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Date of publication : 30/3/2015 17:47
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यमन पर क़ब्ज़ा सम्भव नहीं, सऊदी अरब की हार निश्चित है।

इतिहास गवाह है कि यमन पर क़ब्ज़ा सम्भव नहीं है। यहां के लोग बहादुर योद्धा, अंथक और ईमानी भावना से लैस हैं। यमन की जनता सख्त जान और उनकी भावनाओं को पराजित करना सम्भव नहीं है।


विलायत पोर्टलः इतिहास गवाह है कि यमन पर क़ब्ज़ा सम्भव नहीं है। यहां के लोग बहादुर योद्धा, अंथक और ईमानी भावना से लैस हैं।

यमन की जनता सख्त जान और उनकी भावनाओं को पराजित करना सम्भव नहीं है। यहां 50 लाख हौसी सादात रहते हैं, यहां की 60 प्रतिशत आबादी ज़ैदी समुदाय पर आधारित है, जिन्होंने एक लंबे समय तक यमन पर शासन किया है। हौसी यमन में एक राजनीतिक हैसियत के मालिक हैं। यमन के बर्ख़ास्त राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह हौसी जनजाति से सम्बंध रखते हैं, वहाँ पर सभी धर्मों के लोगों के बीच धार्मिक समन्वय पाया जाता है।

यमन में सउदी हमले से इस्लामी दुनिया में बेचैनी की एक नई लहर पैदा हो चुकी है और सोचने वाले लोग इस बिंदु पर पहुंच चुके हैं कि यह हमला करके सऊदी अरब ने अपनी तबाही को खुद ललकारा है और इस थोपी गई लड़ाई का नुकसान खुद सऊदी अरब को उठाना पड़ेगा।

हौसी सैन्य गठबंधन के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए 185 लड़ाकू विमानों को यमन भेजा जाना सऊदी अरब की विदेश नीति में एक अजीब और अद्भुत परिवर्तन का सूचक है। हो सकता है कि सऊदी सरकार इसको अपनी सफलता समझे लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत लग रही है। यमन की भौगोलिक स्थिति और इस क्षेत्र का इतिहास है कि यह क्षेत्र कई बार बाहरी ताकतों की आक्रामकता का निशाना बना लेकिन इन शक्तियों को मुंह की खानी पड़ी। सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों को भी इसी तरह हार का सामना करना पड़ेगा।

सऊदी समर्थित आतंकवादी गुट अलक़ायदा और आईएसआईएल आदि ने वहां पर अराजकता, सांप्रदायिकता और आतंकवाद को हवा देने की भरपूर कोशिश की, ताकि वहां की आबादी सऊदी अरब में राजशाही के लिए खतरा न बने लेकिन यह ताकतें अपने गलत उद्देश्यों में बुरी तरह विफल रही हैं। अंसारुल्लाह यमन की एक प्रभावी राजनीतिक पार्टी है उसे वहाँ सभी धार्मिक गुटों का समर्थन हासिल है उस पर आतंकवाद का आरोप सरासर बेबुनियाद और अतार्किक है।

अतीत में सऊदी अरब की भरपूर कोशिश रही कि यमन को अस्थिरता व अशांति से ग्रस्त कर दिया जाये और उसे इतना कमजोर और असुरक्षित बना दिया जाए कि वह कभी भी एक मज़बूत ताक़त बनकर क्षेत्र के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत साबित न कर सके लेकिन सऊदी इसमें असफल रहा। इस विफलता का बदला लेने के लिए सऊदी अरब ने आज यमन पर हमला करने का फ़ैसला किया है। अफसोस तो इस बात का है कि सऊदी अरब जो मुसलमानों का चैंपियन बना हुआ है और आज यमन की मज़लूम जनता पर बमबारी कर रहा है जबकि उसने आज तक इस्राईल के खिलाफ एक शब्द तक नहीं बोला और उसकी यह चुप्पी इस्राईल दोस्ती का सूचक है।

आज पूरी दुनिया गवाह है कि सऊदी अरब ने सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों को कुचलते हुए यमन के मुसलमानों पर बमों की बौछार कर दी है। वह समय दूर नहीं जब यमन की मज़लूम जनता की गगनभेदी फरियाद और चीख व पुकार आले सऊद की तानाशाही के विनाश का कारण बनेगी। क्या इस बमबारी से महिलएं और दूध पीते बच्चे शहीद नहीं हो रहे हैं? क्या इससे निर्दोष मुसलमानों का खून नहीं बह रहा? और उनकी संपत्ति बर्बाद नहीं हो रही है? आखिर यह सब किस आधार पर किया जा रहा है, कौन सा धर्म, कौन सा कानून और कौन सी नैतिकता सऊदी सेना को इस बात की अनुमति देती है कि वह इस तरह की क्रूर कार्यवाही करे।

आज के राजनीतिक परिदृश्य में अगर सऊदी अरब अपने समर्थन में कुछ देशों पर आधारित एक गठबंधन बना लेने में सफल हो गया है जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है तो उसे इस बात को अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि इस गठबंधन के मुक़ाबले में कोई दूसरा मजबूत गठबंधन भी सामने आ सकता है। पाकिस्तान को चाहिए कि वह खुद को इस आग में न झोंके क्योंकि अतीत में इस तरह के कड़ुये अनुभवों से पाकिस्तान को सामना करना पड़ा हैं और वह घाव अभी ताजा हैं।


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