Thursday - 2018 June 21
Languages
Delicious facebook RSS दोस्तों को भेजें। प्रिंट सेव करें। XML TEXT PDF
Code : 57730
Date of publication : 17/12/2016 12:12
Hit : 650

इमाम जाफ़र सादिक़ अ. और मंसूर

मंसूर दवानिक़ी बनी अब्बास के ज़ालिम और अत्याचारी शासकों में से था। और बनी अब्बास के राजाओं में सबसे ख़राब और तुच्छ इंसान था। इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम पर ज़्यादा से ज़्यादा सख़्तियाँ करता था। उसने अपने ख़तरनाक और सख़्त जासूस आप पर थोप रखे थे।
विलायत पोर्टलः मंसूर दवानिक़ी बनी अब्बास के ज़ालिम और अत्याचारी शासकों में से था। और बनी अब्बास के राजाओं में सबसे ख़राब और तुच्छ इंसान था। इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम पर ज़्यादा से ज़्यादा सख़्तियाँ करता था। उसने अपने ख़तरनाक और सख़्त जासूस आप पर थोप रखे थे। उसने इमाम (अ.स) को यातनाएं देने के लिए, तकलीफ़ पहुंचाने के लिए और उनको शहीद करने के लिए कई बार अपने पास बुलाया लेकिन किसी न किसी वजह से वह अपनी नापाक नीयत में कामयाब नहीं हो पाता था। हज़रत इमाम मूसा काज़म अलैहिस्सलाम का बयान है: एक बार मंसूर ने मेरे वालिद इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को तलब किया ताकि उन्हें क़त्ल कर दे। इसके लिए उसने तलवार भी तैयार कर रखी थी, उसने रबीअ (जो मंसूर के दरबारियों में से था) को यह आदेश दे रखा था कि “जाफ़र बिन मुहम्मद” (अलैहिस्सलाम) मेरे पास आएं और मैं उनसे बातचीत करने लगूँ तो जिस समय मैं हाथ को हाथ पर मारूं फ़ौरन तुम उनकी गर्दन उड़ा देना। जैसे ही इमाम अलैहिस्सलाम आए मंसूर की निगाह आप पर पड़ी बे इख्तियार अपनी जगह से खड़ा हो गया और इमाम का स्वागत किया और यह जाहिर किया कि मैंने आपको इसलिए बुलाया है कि ताकि आपके उधारों को चुका दूँ। इसके बाद बहुत अच्छे अंदाज़ से इमाम के घर वालों और रिश्तेदारों के हालात पूछे और रबीअ से कहने लगा तीन दिन बाद इमाम को उनके घर वालों के पास पहुंचा देना। आख़िर मंसूर इमाम को सहन नहीं कर सका और जिस इमाम की इमामत और इल्म पूरी इस्लामी दुनिया में मशहूर था, उन्हें शव्वाल 148 हिजरी में ज़हर दे दिया गया। इमाम अलैहिस्सलाम ने 15 या 25 शव्वाल को 65 साल की उम्र में शहादत पाई. आपके पाक व पवित्र जिस्म को बक़ीअ नामी कब्रिस्तान में इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के पहलू में दफ़्न किया गया। इस समय कितना मुनासिब होगा अगर हम इमाम के शोक में उन पंक्तियों को दोहराएँ और आंसू बहाएं जो शिया शाएर “अबू हुरैरः बजली” ने इमाम की शहादत पर कही थीं: اقول و قــــدر احوا بہ یحملونـہ علی کاھل من حاملیہ و عائــق اتدرون ماذا تـحملون الی الثریٰ ثبیرا ثویٰ من رأس علیاء شاھق غداۃ حثی الحاثون فوق ضریحـہ ترابا و اولیٰ کان فوق المفارق वह लोग जो इमाम अलैहिस्सलाम का पाक जिस्म अपने शानों और सरों पर रखे कब्रिस्तान की ओर ले जा रहे थे मैंने उनसे कहा: क्या तुम जानते हो! किस महान इंसान को मिट्टी में दफ़्न करने जा रहे हो निश्चित रूप से वह बुलंदी, बड़ाई और महानता का एक उदाहरण थे जिन्हें ज़मीन में दफ़्न किया जा रहा है। कल सुबह लोग उनकी पाक कब्र पर ख़ाक डालेंगे। उचित तो यह है कि उनके दुख में हम अपने सरों पर मिट्टी डालें। इमाम अलैहिस्सलाम की शहादत से निश्चित रूप से इंसानियत और इस्लाम ने एक ऐसे रत्न को खो दिया है, कि अगर इमामत के लिए छः इमाम और न होते तो यह बात यक़ीन से कही जा सकती थी कि दुनिया में क़यामत तक ऐसा इंसान पैदा नहीं होगा। अल्लाह फ़रिश्तों, नेक बन्दों और मोमिनीन का सलाम हो आपकी पाक रूह पाक पर।



आपका कमेंट



मेरा कमेंट शो न किया जाये
Security Code :