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Date of publication : 29/7/2016 12:53
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इमाम जाफ़र सादिक़ अ. आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में

इमाम सादिक़ अ. एक मुजाहिद (परिश्रमी) इन्सान थे, एक आलिम थे, और एक बहुत बड़े सिस्टम व नेटवर्क के लीडर थे। उनके आलिम होने के बारे में सब जानते हैं। इमाम सादिक़ अ. ने एजूकेशन का जो सिलसिला शुरू किया था वह सारे इमामों के ज़माने से बेहतर और ला जवाब था।

विलायत पोर्टलः इमाम सादिक़ अ. एक मुजाहिद व परिश्रमी इन्सान थे, अपने ज़माने के सबसे बड़े आलिम थे और एक बहुत बड़े सिस्टम व नेटवर्क के लीडर थे। उनके आलिम होने के बारे में सब जानते हैं। इमाम सादिक़ अ. ने एजूकेशन का जो सिलसिला शुरू किया था वह सारे इमामों के ज़माने से बेहतर और ला जवाब था।
चाहे वह उनसे पहले के इमामों का ज़माना हो या उनके बाद के इमामों का समय। इस्लाम की सही जानकारी और क़ुरआने पाक की वास्तविक तफ़सीर जिसे एक शताब्दी या उससे ज़्यादा तक भुला दिया गया था या उसमें फेर बदल कर दिया गया था उसे इमाम सादिक़ अ. ने ज़िन्दा किया और सही तरीक़े से बयान किया। लेकिन इमाम के मुजाहिद होने के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं इमाम एक बहुत बड़े जेहाद में व्यस्त थे जिसका क्षेत्र बहुत बड़ा था। इमाम का यह जेहाद हुकूमत हासिल करने और एक इस्लामी और अलवी हुकूमत की नींव डालने के लिये था यानी इमाम इस चीज़ की तैयारी कर रहे थे कि बनी उमय्या की हुकूमत को गिरा कर उसकी जगह एक अलवी हुकूमत बनाएं जो कि सही और सच्ची हुकूमत हो।
इमाम के बारे में तीसरी महत्वपूर्ण बात जो शायद ही किसी ने सुनी हो वह यह है कि इमाम का पूरी दुनिया में एक नेटवर्क था ख़ुरासान से उत्तरी अफ़्रीका तक इमाम के चाहने वालों, उनके मानने वालों, मोमिनों और अलवी हुकूमत के समर्थकों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क था अर्थात जब इमाम अपने चाहने वालों तक कोई मैसेज पहुँचाना चाहते थे तो इस्लामी दुनिया में रहने वाले उनके प्रतिनिधि सब तक वह संदेश पहुँचा देते थे या वह हर जगह से इमाम के लिये पैसा, ख़ुम्स, ज़कात जमा करके इमाम की सेवा में भेजते थे ताकि वह उनके द्वारा अपने जेहाद को जारी रखें। इमाम ने सभी शहरों में अपने नुमाइंदे रखे थे जो इमाम से जुड़े हुए थे ताकि लोग अपनी दीनी और राजनीतिक समस्याओं में उनसे सलाह लें।
राजनीतिक ज़िम्मेदारी भी दीनी और शरई ज़िम्मेदारी की तरह वाजिब है। इमाम ने इस तरह का एक मज़बूत नेटवर्क बनाया हुआ था वह इस नेटवर्क द्वारा और लोगों की मदद से बनी उमय्या के विरूद्ध जेहाद कर रहे थे। जब बनी उमय्या पर उनकी कामयाबी निश्चित हो गई तो बनी अब्बास ने अवसर से फ़ायदा उठाया और वह बीच में कूद पड़े फिर इमाम सादिक़ अ. का जेहाद बनी अब्बास के विरूद्ध भी शुरू हो गया।
इमाम सादिक़ (अ.) की प्लानिंग
