Delicious facebook RSS दोस्तों को भेजें। प्रिंट सेव करें। XML TEXT PDF
Code : 56604
Date of publication : 30/7/2014 9:2
Hit : 890

हालिया कुछ वर्षों में

आयतुल्लाह ख़ामेनई की ओर से अरब प्रमुखों को दी जाने वाली चेतावनियां।

अमरीकियों ने (हुस्नी मुबारक) को उसकी नौकरी के बदले में इनाम तक नहीं दिया, आज भी उसको इनाम नहीं दे रहे हैं, आज न सही जब भी वह मिस्र से भागेगा और बाहर निकलेगा उसको इनाम नहीं देंगे। वह इत्मीनान रखे कि पहला दरवाज़ा जो उसके लिए बंद होगा अमेरिका का दरवाज़ा होगा वह शरण नहीं देंगा जैसा कि बिन अली को शरण नहीं दी, जैसे कि मोहम्मद रेज़ा को शरण नहीं दी। ऐसे ही हैं यह लोग कि जिनका दिल अमेरिका की दोस्ती और आज्ञाकारिता के लिए तड़पता है इन उदाहरणों को देख लें, यह शैतान की तरह है।


जो कुछ यहां बयान किया जा रहा है वह अरब प्रमुखों और हुकूमतों को पिछले कुछ वर्षों में वली-ए-अम्रे मुसलेमीन हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई की ओर से दी जानी वाली चेतावनियाँ हैं जिनमें इलाक़े के अरब प्रमुखों की दुर्दशा पर रौशनी डाली गई है।
सद्दाम के अंजाम से सीख लें।
अंतर-राष्ट्रीय राजनीति का दीन और तक़वा से कोई सम्बंध नहीं है और तक़वे के न होने और दीन से दूरी की वजह से ही विश्व साम्राज्यवादी ताक़तें यहां तक कि अपने दोस्तों की भी वफ़ादार नहीं हैं आपने देखा कि सद्दाम मलऊन का क्या अंजाम हुआ? जब तक उसकी जरूरत थी तो उस का समर्थन करते रहे, उन्हीं अमरीकियों ने हम पर थोपी गई जंग के दौरान सद्दाम हुसैन की भरपूर मदद और समर्थन किया, सेटेलाईट नक़शों और जासूसी सूचनाओं से लेकर फ़ौजी मदद तक और मनोवैज्ञानिक सहायता से लेकर अपने समर्थकों को उसकी वित्तीय मदद करने के लिए मजबूर करने तक, हर संभव तरीके से जब तक उसकी ज़रूरत थी और उन्हें उम्मीद थी कि ईरानी गौरव को मिटाने और सकारात्मक चेहरे को ख़राब करने में कामयाब हो जाएगें, उसकी मदद करते रहे, लेकिन जब निराश हो गए और सद्दाम के एक्सपायर होने की तारीख़ आ गई तो उसका वह अंजाम किया कि जो आपने ख़ुद देखा है। उन्होंने ने अपने हितों के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश कर लिए, यह उन शासकों के लिए एक पाठ है जो बेदीन हैं, तक़वा व सदाचार के दुश्मन हैं और बड़ी ताक़तों से उम्मीद रखतें है, इससे उन्हें सीख लेनी चाहिए।
रसूलुल्लाह स.अ. को क्या जवाब दोगे?
यह मुसीबत (दिसंबर 2008 में ग़ज़्ज़ा के मजलूम लोगों का इस्राइल के हाथों नरसंहार) हर इंसान बल्कि दुनिया के हर अंतरात्मा की आवाज़ सुनने वाले और शरीफ़ इंसान के लिए बहुत सख़्त और झिंझोड़ने वाली है, लेकिन इस से बड़ी मुसीबत उन अरब देशों की चिंताजनक चुप्पी है जो मुसलमान होने का दावा करते हैं। इससे बड़ी मुसीबत और क्या होगी कि वह मुसलमान हुकूमतें जिन्हें अतिग्रहणकारी, काफ़िर ज़ायोनी हुकूमत के मुक़ाबले में ग़ज़्ज़ा के मजलूम लोगों का समर्थन करना चाहिए था, वह ऐसा स्टैंड अपनाएं कि इस्राईली अधिकारी उनके बारे में यह कहें कि वह इस भयानक अपराध में उनके साथ होने का दावा करते हैं?
यह (तथाकथित इस्लामी देशों के) प्रमुख रसूलुल्लाह स.अ को क्या जवाब देंगे? अपनी क़ौमों को क्या जवाब देंगे कि जो वास्तव में इस मुसीबत में अज़ादार व ग़म में डूबे हुये हैं? निश्चित रूप से आज मिस्र, जॉर्डन और सभी इस्लामी देशों की जनता का दिल इस नरसंहार से और वह भी इस लंबी घेराबंदी के बाद ख़ून से भरा हुआ है।
(ग़ज़्ज़ा के मज़लूम लोगों के नरसंहार के बारे में संदेश, 28 दिसंबर 2008)
ग़द्दार अरब देशों का अंजाम।
ग़द्दार व विश्वासघाती अरब देश यह जान लें कि उनका अंजाम भी अहज़ाब की जंग के यहूदियों से बेहतर नहीं होगा कि ख़ुदा वन्दे मुतआल जिनके बारे में कहता हैः
