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کد خبر : 62239
تاریخ انتشار : 8/11/2014 0:29
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शिफ़ाअत का ग़लत मतलब निकालना

क़यामत के दिन अल्लाह के वलियों की शिफ़ाअत कुछ शर्तों पर डिपेंड है। जिन शर्तों का इसी दुनिया में ह़ासिल करना ज़रूरी है। आयतों और रिवायतों में किसी इंसान या किसी समूह के लिए बयान नहीं किया गया है कि उन लोगों को ज़रूर शिफ़ाअत हासिल होगी। बल्कि जो लोग इस नेमत से फ़ायेदा उठाएंगे या इससे वंचित हैं केवल उनके गुणों और विशेषताओं को बयान किया गया है। आयतों और रिवायतों कि बुनियाद पर गुनहगारों की शिफ़ाअत नीचे बयान होने वाली शर्तों पर डिपेंड है।

जब शिफ़ाअत है तो गुनाहों से क्या डरना?
विलायत पोर्टलः क़यामत के दिन अल्लाह के वलियों की शिफ़ाअत कुछ शर्तों पर डिपेंड है। जिन शर्तों का इसी दुनिया में ह़ासिल करना ज़रूरी है। आयतों और रिवायतों में किसी इंसान या किसी समूह के लिए बयान नहीं किया गया है कि उन लोगों को ज़रूर शिफ़ाअत हासिल होगी। बल्कि जो लोग इस नेमत से फ़ायेदा उठाएंगे या इससे वंचित हैं केवल उनके गुणों और विशेषताओं को बयान किया गया है। आयतों और रिवायतों कि बुनियाद पर गुनहगारों की शिफ़ाअत नीचे बयान होने वाली शर्तों पर डिपेंड है।
1. अल्लाह की इच्छा
 शिफ़ाअत करने वाले लोग अल्लाह का फैज़ (अनुकंपा) हैं शिफ़ाअत की बेसिक शर्त यह है शिफ़ाअत अल्लाह की इच्छा के अनुसार हो, शिफ़ाअत करने वालों को अल्लाह ने पसंद किया है और उन्हें शिफ़ाअत की अनुमति दी है। अल्लाह क़ुर्आन में फ़रमाता है किः “ उस दिन किसी की सिफारिश लाभ नहीं पहुँचायेगी मगर केवल उन लोगों की जिनको अल्लाह ने अनुमति दी है। ( ताहा.....आयत 109) क़यामत में उन्हीं लोगो की शिफ़ाअत होगी जो लोग दुनिया में शिफ़ाअत करने वालों से आत्मिक व आध्यात्मिक संपर्क रखेंगे। और जो लोग दुनिया में अल्लाह के वलियों से प्यार व मुह़ब्बत करेंगे और उनके बताये हुए रास्ते पर चलेंगे, अक़ीदे और दृष्टिकोण में उनके साथ होंगे तो उन लोगों की भी शिफाअत होगी। लेकिन गुनहगारों की उस वक़्त शिफाअत होगी जब वह अल्लाह, रसूल इस्लाम (स.अ.) और उनके वलियों के ह़ुक्म पर अमल करें यानी अगर कोई सह़ी तरीक़े से अपनी दीनी ज़िम्मेदारी पूरी करता रहा है लेकिन कभी ग़लती कर बैठा तब भी आख़िरत में अल्लाह की रह़मत (दया) उसे हासिल होगी। दूसरी तरफ़ से, अल्लाह के उन चहेते व प्यारे इंसानों की शिफ़ाअत होगी जिन्होंने दुनिया में अल्लाह की इबादत की है, और उसकी मर्ज़ी के अनुसार ज़िन्दगी गुज़ारी हो। अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया है किः “केवल अल्लाह के चहेते और प्यारे इंसानों की शिफ़ाअत की जाएगी”। (अम्बिया आयत 28)
2. ईमान की सुरक्षा
शिफ़ाअत ऐसे लोगों की होगी जिनका ईमान गुनाहों की वजह से जोखिम में न पड़े इसी वजह से धार्मिक स्रोतों में इस तरह़ से आया है कि “क़यामत के दिन काफ़िर, मुशरिक और मुनाफ़िक़ की शिफ़ाअत नहीं होगी”। रसूल अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया है किः “मुशरिकों, काफ़िरों और शक करने वालों के लिए शिफ़ाअत नहीं है बल्कि शिफ़ाअत अल्लाह को एक मानने वाले मोमिनों के लिए है”। (मीज़ानुल ह़िक्मा जिल्द 4, पेज 1472)