इमाम सज्जाद अ. और इमाम बाक़िर अ. का ख़ामोशी से प्रचार और उनके कारनामों की वजह से हालात काफ़ी हद तक बदल जाते हैं और जब इमाम बाक़िर अ. की शहादत होती है तो उस समय अहलेबैत अ. के लिये बड़ा अच्छा समय होता है और हालात उनके लिये काफ़ी बेहतर होते हैं। इमाम सादिक़ अ. का यह प्लान था कि ख़ुरासान, रै, इस्फ़हान, इराक़, हेजाज़, मिस्र, मराकिश और दूसरे शहरों से लोग मदीने आएं और सीरिया (जो उस समय बनी उमय्या का गढ़ था) पर चढ़ाई करें, सीरिया की हुकूमत को गिरा कर मदीने आएं और वहाँ इस्लामी हुकूमत और पैग़म्बरे इस्लाम की हुकूमत लागू करें। इसी लिए हम रिवायतों में देखते हैं कि इमाम मोहम्मद बाक़िर अ. की ज़िन्दगी के दिनों में जब उनसे पूछा जाता है कि क़ाएमे आले मोहम्मद अ. कौन है? तो इमाम एक इशारा करते हैं, इमाम जाफ़र सादिक़ अ. की तरफ़ और कहते हैं, हम देख रहे हैं कि यह क़ाएमे आले मोहम्मद अ. हैं। अलबत्ता याद रहे कि क़ाएमे आले मोहम्मद अ. केवल हमारे ज़माने के इमाम नहीं हैं बल्कि जो इमाम भी ज़ालिम हुकूमत के विरूद्ध खड़ा हो वह क़ाएमे आले मोहम्मद अ. है। इमामे ज़माना आख़िरी क़ाएमे आले मोहम्मद अ. होंगे जिनका आंदोलन आख़िरी आंदोलन होगा। जिन रिवायतों में कहा गया है कि हमारा क़ाएम ऐसा करेगा, वैसा करेगा और यह काम करेगा उनसे मुराद इमामे ज़माना अ. नहीं थे बल्कि मुराद यह थी कि आले मोहम्मद अ. में जो भी उठ खड़ा होगा वह ऐसा करेगा और वह क़ाएमे आले मोहम्मद अ. होगा।
जो आंदोलन ख़ामोशी से और अण्डर ग्राउंड अंजाम दिया जाता है अगर उसमें सारे सिद्धांतों पर अमल किया जाए तो उसे अण्डर ग्राउंड ही रहना चाहिये। इस इमाम का आंदोलन उन दिनों भी अण्डर ग्राउंड था और उसके बाद भी छिपा रहा क्योंकि जो उसे चला रहे थे उन्होंने किसी अजनबी को उसमें शामिल नहीं होने दिया, हाँ जब यह आंदोलन कामयाब हो जाता और हुकूमत उनके हाथ में आ जाती तो उस समय कोई चीज़ छुपी नहीं रहती बल्कि समय के साथ साथ सब कुछ सामने आता रहता। इसी लिये इतिहास में बनी अब्बास के आंदोलन की छोटी छोटी चीज़ें, ख़ुफ़िया मुलाक़ातें, सम्बंध व सम्पर्क, राज़ और रहस्य की बातें भी नज़र आती हैं। अगर अलवी आंदोलन भी पूरी तरह से कामयाब हो जाता और हुकूमतें शिया इमामों या उनके ख़ास आदमियों के हाथों में होती तो इस आंदोलन के सारे राज़ और छोटी छोटी बातें सामने आई होतीं और सबको उनके बारे में मालूम होता।
अगर इमाम की ज़िन्दगी को सही तौर पर समझना चाहते हैं तो इसका तरीक़ा केवल यह है कि उनकी ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण कामों को जानें इस तरह हमें इमाम की ज़िन्दगी के बेसिक सिद्धांत समझ में आ जाएंगे।
इमाम की ज़िन्दगी में हमें जो महत्वपूर्ण काम दिखाई देते हैं वह इस तरह से हैः
1.    इमामत की सही तसवीर पेश करना और उसे सारे लोगों तक पहुँचाना।
2.    शिया फ़िक़्ह, दीनी मसाएल और क़ुरआने मजीद की सही तफ़सीर बयान करना।
