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Code : 55872
Date of publication : 18/7/2014 0:58
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इब्ने मुल्जिम नें हज़रत अली अ. पर नहीं, अदालत के सर पर वार किया।

उन्नीस रमज़ान वह दुखद तारीख़ है जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सर पर ज़हर भरी तलवार मारी गई। हज़रत अली (अ) के ईमान साहस, बहादुरी, सब्र, समाज सेवा और अदालत व न्याय आदि की गवाही, दोस्त ही नहीं दुश्मन भी देते थे। एक स्थान पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा था कि अल्लाह की क़सम मुझे कांटों पर लिटाया जाए या फिर ज़ंजीरों से बांध कर ज़मीन पर घसीटा जाए तो मुझे यह उससे अधिक प्रिय होगा कि अल्लाह और पैग़म्बर से क़यामत के दिन ऐसी हालत में मिलूं कि मैंने किसी पर अत्याचार कर रखा हो।



उन्नीस रमज़ान वह दुखद तारीख़ है जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सर पर ज़हर भरी तलवार मारी गई। हज़रत अली (अ) के ईमान साहस, बहादुरी, सब्र, समाज सेवा और अदालत व न्याय आदि की गवाही, दोस्त ही नहीं दुश्मन भी देते थे। एक स्थान पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा था कि अल्लाह की क़सम मुझे कांटों पर लिटाया जाए या फिर ज़ंजीरों से बांध कर ज़मीन पर घसीटा जाए तो मुझे यह उससे अधिक प्रिय होगा कि अल्लाह और पैग़म्बर से क़यामत के दिन ऐसी हालत में मिलूं कि मैंने किसी पर अत्याचार कर रखा हो।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे इंसान से जो अत्याचार के ऐसे विरोधी और न्याय को इतना पसंद करते थे कि एक ईसाई विद्वान के अनुसार अली अ. को उनकी की अदालत व न्याय दोस्ती के कारण शहीद किया गया। अब सवाल यह उठता है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम से इतनी दुश्मनी क्यों की गई?
इस सवाल के जवाब के लिए हमें हज़रत अली (अ) के समय के इतिहास और सामाजिक हालात को देखना होगा।
पैग़म्बरे इस्लाम के बाद के पच्चीस सालों में इस्लामी समाज कई वर्गों में बंट चुका था। एक गुट वह था जो बिना सोचे समझे दुनियावी दुःख सुख, समाजी ज़िम्मेदारियों और सब कुछ छोड़कर केवल नमाज़ और इबादत को ही वास्तविक इस्लाम समझता था और इस्लाम की वास्तविकता को समझे बिना, कट्टरवाद को अपनाए हुए था। आज के समय में उस गुट को अगर देखना चाहें तो सीरिया, इराक़, पाकिस्तान व अफ़ग़ानिस्तान के तालेबान गुट में "ख़वारिज" नामी उस रूढ़िवादी गुट की झलक मिलती है। दूसरा गुट वह था जो सोच समझकर धोख़ेबाज़ी व छल-कपट के साथ इस्लाम के नाम पर पब्लिक को लूट रहा था, उन पर अत्याचार कर रहा था और ख़ुद ऐश व आराम से ज़िंदगी बिता रहा था।
यह दोनों की गुट हज़रत अली के शासन काल में उनके विरोधी बन गये थे। क्योंकि हज़रत अली को इल्म था कि बेवक़ूफ़ी भरे अंधे अनुसरण को इस्लाम कहना, इस्लाम जैसे स्वभाविक दीन पर अत्याचार है और दूसरी ओर चालबाज़ी करके पब्लिक के अधिकारों का दमन करने तथा बैतुलमाल को अपने हितों के लिए लुटाने वाला गुट भी इस्लामी शिक्षाओं के विपरीत काम कर रहा है। इस तरह वह ख़वारिज तथा मुआविया जो ख़ुद को ख़लीफ़ कहलवाता था, दोनों की दुश्मनी के निशाने पर आ गये थे। ख़वारिज का गुट उनके जैसे आलिम और मोमिनों के अमीर को इस्लाम विरोधी कहने लगा था और मुआविया हज़रत अली के चरित्र से पूरी तरह परिचित होते हुए भी उनकी अदालत के उन्हें अपने हितों के लिए बहुत बड़ा ख़तरा समझता था।