و اَنزَلَ الَّذین ظَاهَرُوهُم مِن اَهلِ الکِتَاب وَ مِن صَیَاصِیِهم ..."
क़ौमें ग़ज़्ज़ा की मुजाहेदीन और जनता की साथ हैं। हर हुकूमत जो इसके विपरीत अमल करेगी वह अपने और अपनी क़ौम की बीच दूरियों को बढ़ा रही है और उन हुकूमतों का अंजाम पता है। वह भी अगर अपनी ज़िंदगी और इज़्ज़त की फ़िक्र में हैं तो उन्हें चाहिए कि अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के इस कथन को याद करें कि जिसमें आपने कहा हैः
"المَوتُ فی حَیاتِکُم مَقهورین وَ الحَیاةُ فی مَوتِکم قاهِرین".
)हमास की क़ानूनी हुकूमत के प्रधानमंत्री इस्माईल हनीया के नाम संदेश, 16 जनवरी 2009)
पिट्ठू हुकूमतों का अंजाम।
इस्लामी दुनिया में जो भी आज ग़ज़्ज़ा के मुद्दे को क्षेत्रीय, व्यक्तिगत और आंशिक कल्पना करेगा वह उसी खरगोश की नींद में है जिस ने अभी तक क़ौमों की कमर तोड़ रखी है। ग़ज़्ज़ा का मुद्दा केवल ग़ज़्ज़ा की समस्या नहीं है, पूरे इलाक़े की समस्या है, अब वहां पर एक कमजोर स्थिति में है, हमला वहां से शुरू किया है और अगर वहाँ सफल होते हैं तो एरिये को रिहा नहीं करेंगे। क्षेत्र में मुसलमान हुकूमतें हैं और उनको जो मदद करनी चाहिए और कर सकते हैं नहीं करते है, इलाक़े में जिस क़दर इस्राईल की जड़ें मजबूत होती हैं साम्राज्यवाद का वर्चस्व ज़्यादा होगा, इन हुकूमतों की बदबख़्ती, कमज़ोरी और अपमान बढ़ता जाएगा।
क्यों नहीं समझते? और हुकूमतों और क़ौमों को अपने साथ अपमान में ढकेलते हैं। एक नीच, गैरों पर निर्भर और गैरों की पिट्ठू हुकूमत एक राष्ट्र को अपमानित, गैरों पर निर्भर और ग़ैरों की आज्ञाकारी बनाती है। इसलिए चाहिए कि क़ौमें अपने को पा लें और जागरूक हो जायें।
अरब देशों ने बहुत ख़राब इम्तेहान दिया।
सभी हुकूमतें फ़िलिस्तीन के संबंध में जवाबदेह हैं, चाहे मुसलमान या ग़ैर मुसलमान हुकूमतें हों। हर वह हुकूमत जो मानवता के पक्ष का दावा करती है वह जवाबदेह है लेकिन मुसलमानों की जिम्मेदारी ज़्यादा गंभीर है। इस्लामी हुकूमतें जिम्मेदार हैं और उन्हें इस जिम्मेदारी पर अमल करना चाहिए और जो हुकूमतें भी फ़िलिस्तीन के मामले में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभायेंगी वह उसकी चोट का मज़ा चखेंगी, क्योंकि क़ौमें जागरूक हो चुकी है और वह हुकूमतों से मांग कर रही हैं और हुकूमतें मजबूर हैं कि इस मुद्दे के आगे नमस्तक हों।
बहुत सी सरकारों ने ग़ज़्ज़ा के मुद्दे और इससे पहले दूसरे मामलों में बहुत ख़राब इम्तेहान दिया है। जब भी फ़िलिस्तीन के मुद्दे की बात हुई तो (अरब देशों ने) फ़िलिस्तीन की समस्या को अरब राष्ट्रों की समस्या होने की रट लगाई! लेकिन जब अमल का समय आया तो फ़िलिस्तीन का मुद्दा उनकी हर मानक सूची से बिल्कुल गायब हो गया। तो बजाए इसके कि वह फ़िलिस्तीन की मदद करें, फ़िलिस्तीनियों की मदद करें, अपने अरब भाईयों की मदद करें, अगर इस्लाम पर विश्वास नहीं रखते तो कम से कम अपने अरब होने की लॉज रखें, सब के सब ने मैदान ख़ाली कर दिया! उन्होंने बहुत ख़राब इम्तेहान दिया। यह भी इतिहास में दर्ज रहेगा और यहा सज़ाएँ एंव इनाम केवल आख़िरत से सम्बंधित नहीं है बल्कि दुनिया में भी ऐसा ही है जैसे अल्लाह की मदद तुम लोगों के लिए जो जेहाद कर रहे हो आख़िरत से सम्बंधित नहीं है।
अरब सरकारों को मुश्किल इम्तेहान का सामना है। अरब कौमें उनसे गंभीर होकर कार्यवाही की मांग करती हैं, इस्लामी कॉन्फ़्रेंस और अरब लीग को ग़ज़्ज़ा से घेराबंदी को पूरी तरह ख़त्म कराने और पश्चिमी तट में फ़िलिस्तीनियों के घरों में अतिक्रमण रोकने और नितेनयाहू और ऐहूद बाराक जैसे अपराधियों पर मुक़दमा चलाये जाने से कम पर राज़ी नहीं होना चाहिए।