3. अण्डर ग्राउंड एक राजनीतिक और आइडियालॉजिक नेटवर्क बनाना।
इमामत का सही रूप
दूसरे इमामों की तरह इमामे सादिक़ अ. का असली काम इमामत की सही तसवीर पेश करना और लोगों के बीच उसका प्रचार करना था। इस इतिहासिक सच्चाई को साबित करने के लिये हमारे पास इमामत के बारे में इमाम सादिक़ अ. की वह बहुत सी हदीसें हैं जो आपसे बयान हुईं हैं। इमामत की सही तसवीर पेश करने और उसके प्रचार के समय इमाम ने महसूस किया कि जैसे वह एक जंग (जेहाद) के मैदान में हैं जिसमें उन्हें खुल कर उस समय के शासकों का विरोध करना है और इमामत का बचाव करते हुए ख़ुद को सच्चे इमाम की हैसियत से इस्लामी समाज के सामने पेश करना है यह उसी समय हो सकता था कि जब इसके लिये मैदान साफ़ हो और उससे पहले तमाम ज़रूरी काम अन्जाम दिये गए हों जैसे लोग काफ़ी हद तक राजनीतिक और समाजी समझ रखते हों, लोग आईडियालॉजिक तौर पर तैयार हों, हर जगह इन्क़ेलाब और तबदीली के लिये तैयार हों, लोग इस बात को मानते हों कि हक़ और अदालत की हुकूमत होनी चाहिये और इमाम ने भी आख़िरी मुक़ाबले का पक्का इरादा कर लिया हो। अगर यह सब न हुआ तो किसी एक इंसान को लोगों के रहबर और इमाम की हैसियत से पहचनवाने का फ़ायदा नहीं होगा।
यहाँ एक और बात की तरफ़ ध्यान देने की ज़रूरत है वह यह कि इमाम केवल ख़ुद को सच्चे इमाम की हैसियत से नहीं पहचनवाना चाहते बल्कि अपने से पहले इमामों की इमामत को भी साबित करना चाहते हैं और उसके द्वारा यह बताना चाहते हैं कि हम तमाम इमाम, रसूले ख़ुदा स. से जुड़े हुए हैं इससे यह भी साबित हो जाएगा कि शियों की नज़र में केवल अहलेबैत अ. ही सच्चे इमाम हैं और उनके अलावा जितने भी लोग ख़लीफ़ा बन कर आए हैं वह ग़ासिब और ताग़ूत हैं। अस्ल में इसके द्वारा यह साबित करना चाहते हैं कि उनकी इमामत कोई नई चीज़ नहीं है बल्कि यह सिलसिला पहले से चला आ रहा है जो अब उन तक पहुँचा है और यह सिलसिला रसूले इस्लाम से जा कर मिलता है।
अम्र इब्ने अबी मिक़दम की रिवायत है: 9 ज़िलहिज्जा का दिन है। लोगों की एक भीड़ हज के आमाल अंजाम देने के लिये अरफ़ात में जमा है। ख़ुरासान से मेडिटेरेनियन तक मुसलमानों के सारे शहरों के लोग इकट्ठा हुए हैं ऐसी जगह पर अगर एक सही बात बयान की जाए तो वह पूरी दुनिया में आसानी से फैल सकती है। इमाम यहाँ उपस्थित हो कर मुसलमानों से कुछ कहना चाहते हैं, रावी कहता है इमाम एक जगह खड़े हुए और ऊँची आवाज़ में तीन बार एक बात कही। फिर दूसरी तरफ़ मुड़े और फिर तीन बार वही बात कही फिर तीसरी तरफ़ मुड़े और वही मैसेज तीन बार बयान किया और चौथी तरफ़ मुड़ कर भी तीन बार वही बात कही। इस तरह इमाम ने बारह बार अपनी बात कही। इमाम का संदेश थाः
أَیُّهَا النَّاسُ إِنَّ رَسُولَ اللهِ (ص) کَانَ الْإِمَامَ- ثُمَّ کَانَ عَلِیُّ بْنُ أَبِی طَالِبٍ (ع) ثُمَّ الْحَسَنُ(ع) ثُمَّ الْحُسَیْنُ(ع)- ثُمَّ عَلِیُّ بْنُ الْحُسَیْنِ(ع) ثُمَّ مُحَمَّدُ بْنُ عَلِیٍّ(ع) ثُمَّ . . .