3. दीनी अहकाम पर अमल करना (धार्मिक आदेशों का पालन करना)
उन लोगों के विपरीत कि जिन्होंने यह सोच रखा है कि शिफ़ाअत का वादा गुनाहों के करने और हर तरह़ कि ज़िम्मेदारी से बचाव का कारण है, वल्कि शिफ़ाअत के लिए शर्त धार्मिक आदेशों पर अमल करना, अल्लाह, रसूल (स...) और उसके इमामों (अ स) के ह़ुक्म को मानना है। क़ुरआन के दृष्टि से, जहन्नुमी लोगों की शिफ़ाअत न होने का कारण धार्मिक आदेशों का पालन न करना बताया गया है। जहन्नुमियों से सवाल किया जाएगा कि क्या चीज़ तुम्हारे जहन्नुम में जाने का कारण बनी? तो वह लोग जवाब देंगे कि हम नमाज़ नहीं पढ़ते थे, बेसहारा लोगों को ख़ाना नहीं ख़िलाते थे, ग़लत लोगों के साथ रहते थे और क़यामत को झुटलाते थे यहाँ तक कि मौत का वक़्त आ पहुँचा। इसलिए ऐसी सूरत में शिफ़ाअत का उन्हें कोई लाभ नहीं होगा। (मुदस्सिर आयतें 42/48)
4. शिफ़ाअत पाने और शिफ़ाअत करने वाले के बीच संबंध
जो लोग दुनिया में शिफ़ाअत करने वालों से संपर्क रखते होंगे, और ख़ुदा के वलियों से मुह़ब्बत व प्यार, दुनिया में उनकी हिदायत ह़ासिल करते रहे होंगे, विचार और अक़ीदे (आस्था व विश्वास) में उनके साथ होंगो आख़िरत में उनकी शिफ़ाअत होगी। वास्तव में अल्लाह का क़यामत के दिन अपने वलियों को माध्यम बनाने का कारण यही आध्यात्मिक संपर्क था। और यही प्यार व मुह़ब्बत इस संबंध के बढ़ाने का कारण बनी। रिवायतों में आया है कि जो रसूल अकरम के (स.अ.) घर वालों (अहलेबैत अ.) को यातनाएं पहुँचायेगा आप उसकी शिफ़ाअत नहीं करेंगे। रसूल इस्लाम (स.अ.) ने फ़रमायाः “अल्लाह की क़सम! जो लोग मेरे अहलेबैत (परिवार) को यातनाएं देंगे, मैं उनकी शिफ़ाअत नहीं करूँगा। पैग़म्बरे अकरम (स.अ.) और इमामों से सच्ची मुह़ब्बत गुनाहों व दुनिया से झूटी निर्भरता से रोकती है। इसी बेस पर अल्लाह के वलियों से मुह़ब्बत शिफ़ाअत की शर्त है ताकि इंसान इस मुह़ब्ब के उजाले में अल्लाह की क्षमा, दया, और उसकी कृपा से लाभ उठाए। इमाम सादिक़ (अ स) फ़रमाते हैं किः जो चाहता है कि उसकी शिफ़ाअत की जाए उसे अल्लाह की मर्ज़ी की खोज में रहना चाहिए। और यह भी जान लें कि किसी को अल्लाह की इच्छा ह़ासिल नहीं होगी जब तक कि वह अल्लाह, रसूल और उसके वलियों की इताअत न करे (बेह़ारूल अनवार जिल्द 75/ पेज220,) इस रिवायत में शिफ़ाअत की बुनियादी शर्त अल्लाह की इच्छा ह़ासिल करना और धार्मिक आदेशों पर अमल करना बताया है।
सारांश
शिफ़ाअत ऐसे गुनाहगारों की होगी जो अल्लाह, रसूल, और उसके वलियों के आदेशों का पालन करते रहे हों लेकिन कभी कभी पाप कर बैठे हों तो वह भी अल्लाह की दया और कृपा से लाभांवित होंगे। लेकिन जो लोग उपरोक्त शर्तों पर अमल न करते हों उन्हें शिफ़ाअत हासिल नहीं होगी।
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