इस तरह यह दोनों ही गुट उन्हें अपने रास्ते से हटाना चाहते थे
कई इतिहासकारों का कहना है कि खवारिज में से एक आदमी अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम ने मुआविया के उकसावे में आकर हज़रत अली पर ज़हर में डूबी हुई तलवार से वार किया था।
19 रमज़ान की रात हज़रत अली (अ) मस्जिद से अपने घर आये। आपकी बेटी हज़रत ज़ैनब ने रोटी, नमक और एक प्याले में दूध लाकर बाप के सामने रखा ताकि दिन भर के रोज़े के बाद कुछ खा सकें। हज़रत अली ने जब खाना देखा तो बेटी से पूछा कि मैं रोटी के साथ एक समय में दो चीज़ें कब खाता हूं। इनमें से एक उठा लो। उन्होंने नमक सामने से उठाना चाहा तो आपने उन्हें रोक दिया और दूध का प्याला ले जाने का आदेश दिया और ख़ुद नमक और रोटी से रोज़ा इफ़्तार किया।
हज़रत अली द्वारा इस तरह का खाना, खाये जाने का यह कारण नहीं था कि आप अच्छा भोजन नहीं कर सकते थे बल्कि उस समय समाज के हालात ऐसे थे कि अधिकतर लोग कठिनाई और मुश्किल में ज़िंदगी गुज़ार रहे थे और हुकूमत की बागडोर हाथ में होने के बावजूद हज़रत अली अ. का घराना अपना सब कुछ ग़रीबों में बांटकर ख़ुद बहुत कठिनाई में ज़िंदगी बिता रहा था। हज़रत अली का विश्वास था कि शासक को चाहिए कि पब्लिक के ग़रीब तबक़े के लोगों जैसी ज़िंदगी बतायें ताकि पब्लिक में नाउम्मीदी और निराशा की भावना पैदा न हो सके।
इस तरह हज़रत अली नमक रोटी से अपनी भूख मिटाकर अल्लाह की इबादत में लग गये। आपकी बेटी का कहना है कि उस रात मेरे बाबा बार-बार उठते, आंगन में जाते और आसमान की ओर देखने लगते। इसी तरह एक बेचैनी और व्याकुलता की सी हालत में रात बीतने लगी। सुबह की अज़ान से पहले हज़रत अली उठे, वज़ू किया और मस्जिद की ओर जाने के लिए दरवाज़ा खोलना चाहते थे कि घर में पली हुई मुरग़ाबियां इस तरह रास्ते में आकर खड़ी हो गयीं जैसे आपको बाहर जाने से रोकना चाहती हों। आपने प्यार उनको रास्ते से हटाया और ख़ुद मस्जिद की ओर चले गये। वहां आपने मुंह के बल लेटे हुए इब्ने मुल्जिम को भी नमाज़ के लिए जगाया। फिर आपने ख़ुद इबादत शुरू कर दी। इब्ने मुल्जिम मस्जिद के एक ख़म्भे के पीछे ज़हर में डूबी तलवार लेकर छिप गया। हज़रत अली ने जब सजदे से सिर उठाया तो उसने तलवार से सिर पर वार कर दिया। तलवार की धार दिमाग़ तक उतर गई, मस्जिद की ज़मीन ख़ून से लाल हो गई और नमाज़ियों ने अल्लाह की राह में अपनी क़ुरबानी देने के इच्छुक हज़रत अली को कहते सुनाः काबे के रब की क़सम मैं कामयाब हो गया।
और फिर दुनिया ने देखा कि अली अ. अपने बिस्तर पर लेटे हुए हैं, घर वाले और आपकी मुहब्बत अपने दिल में रखने वालों के चेहरे दुःख और आंसुओं में डूबे हुए हैं कि इब्ने मुल्जिम को रस्सियों में बांध कर लाया जाता है। आपके चेहरे पर दुःख की निशानिया दिखाई देती हैं आप अपने बेटे से कहते हैं कि इसके हाथ खुलवा दो और यह प्यासा होगा इसकी प्यास बुझा दो। फिर आपने अपने लिए लाया दूध का प्याला उसको दिला दिया। कुछ क्षणों के बाद आपने उससे पूछा क्या मैं तेरा बुरा इमाम था? आपके इस सवाल को सुनकर हत्यारे की आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। फिर आपने अपने बेटे इमाम हसन से कहा कि अगर मैं ज़िंदा रह गया तो इसके बारे में ख़ुद फ़ैसला लूंगा और अगर मर गया तो क़ेसास अर्थात बदले में इस पर तलवार का केवल एक ही वार करना क्योंकि इसने मुझपर एक ही वार किया था।


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