ऐ लोगों रसूलुल्लाह इस इमामत के इमाम थे, उनके बाद अली इब्ने अबी तालिब अ., उनके बाद हसन अ., उसके बाद हुसैन अ., उसके बाद अली इब्ने हुसैन अ., उसके बाद मोहम्मद इब्ने अली और फिर.....
 एक दूसरी हदीस में अबी सबाह कनानी इमाम सादिक़ से रिवायत बयान करते हैं जिसमें आपने ख़ुद को और दूसरे इमामों को इस तरह पहचनवाया हैः हम वह हैं कि जिनकी इताअत (आज्ञापालन) को अल्लाह ने तमाम लोगों पर वाजिब किया है। इन्फ़ाल और सफ़वुल माल का अधिकार हमें दिया गया है। सफ़वुल माल उस ख़ास माल को कहा जाता है जिस पर ज़ालिम बादशाहों ने क़ब्ज़ा जमा रखा था और उसे मुस्तहेक़ (हक़दार) लोगों को नहीं दिया करते थे जब मुसलमान मुजाहिद दुश्मनों पर हमला करके उनसे यह माल ले लेते हैं तो माल किसी को नहीं दिया जाता बल्कि उसका अधिकार मुसलमानों के हाकिम को होता है और वह इसे मुसलमानों के लिये विभिन्न कामों में लगाता है। इस हदीस में इमाम ख़ुद को सफ़वुल माल और इन्फ़ाल (वह ज़मीन और जायदाद जिस पर किसी का क़ब्ज़ा नहीं होता और किसी की प्रॉपर्टी नहीं होती) का मालिक बताया है और इसके द्वारा बताना चाहा है कि इस समय सच्चे इस्लामी हाकिम वही हैं इसलिये यह तमाम चीज़ें उन के अधिकार में होना चाहिये ताकि वह इसका सही इस्तेमाल करें।
एक हदीस में इमाम सादिक़ अ. अपने से पहले के इमामों का नाम लेकर उनकी इमामत की गवाही देते हैं और कहते हैं कि उनकी इताअत वाजिब है लेकिन जब अपने नाम पर पहुँचते हैं तो ख़ामोश हो जाते हैं लेकिन लोग अच्छी तरह जानते हैं कि इमाम मोहम्मद बाक़िर अ. के बाद इल्म और इमामत की मीरास आपके हाथों में है इस तरह इमाम अपने हक़ को भी साबित करते हैं और यह भी बयान करते हैं कि उनका सम्बंध अमीरुल मोमिनीन अली अ. से है। उसूले काफ़ी के बाबे हुज्जत या बिहारुल अनवार, जिल्द 47 में इस तरह की बहुत सी हदीसें हैं जिनमें इमाम ने खुल कर या इशारों में अपनी इमामत की बात की है।
इन हदीसों के अलावा उनकी इमामत के लिये हमारे पास जो सबसे महत्वपूर्ण सुबूत है वह इस्लामी दुनिया में इमाम का बनाया हुआ मज़बूत नेटवर्क, अगर हमारे पास एक भी रिवायत न होती तब भी इस बात को साबित किया जा सकता था। इतिहास पढ़ने वाला इन्सान जब बनी उमय्या के आख़िरी दिनों की हिस्टरी पढ़ता है तो उसके मन में यह सवाल आता है कि क्या शियों के इमामों के पास ऐसे लोग नहीं थे जो अलग अलग शहरों में जा कर उनकी इमामत का प्रचार करते और लोगों से उनके लिये बैअत (बात मानने का वचन) लेते और