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Date of publication : 5/12/2014 8:35
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नम आंखों के साथ निकला बहत्तर ताबूतों का जुलूस।

बहत्तर ऐ ख़ुदा वालों-सलाम ऐ करबला वालों” के नाम से आज ऐतिहासिक आसिफ़ी इमामबाड़े में बहत्तर ताबूतों की ज़ियारत कराई गई। अन्जुमने शब्बीरिया के द्वारा आयोजित इस प्रोग्राम में मजलिस को मौलाना तक़ी रज़ा साहब ने सम्बोधित किया


विलायत पोर्टलः “बहत्तर ऐ ख़ुदा वालों-सलाम ऐ करबला वालों” के नाम से आज ऐतिहासिक आसिफ़ी इमामबाड़े में बहत्तर ताबूतों की ज़ियारत कराई गई। अन्जुमने शब्बीरिया के द्वारा आयोजित इस प्रोग्राम में मजलिस को मौलाना तक़ी रज़ा साहब ने सम्बोधित किया। इमाम बाड़े के पूरबी हिस्से से एक-एक करके बहत्तर ताबूत निकाले गए।
क़ैसर जौनपुरी की दर्द भरी आवाज़ और और मरसिए के साथ हर शबीह-ए-ताबूत का परिचय और करबला का वह मन्ज़र पेश किया गया। बड़ी संख्या में आए अज़ादार ताबूत देखकर करबला के उस मन्ज़र को याद करके रोने लगे। एक के बाद बरामद हुए ताबूत इमामबाड़े की हरी-भरी ज़मीन पर एक घेरे के रूप में आगे बढ़ते जा रहे थे जो एक दुःख भरा मन्ज़र पेश कर रहा था।
मौलाना तक़ी रज़ा साहब ने मजलिस को सम्बोधित करते हुए कहा कि अल्लाह से डरने और सदाचार व तक़वा को अपनाने की ताकीद की। उन्होंने कहा कि अल्लाह मोमिनों को सम्बोधित करते हुये उनसे तक़वा अपनाने को कहता है। मौलाना ने मोमिन की परिभाषा बयान करते हुए कहा कि, क़ुरआन में मोमिन की जो परिभाषा है वह आज के ज़माने में आसानी से उपलब्ध नही है। उन्होंने कहा हमारे समाज में तो अब मोमिन होने का दिखावा नज़र आता है, मोमिन नज़र नही आते। उन्होंने कहा मोमिन लालची नही होता बल्कि अल्लाह के दिए हुए रिज़्क़ व जीविका पर सन्तुष्ट रहता है।
उन्होंने कहा कि अपनी इच्छाओं व ख़्वाहिशों पर कन्ट्रोल करना आसान नही है लेकिन अपने नफ़्स पर क़ाबू पाना कमाल है और अपने नफ़्स से लड़ना सबसे बड़ा जेहाद है। ताबूतों की ज़ियारत का सिलसिला मजलिस के ख़त्म होने के बाद शुरू हुआ। सबसे पहले इमाम हुसैन अ. के साथियों व असहाब उसके बाद निकट-सम्बन्धियों के ताबूत बरामद हुए और सबसे आख़िर में छः महीने के बच्चे हज़रत अली असग़र का ताबूत निकाला गया।


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