी अरब, जो आजकल कमजोर पोज़ीशन में है, ज़्यादा और इस्राईल थोड़ा कम अमेरिका से यह मांग करते आये हैं कि वह इस बात का आश्वासन दिलाये कि ईरान के साथ संभावित परमाणु समझौता किसी भूराजनीतिक समझौते में परिवर्तित नहीं होगा और उसका परिणाम ईरान को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में मान्यता दिये जाने की स्थिति में नहीं निकलेगा। अब जब अमेरिका और ईरान के बीच जारी परमाणु वार्ता एक संभावित समझौते के करीब हो रही है तो इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा पर दबाव पहले से भी ज्यादा हो चुका होगा। सच्चाई यह है कि बराक ओबामा को ईरान के साथ परमाणु वार्ता के अंतिम दौर से पहले अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को विश्वास दिला देनी चाहिये था, जैसा कि कुछ सप्ताह पहले अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन केरी ने जद्दा में यह बयान दिया था कि ईरान के साथ कोई बड़ा समझौता नहीं हो रहा है बल्कि परमाणु वार्ता का उद्देश्य ईरान की परमाणु शक्ति को नियंत्रित करना है और ईरान की ओर से पेस आने वाले खतरा, परमाणु गतिविधियों में फैलाव से नहीं बल्कि भूराजनीतिक ख़तरा है।

अमेरिका की ओर से यमन के खिलाफ जंग की अनुमति दिए जाने और हमले के तुरंत बाद खुल्लम खुल्ला समर्थन देने ने इस बारे में किसी शक की गुंजाइश बाक़ी नहीं छोड़ी कि यह हमला इस पहलू से पूरी तरह से परमाणु वार्ता से जुड़ा है और वास्तव में दो महत्वपूर्ण संदेश लिए हुए है: एक संदेश ईरान के नाम, जो सीआईए के प्रमुख जॉन बिरनेन ने कुछ दिन पहले फॉक्स न्यूज को दिए गये इंटरव्यू में कहा भी यानी “ईरान यह जान ले कि अमेरिका भूराजनीतिक दृष्टि से उसे अपना दुश्मन समझता है” और दूसरा संदेश सऊदी अरब और इस्राईल के नाम। इस्राईल और सऊदी अरब के नाम संदेश, जिसे वास्तव में एक तरह का भूराजनीतिक आश्वासन भी कहा जा सकता है, यह है कि ईरान के साथ अमेरिका का संभावित परमाणु समझौता न केवल क्षेत्र में ईरान और अमेरिका के बीच टकराव को कम करने का कारण नहीं बनेगा बल्कि इसमें और ज़्यादा बढ़ोत्तरी आएगी और विशेष रूप से सऊदी अरब को इस बाबत संतुष्ट रहना चाहिए कि ईरान क्षेत्रीय शक्ति में आश्चर्यजनक वृद्धि के मुक़ाबले में उसे पहले की तरह अमेरिका का समर्थन हासिल रहेगा।

भूराजनीतिक आश्वासन के मुद्दे के अलावा, जो इस हमले को ईरान परमाणु वार्ता से जोड़ता है, यमन पर हवाई आक्रामकता एक और पहलू से भी अमेरिका से कनेक्टेड है। इस पहलू को समझने के लिए शुरू में वेस्ट प्वाइंट आर्मी कॉलेज में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भाषण की मुख्य बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है, क्योंकि उससे अमेरिका की विदेश नीति पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस भाषण में जोर देकर कहा: सबसे पहले किसी भी नई जंग की शुरुआत के बारे में अमेरिकी जनता में पाई जाने वाली सख़्त नफ़रत, अमेरिकी सेना की कमजोरी और थकान, अत्यंत गंभीर आर्थिक कठिनाइयों और आधुनिक खतरों के तथ्य और प्रकृति में परिवर्तन के कारण अमेरिका अपनी विदेश नीति में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करने की रणनीति छोड़ चुका है और उसकी जगह,

1. रिमोर्ट मैनेजमेंट

2. क्षेत्रीय समस्याओं को हल करने का काम क्षेत्रीय खिलाड़ियों को सौंपना,

3. सैन्य संचालन को मुख्य खुफिया संचालन के करीब लाने और नतीजे में सेना का भार कम करना

4. क्षेत्रीय सहयोगियों पर आधारित गठबंधन

5. डायरेक्ट हस्तक्षेप से बचना

6. आर्थिक प्रतिबंधों और चेतावनियाँ जैसी रणनीति का अधिक इस्तेमाल करना।

वेस्ट प्वाइंट स्ट्रॉटेजी हालांकि एक सुंदर और व्यवस्थित नीति है लेकिन इसकी घोषणा दरअसल अमेरिका के सुपर पावर होने के युग के अंत (जैसा कि राजनीतिक सुपर पावर होने के युग का अंत कुछ साल पहले हो चुका है) को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना है, इसलिए क्षेत्र के अक्सर देश इस तथ्य को समझ चुके हैं।

