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Date of publication : 2/9/2014 23:31
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जवान आयतुल्लाह ख़ामेनई की निगाह में। 2

हर नौजवान के सामने कुछ चैलेंज होते हैं। उससे यह नहीं कहा जा सकता कि तुम उनके बारे में न सोचो। नौजवान को सबसे पहले अपनी पढ़ाई, और फ़्युचर (मुस्तक़बिल) की फ़िक्र होती है। वह अपने फ़्युचर को संवारना चाहता है। वह अपना घर-बार बसाना चाहता है



विलायत पोर्टलः 11. हर नौजवान के सामने कुछ चैलेंज होते हैं। उससे यह नहीं कहा जा सकता कि तुम उनके बारे में न सोचो। नौजवान को सबसे पहले अपनी पढ़ाई, और फ़्युचर (मुस्तक़बिल) की फ़िक्र होती है। वह अपने फ़्युचर को संवारना चाहता है। वह अपना घर-बार बसाना चाहता है। ख़ूबसूरत चीज़ों की तरफ़ उसका लगाव ज़्यादा होता है। जिन चीज़ों का सम्बंध एहसास (एमोशन) और भावना से है नौजवान का भी उन चीज़ों से गहरा सम्बंध है। लेकिन नौजवान केवल उन्ही चीज़ों के बारे नहीं सोचता बल्कि वह अपनी सुसाईटी की समस्याओं के बारे में भी चिंतित रहता है। अगर समाज में ऊँच-नीच हो तो वह व्याकुल परेशान रहता है। अगर सुसाईटी में न्याय न हो तो वह परेशान रहता है। अगर समाज में बुराईयाँ फैलने लगें तो नौजवान अपने मुल्क को इससे छुटकारा दिलाने की कोशिश करता है। वह समाज का दर्द रखता है। अगर किसी जगह पर इन्क़ेलाबी सोच और अमल की ज़रूरत हो तो नौजवान उससे दूर नहीं रह सकता है। (अराक शहेर के नौजवानों से मुलाक़ात के दौरान, 16/11/2000) 12. मैं यह नहीं कहता कि नौजवान मुस्तहब इबादतें ज़्यादा करें जैसे ज़्यादा दुआएं पढ़ें, बहुत ज़्यादा क़ुरआन की तिलावत करें या मुस्तहेब्बी नमाज़ें पढ़ें बल्कि मैं कहता हूँ कि वह जितनी भी इबादत करें वह पूरे मन और ध्यान के साथ करें। (नौजवानों के एक कार्यक्रम में, 3/2/1998) 13. ज़िन्दगी चन्द पल की है! नौजवानी में इन्सान इस बात को समझ नहीं पाता लेकिन जब वह ज़िन्दगी के बारे में सोचता है और एक उम्र बसर कर लेता है तो उसकी समझ में आता है कि ज़िन्दगी चन्द पल से ज़्यादा की नहीं है। (13 आबान के यादगार दिन पर नौजवानों को संबोधित करते हुए, 5/11/1997) 14. दीनदारी को केवल दिखावटी अमल व इबादात के बजाय ख़ुदा से मुहब्बत और एक ख़ास सम्बंध से बदल देना चाहिये। आप अभी से कोशिश करें कि मतलब समझ कर नमाज़ पढ़ें। (स्कूली बच्चों को सम्बोधित करते हुए, 4/10/2001) 15. अगर मुझसे कहा जाये कि मैं एक वाक्य (जुमले) में बताऊँ कि मुझे नौजवानों से क्या चाहिये तो मैं कहूँगा:- पढ़ाई, तरबियत (परवरिश) और एक्सरसाइज़। (नौजवान सप्ताह के दौरान नौजवानों की सभा में 27/4/1998) 16. जवानों के लिये एक्सरसाइज़ बहुत ज़रूरी है। मेरा मानना है कि एक्सरसाइज़ सबके लिये बहुत ज़रूरी है लेकिन मेरा मतलब पेशेवर (व्यावसायिक) एक्सरसाइज़ नहीं है। पेशेवर एक्सरसाइज़ के लिये भी मना नहीं कर रहा हूँ लेकिन यह भी नहीं कहूँगा कि सारे नौजवान पेशेवर एक्सरसाइज़ की लाइन में ही चले जायें। अस्ल में एक्सरसाइज़ तो सेहत और तन्दुरुस्ती एवं फुर्ती को बनाये रखने का साधन (ज़रिया) है। (छात्रों एवं इस्लामी शैक्षिक संगठन के लोगों को सम्बोधित करते हुए, 26/2/2001) 17. आप लोगों (नौजवानों) के अन्दर एक ख़ज़ाना है। उसको निकालना चाहिये। इसे कौन निकालेगा? तय है कि आप ही को यह काम करना होगा। अपनी क्षमता (ताक़त) के ख़ज़ाने को सबसे पहले स्वयं इन्सान ही बाहर निकालता है। (स्कूली बच्चों के समूह को सम्बोधित करते हुए, 4/10/2001) 18. मुमकिन है कि कुछ एरियों में पढ़ाई की सम्भावनाएं न हों। मैं कमियों की तरफ़दारी (पक्ष) नहीं कर रहा हूँ लेकिन यह याद रखिये कि अगर मुझसे पब्लिक और सरकारी सीटों पर बैठे हुए अफ़सरों के बीच फ़ैसला करने को कहा जाये तो मैं हरगिज़ किसी अफ़सर को ख़ुश करने के लिये पब्लिक के हक़ को अनदेखा नहीं करुंगा। (अराक के नौजवानों के समूह को सम्बोधित करते हुए, 16/11/2000) 19. नौजवान की सबसे बड़ी ज़रूरत उसकी शख़्सियत (व्यक्तित्व) है। उसे अपने मक़सद (टार्गेट) और व्यक्तित्व को पहचानना चाहिये। उसे यह जानना चाहिये कि वह कौन है और क्या करना चाहता है? दुश्मन यह चाहता है कि नौजवानों से उनका व्यक्तित्व छीन ले। उनके टार्गेट और लक्ष्य को ख़त्म कर दे। उनसे कहे कि तुम कुछ भी नहीं हो इसलिये मेरे पास आ जाओ ताकि मैं तुम्हे ज़िन्दगी दूँ। (रश्त में नौजवानों और शिक्षा विभाग के ज़िम्मेदारों को सम्बोधित करते हुए, 2/5/2001) 20. ज़िम्मेदारियाँ और अधिकार (हक़) एक ही सक्के के दो पहलू हैं। बग़ैर ज़िम्मेदारी के किसी को कोई हक़ नहीं हासिल होता है। जिसे भी कुछ मिलता है उसे उसके बदले में कुछ न कुछ ज़िम्मेदारी दी जाती है इस लिये आप अपनी ज़िम्मेदारियों को छोड़ कर अपने अधिकारों की माँग न करें क्योंकि यह एक अक़्ली और मंतिक़ी (लॉजिकल) बात नहीं है। (ज़िला एसफ़ेयान के नौजवानों से भेंट के दौरान, 3/11/2001)


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