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Date of publication : 2/7/2016 11:1
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वहाबी कौन हैं और उनकी विचारधाराएं क्या हैं? (1)

वहाबियत ने वजूद में आते ही शियों के साथ दुश्मनी का ऐलान कर दिया था बल्कि यह समुदाय वास्तव में शियों ही के खिलाफ़ बनाया गया था लेकिन चौदहवीं शताब्दी में इमाम खुमैनी (रह) की लीडरशिप में ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब की सफलता के बाद शियों के प्रति इस समुदाय की हिंसक गतिविधियों में कई गुना बढ़ोत्तरी आ गई और शियों के खिलाफ़ प्रोपगंडों और झूठे प्रचारों ने भी ज़ोर पकड़ लिया

विलायत पोर्टलः दुनिया के सभी मुसलमान और ग़ैर मुसलमान इस बात के गवाह है कि कुछ सालों से अमेरिका और इस्राईल द्वारा ट्रेनिंग हासिल कर रहे वहाबी नामक गुट, मुसलमानों ख़ास कर शियों का नरसंहार कर रहा है और मज़लूम और निहत्थे लोगों के ख़ून की नदियां बहा रहा है जबकि मानवाधिकार का नारा लगाने वाले अंतर-राष्ट्रीय संगठनों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है और वह चुपचाप तमाशाई बने हुए हैं और विश्व साम्राज्यवाद के सामने उनकी बोलती बंद है जबकि वह इन ज़ालिमों का खुलेआम समर्थन कर रहे हैं! मौजूदा समय में अंजाम पाने वाली आतंकी कार्यवाहियों के मद्देनजर हम इस लेख में कोशिश करेंगे कि इन हिंसक गतिविधियों को वजूद में लाने वाले इस समुदाय पर एक अनुसंधानिक निगाह डालें जो सऊदी अरब, क़तर और तुर्की के खुल्लम खुल्ला समर्थन से बेगुनाहों का नरसंहार कर रहा है और इस्लाम के अस्ली चेहरे को बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है। इस लेख में हम यह बयान करेंगे कि यह गुट जो मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के माध्यम से बनाया गया है कैसे पैदा हुआ? इसे वुजूद में लाने के लक्ष्य और उद्देश्य क्या थे? और उनके दृष्टिकोण और विचारधाराएं क्या हैं? असली बात शुरू करने से पहले कुछ बातों की ओर इशारा करना ज़रूरी है। 1. वहाबियत जो अरब प्रायद्वीप में मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब तमीमी नजदी के माध्यम से बारहवीं हिजरी शताब्दी में वुजूद में आया, एक गुमराह, पथभ्रष्ट और इस्लामी शिक्षाओं से दूर समुदाय था जिसने अब तक इस्लामी दुनिया में फ़साद, क़त्ल और आतंकवाद के अलावा कुछ नहीं किया। 2. शुद्ध (प्योर) तौहीद का दावा और हर तरह के शिर्क को नकारने वाला यह गुमराह समुदाय अंतर-राष्ट्रीय साम्राज्यवाद के साथ साठगांठ करके इस्लामी अक़ाएद में फेरबदल और इस्लामी अवशेष व निशानियों को मिटा कर इस्लाम का असली चेहरा बिगाड़ना चाहता है। 3. अमरीका और ब्रिटेन ने मुसलमानों के अंदर इस समुदाय को वुजूद में लाकर मुसलमानों में फूट डालने और उन्हें टुकड़ों टुकड़ों में बाटने के लिए अपना हथियार बनाया और मुसलमानों की एकता और गठबंधन को गहरा नुक़सान पहुंचाया। 4. इस समुदाय ने इस्लाम के सेंटर पर अपना क़ब्जा जमा कर एक तरफ़ तो प्योर व शुद्ध तौहीद का दावा किया और दूसरी तरफ काफ़िरों व मुशरिकों और इस्लाम दुश्मन ताक़तों के साथ दोस्ताना संबंध स्थापित कर इस्लामी पूंजी को उन तक स्थांतरित कर दिया। 5. वहाबियत ने वजूद में आते ही शियों के साथ दुश्मनी का ऐलान कर दिया था बल्कि यह समुदाय वास्तव में शियों ही के खिलाफ़ बनाया गया था लेकिन चौदहवीं शताब्दी में इमाम खुमैनी (रह) की लीडरशिप में ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब की सफलता के बाद शियों के प्रति इस समुदाय की हिंसक गतिविधियों में कई गुना बढ़ोत्तरी आ गई और शियों के खिलाफ़ प्रोपगंडों और झूठे प्रचारों ने भी ज़ोर पकड़ लिया यहां तक कि बिल्कुल सही रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब में जो वहाबियत केंद्र है उसमें प्रतिदिन सैकड़ों आर्टिकिल, किताबें और मैगज़ीनें शियों के खिलाफ़ छपती हैं, बड़े पैमाने पर कॉन्फ़्रेंसों का आयोजन होता है जिसमें विभिन्न प्रकार के झूठे आरोपों से शियों को काफ़िर ठहराया जाता है और कई ऐसे केंद्र और एजेंसियां बनाई गई हैं जिनका उद्देश्य केवल शियों के खिलाफ़ योजना बनाना और षड़यंत्र रचना है। 1. मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब कौन था? अरब प्रायद्वीप (सऊदी अरब) में बारहवीं शताब्दी में वहाबी नामक एक समुदाय सामने आया, जिसका संस्थापक शेख मोहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब बिन सुलैमान था जो 1115 हिजरी क़मरी में उयैना शहर में पैदा हुआ। कहा जाता है कि वह बचपन से ही पढ़ाई का शौक़ीन था। उसने हंबली फ़िक़्ह को अपने बाप के पास पढ़ा जो हंबली उलमा में गिना जाता था और शहर का काज़ी था। उसने इल्म हासिल करने के लिये कई शहरों का सफ़र किया और इन्हीं शहरों के सफ़र के दौरान मोहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब ने लोगों के कुछ अक़ीदों और विचारधाराओं को नकारना शुरू कर दिया और काबे के तवाफ़ के दौरान मुसलमानों की इबादतों, क़ब्रों की ज़ियारत, अल्लाह के वलियों से लौ लगाने और शिफ़ाअत (सिफ़ारिश) आदि जैसे मुद्दों पर टिप्पणी शुरू कर दी जो खुद उसके बाप अब्दुल वह्हाब और मक्का व मदीना के दूसरे सुन्नी उलमा के ग़ुस्से का कारण बनी। उसने सबसे से पहला कदम यह उठाया कि मुसलमानों ख़ास कर शियों पर कुफ़्र के फ़तवे लगाना शुरू कर दिये और ऐलान किया कि पैगम्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम की मुबारक क़ब्र की ज़ियारत और रसूले इस्लाम सहित तमाम नबियों और अल्लाह के वलियों से लौ लगाना और उनको अपने और अल्लाह के बीच माध्यम बनाना शिर्क है। उसके बाप ने उससे कहा कि इस तरह की भटकी व गुमराह बातें न करे, उसका बाप और भाई, मोहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के विचारों के मुक़ाबले के लिए उठ खड़े हुए उसके भाई ने दो किताबें उसकी विचारधाराओं की रद्द में लिखीं एक “الصواعق الإلهية فى الرّد على الوهابية” और दूसरी “فَصل الخطاب فى الرّد على محمدبن عبدالوهاب”। मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब और उसके भाई व बाप के बीच वैचारिक मतभेद केवल किताबों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उनके व्यावहारिक जीवन और इबादत जैसे मनासिके हज, क़ब्रों की ज़ियारत, तवस्सुल और शिफ़ाअत आदि में भी सरायत कर गया और उसके साथ साथ दूसरे लोगों के बीच भी फैल गया। लोग इब्ने अब्दुल वह्हाब की बातों से सख्त नाराज़ होते थे और उलमा व पढ़े लिखे लोग ख़ासकर उसके बाप के चेलों के मां बाप अब्दुल वह्हाब के पास उसकी शिकायत लेकर आया करते थे। अब्दुल वह्हाब अपने बेटे को मना करते थे लेकिन उस पर कोई असर नहीं होता था। आखिरकार उसका बाप सन 1135 हिजरी में मर गया। बाप के मरने के बाद शेख मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब को अपनी विचारधाराएं फैलाने और उसके प्रचार का बेहतरीन मौका मिल गया, उसने अपने कुछ मुरीद तैयार कर लिए जो उसकी भटकी और गुमराह बातों का प्रचार करते जबकि कुछ लोग उसके विरोध में प्रदर्शन भी करते और उसके क़त्ल की योजना भी बनाते थे, यहां तक कि सन 1145 हिजरी में उसने औपचारिक रूप से ख़ुल्लम खुल्ला अपने विचारों का ऐलान कर दिया और एक नये समुदाय “वहाबियत” की नींव डाल दी। गौरतलब है कि नज्द और हेजाज़ के उन क्षेत्रों का भी मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब ने दौरा किया जिन में नूबूव्वत का झूठा दावा करने वाले कई लोग गुजरे थे। कहा जाता है कि मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब उन झूठे नबियों की दास्तानों का अध्ययन करने का बड़ा शौकीन था। मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब हुरैमला शहर के लोगों के विरोध के कारण उयैना कूच कर गया। इस शहर के हाकिम उसमान बिन हम्द ने उसे अपने साथ हुकूमत में योगदान के लिए उभारा उसने उस्मान बिन हम्द की दावत स्वीकार कर के हुकूमत में क़दम जमा लिये और हुकूमत में आने के बाद पहला क़दम यह उठाया कि ख़लीफा-ए-सानी के भाई ज़ैद बिन ख़त्ताब का मज़ार ध्वस्त किया। एहसा और क़तीफ़ के हाकिम सुलैमान बिन मुहम्मद बिन अज़ीज़ को खबर मिली उन्होंने उयैना शहर के शासक को ख़त लिखकर मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के क़त्ल का आदेश दिया। लेकिन उस्मान उसकी हत्या नहीं कर सकता था क्योंकि उसने खुद उसको हुकूमत में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया था इसलिए उसने इब्ने अब्दुल वह्हाब को शहर से निकाल दिया। आखिरकार मोहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब सन 1160 हिजरी में दरईया शहर में स्थानांतरित हुआ जहां मुसैलेमा-ए-कज़्ज़ाब रहता था वहां उसने मुहम्मद बिन सऊद के साथ राजनीतिक बातचीत की और आपस में साठगांठ की। इन दो लोगों की एकता इस बात का कारण बना कि मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के भटकी हुई विचारधाराएं इस्लामी देशों में फैल जायें और एक नया समुदाय “वहाबियत” वुजूद में आ गया। मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब ने 1143 हिजरी में अपनी पूरी कोशिश के साथ अपने समुदाय का प्रचार किया और लोगों को प्योर तौहीद (शुद्ध एकेश्वरवाद) के नाम पर अपनी भटकी विचारधाराओं की ओर दावत देना शुरू किया और उसने ऐलान किया कि वह असली इस्लाम की शिक्षा देना चाहता है। जारी.................(आगे की बातें अगले हिस्से में पढ़ें)


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