अमेरिका का दरवाज़ा तुम्हारे लिए बंद है!
अमरीकियों ने (हुस्नी मुबारक) को उसकी नौकरी के बदले में इनाम तक नहीं दिया, आज भी उसको इनाम नहीं दे रहे हैं, आज न सही जब भी वह मिस्र से भागेगा और बाहर निकलेगा उसको इनाम नहीं देंगे। वह इत्मीनान रखे कि पहला दरवाज़ा जो उसके लिए बंद होगा अमेरिका का दरवाज़ा होगा वह शरण नहीं देंगा जैसा कि बिन अली को शरण नहीं दी, जैसे कि मोहम्मद रेज़ा को शरण नहीं दी। ऐसे ही हैं यह लोग कि जिनका दिल अमेरिका की दोस्ती और आज्ञाकारिता के लिए तड़पता है इन उदाहरणों को देख लें, यह शैतान की तरह है।
सहीफ़ा-ए-सज्जादिया में इरशाद होता है शैतान जब मुझे बहका देता है तो दूसरी तरफ देखने लगता है। मुझ पर हँसता है, मेरी ओर पीठ फेर लेता है, ध्यान नहीं देता, यह ऐसे ही हैं। अमरीकी इन कमजोर और उपेक्षित लोगों के माध्यम से अपने हितों को पूरा कर रहे हैं।
एक्सपायर हो जाने वाले तानाशाहों का अंजाम।
आज तक इन देशों और दूसरे देशों के बारे में अमरीकियों का व्यवहार देखा गया है और वह केवल तानाशाहों का समर्थन था। जितना संभव था आख़री दम तक उन्होंने हुस्नी मुबारक का बचाव किया जब देखा कि अब कुछ नहीं हो सकता तो उसे लात मार दी!
यह भी अमरीका के पिठ्ठू शासकों के लिये एक पाठ है जिससे उन्हें सीख लेनी चाहिये, वह जान लें कि जब उनके एक्सपायर होने की तारीख़ आ जाएगी और उनके लिए उनका कोई फायदा नहीं रह जाएगा तो यह फटे पुराने कपड़े की तरह उन्हें फेंक देंगे और उनकी ओर देखेंगे भी नहीं! आखिर कब उन्होंने आख़री दम तक किसी डिक्टेटर का समर्थन किया है?
सऊदी अरब का अंजाम।
हमारा मानना है कि सऊदी सरकार ने ग़लती की है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था, खुद को इलाक़े में नफ़रत का पात्र बना दिया है।
इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि अमरीकी यहां से हजारों किलोमीटर की दूरी पर हैं अगर उनके लिये क़ौमों के दिलों में नफ़रत हो तो संभव है कि उनके लिए यह बात ज्यादा महत्व न रखती हो। लेकिन सऊदी अरब इसी क्षेत्र में बसा है, अगर कौमें उससे नफ़रत करें और वह राष्ट्रों के क्रोध का शिकार हों तो उनके लिए बहुत बड़ा नुकसान है उन्होंने ग़लती की है कि ऐसा काम किया है अगर कोई भी ऐसा करेगा तो वह ग़लत करेगा।
हमने अपनी बात खुल कर कह दी है, हम दुनिया की खोखली ताकतों के गुस्से से नहीं डरते, हम न उनके रोब में कभी आये हैं और न आयेंगे। हम सही बात और हक़ पर आधारित दृष्टिकोण को खुलकर बयान करेंगे। सही पक्ष यह है कि बहरैन के लोगों का अधिकार है कि वह आवाज़ उठायें और उनका विरोध करना सही है दुनिया के किसी भी समझदार इंसान के सामने यह बात रखें, उनकी स्थिति बयान करें, उन मज़लूम लोगों पर किस तरह हुकूमत की जा रही हैं? बताएं जो काम वहां के अधिकारियों ने इस छोटे से देश से फ़ायदा उठाने में अंजाम दिया है एक्सप्लेन करें और फिर देखें कि वह बहरैनी हुकूमत की निंदा करते हैं या नहीं?
ग़लती करते हैं वह शासक जो लोगों का मुक़ाबला करते हैं, इसका कोई फ़ायदा नहीं है। उन्हें जान लेना चाहिये कि संभव है कि आप दबाव डाल कर, ज़ुल्म व अत्याचार कर के कुछ दिनों के लिए इस आग को बुझा दें लेकिन यह आग बुझेगी नहीं आप प्रतिदिन लोगों के ग़ुस्से को और अधिक और उनके क्रोध को और ज़्यादा बढ़ाएंगे और एक समय ऐसा आयेगा कि हुकूमत की बागडोर इस तरह आपके हाथों से फिसल जाएगी कि फिर किसी भी तरह उसे नहीं पकड़ पायेगें। ग़लत कर रहे हैं वह लोग जो बहरैन के बाहर से सेना भेज रहे हैं, सख्त ग़लती पर हैं वह सोचते हैं कि इस तरह की कार्यवाहियों से एक राष्ट्र के आंदोलन को मिटाया जा सकता है। कभी नहीं।