इसलिए उन्हें स्वयं अपनी समस्याओं के समाधान के बारे में निर्णय और कदम उठाना होगा। तब से लेकर आज तक अमेरिका ने कई बार अपने सहयोगियों के साथ इस आधुनिक रणनीति का अभ्यास करने की कोशिश की है। आईएसआईएल के खिलाफ सैन्य गठबंधन के गठन की समस्या बहुत कम समय में बेकार हो गई, क्योंकि शुरुआत से ही आईएसआईएल के खिलाफ गंभीर कार्रवाई करने का इरादा नहीं था। मजे की बात यह कि वह देश जो आईएसआईएल के खिलाफ गठबंधन में शामिल हुए खुद ही आईएसआईएल के असली समर्थकों में गिने जाते थे। इसलिए पहले से पता था कि क्या होने वाला है, क्योंकि चाकू कभी भी अपने दस्ते को नहीं काट सकता। बहरहाल, स्ट्रॉटेजिक दृष्टि से आईएसआईएल के खिलाफ बनने वाले गठबंधन के शुरुआत से ही स्पष्ट था कि अमेरिका स्वयं सैन्य हस्तक्षेप नहीं करना चाहता बल्कि वांछित लक्ष्य अपने सहयोगियों के माध्यम से प्राप्त करने का इच्छुक है।

यह कहना सही होगा कि अमेरिकी सरकार ने यमन के मसले में पहली बार वेस्ट प्वाइंट रणनीति को पूरी तरह से लागू किया है। एक गंभीर भूराजनीतिक संकट उत्पन्न होता है और अमेरिका न तो सीधे सैन्य हस्तक्षेप का इरादा रखता है और न उसमें ऐसा करने की शक्ति है, जबकि वह इस मुद्दे को अपने हाल पर भी नहीं छोड़ सकता, इसलिए अपनी कठपुतली हुकूमतों से मांग करता है कि वह एक सैन्य गठबंधन बनाएँ और इस समस्या को हल करें जबकि खुद उनकी राजनीतिक, खुफिया और रसद द्वारा सहायता पर ही संतोष करता है। अमेरिका समझता है कि वह इस रणनीति की मदद से सांप को मार सकता है और लाठी भी बचा सकता है, यानी मौजूदा कठिनाइयों और समस्याओं से सीधे तोर पर रूबरू हुए बिना उन्हें हल कर सकता है। अमेरिका यमन में जन्म लेने वाले गंभीर भूराजनीतिक संकट को सऊदी अरब, कतर, कुवैत, मिस्र और सूडान के माध्यम से हल करने का इरादा रखता है, ताकि इस तरह इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में हुए पिछले कड़ुवे अनुभव फिर से दोहराये न जायें। यह बात देखने में उचित भी नजर आती है यानी वह देश सीधे तौर पर हस्तक्षेप करें जो क्षेत्र को अच्छी तरह जानते हैं, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और वर्गीय मालूमात से अच्छी तरह परिचित हैं और सबसे महत्वपूर्ण यह कि जिन्हें इस समस्या के समाधान में सीधे तौर पर फ़ायदा मिल रहा है।

लेकिन वह महत्वपूर्ण बात जिससे अमेरिकी अधिकारी लापरवाही बरत रहे हैं वह “कौशल” है। जब अमेरिकी सेना, जो खुद को दुनिया की नंबर वन सेना समझती है, अतीत के अनुभवों को दोहराये जाने के डर से औपचारिक रूप से जंग के मैदान से पीछे हट जाती है, तो सऊदी अरब की शर्तों और मिस्र के ऐसे सैनिकों से जिन्होंने सूरज तक नहीं देखा, इस हद तक गंभीर और जटिल संकट को हल करने की क्या उम्मीद रखी जा सकती है? जैसा कि वेस्ट प्वाइंट रणनीति पर कमेंट करने वालों ने उसी समय यह अनुमान लगाया था कि इस रणनीति की सबसे बड़ा त्रुटि यह है कि बहुत गंभीर और गहरे संकट का समाधान ऐसे खिलाड़ियों को सौंप दिए जाने का निर्णय लिया गया है जो बहुत कम महारत व कौशल रखते हैं और उनसे यह उम्मीद रखी जाना कि वह ऐसे मुद्दों को हल कर पाएंगे, जिनका सामना करने से उनका बाप (अमेरिका) कतरा रहा है, मूर्खतापूर्ण है।

यमन का मुद्दा बहुत अच्छी तरह इस सच्चाई को उजागर कर देगा कि विदेशी हस्तक्षेप कितना हानिकारक है, क्षेत्रीय खिलाड़ियों से काम लेना उतना ही मूर्खतापूर्ण है जितना उनकी उपेक्षा करना। यमन पर अमेरिका के सहयोगियों का सैन्य अभियान उसी शिद्दत से हार का मज़ा चखेगा जिस शिद्दत से अमेरिका की एकतरफा सैन्य कार्रवाई को हार मिलती रही है और अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगी उतना ही कमज़ोर हैं जितना खुद अमेरिका कमज़ोर है। यमन की गिनती क्षेत्र के उन कुछ देशों में होती है जो अमेरिका को यह समझा देंगे कि वह अपनी सामरिक कमजोरी को तकनीकी चालाकी के माध्यम से छिपा नहीं सकता और उसकी “वेस्ट प्वाइंट रणनीति” कम से कम मध्यपूर्व में यहां तक कि एक शहर पर भी नियंत्रण पाने में बेफ़ायदा साबित नहीं हो सकती।


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