आपका कमेंट



मेरा कमेंट शो न किया जाये
Security Code :

नवीनतम लेख

इमाम हसन असकरी अ.स. की ज़िंदगी पर एक निगाह अमेरिका का युग बीत गया, पश्चिम एशिया से विदाई की तैयारी कर ले : मेजर जनरल मूसवी सऊदी अरब ने यमन के आगे घुटने टेके, हुदैदाह पर हमले रोकने की घोषणा। ईरान को दमिश्क़ से निकालने के लिए रूस को मनाने का प्रयास करेंगे : अमेरिका आईएसआईएस आतंकियों का क़ब्रिस्तान बना पूर्वी दमिश्क़ का रेगिस्तान,30 आतंकी हलाक ग़ज़्ज़ा, प्रतिरोधी दलों ने ट्रम्प की सेंचुरी डील की हवा निकाली : हिज़्बुल्लाह सऊदी ने स्वीकारी ख़ाशुक़जी को टुकड़े टुकड़े करने की बात । आईएसआईएस समर्थक अमेरिकी गठबंधन ने दैरुज़्ज़ोर पर प्रतिबंधित क्लिस्टर्स बम बरसाए । अवैध राष्ट्र में हलचल, लिबरमैन के बाद आप्रवासी मामलों की मंत्री ने दिया इस्तीफ़ा फ़्रांस और अमेरिका की ज़ुबानी जंग तेज़, ग़ुलाम नहीं हैं हम, सभ्यता से पेश आएं ट्रम्प : मैक्रोन बीवी क्या करे कि घर जन्नत की मिसाल हो ज़ायोनी युद्ध मंत्री लिबरमैन का इस्तीफ़ा, ग़ज़्ज़ा की राजनैतिक जीत : हमास अमेरिका की चीन को धमकी, हमारी मांगे नहीं मानी तो शीत युद्ध के लिए रहो तैयार देश को मुश्किलों से उभारना है तो राष्ट्रीय क्षमताओं का सही उपयोग करना होगा : आयतुल्लाह ख़ामेनई अय्याश सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान है ग़ज़्ज़ा पर वहशियाना हमलों का मास्टर माइंड : मिडिल ईस्ट आई