उन्हीं इमामों की इताअत और सपोर्ट करने को कहते? जब वह इतिहास की किताबों में थोड़ी बहुत खोज करेगा तो वह इस नतीजे पर पहुचेगा कि इमामे सादिक़ ने इस्लामी शहरों में एक बड़ा नेटवर्क बना रखा था जिसके द्वारा लोग उनसे जुड़े हुए थे उन्हें ख़ुम्स व ज़कात आदि भेजते और अपने दीनी व राजनीतिक मसलों का जवाब पूछते थे। इसके अलावा ख़ुरासान, सीसतान, कूफ़ा, बसरा, मिस्र और दूसरी जगहों के हज़ारों उल्मा और मोहद्दिस इमाम के शागिर्द थे और उनसे विभान्न प्रकार के ज्ञान सीखा करते थे। इसे कोई संयोग या हादसा नहीं कहा जा सकता बल्कि यह एक बहुत बड़े सिस्टम और मज़बूत नेटवर्क की तरफ़ इशारा करता है जिसके द्वारा इमाम ने इतने महत्वपूर्ण काम अंजाम दिये।
अमवी बादशाहों के ज़माने में हर मिम्बर और हर मस्जिद से इमामे अली अ. और उनकी औलाद के विरूद्ध प्रोपगन्डे किये जाते थे और लोगों को उनसे दूर करने की कोशिश की जाती थी क्या यह सम्भव था कि ऐसे माहौल में इमाम सादिक़ अ. एक मज़बूत नेटवर्क के बिना इतनी बड़ी इस्लामी हुकूमत में लोगों के दिलों और मन में जगह बनाते और लोग उनकी तरफ़ खिंचे चले आते और अली अ. व आले अली अ. इतने ज़्यादा महबूब व प्रिय हो जाते कि लोग केवल उनकी ज़ियारत करने, उनकी एक झलक पाने और उनके साथ अपनी मोहब्बत व दोस्ती के इज़हार के लिये दूर दराज़ का सफ़र करके मदीने और हेजाज़ आते, वहां आकर उनसे इल्मे दीन सीखते और फिर अपने इलाक़ों में जा कर ज़ुल्म व ज़ालिम के खिलाफ़ बग़ावत व विद्रोह करते?
दीनी अहकाम और शिया फ़ुक़्हा की तबलीग़ (प्रचार)
यह भी इमाम की ज़िन्दगी का महत्वपूर्ण काम था इमाम सादिक़ अ. को दूसरे इमामों से ज़्यादा इसका अवसर मिला और आपने इसे इस तरह फैलाया कि शिया मज़हब को आपके नाम से जाना जाने लगा। जो लोग इमाम के राजनीतिक कारनामों का इन्कार करते हैं वह भी इस बात को मानते हैं कि इस समय फ़ुक़्हा की सबसे बड़ी पाठशाला इमाम सादिक़ अ. की पाठशाला थी।
इस बात का जानना भी ज़रूरी है कि इस्लाम में हुकूमत की कल्पना दूसरे हर सिस्टम से अलग है इस्लाम में हुकूमत का मतलब केवल राजनीतिक नहीं है बल्कि इस्लामी हुकूमत का शासक राजनीतिक हाकिम भी होता है और मज़हब का मार्गदर्शक भी होता है। इस्लामी हाकिम के लिये ख़लीफ़ा का शब्द इस्तेमाल किया जाता है जिसका मतलब यह है कि वह एक इस्लामी हाकिम के साथ साथ रसूलुल्लाह स. का उत्तराधिकारी भी है। पैग़म्बरे अकरम ने दीन की तालीम भी दी है, अख़्लाक़ भी सिखाया है और साथ ही वह इस्लामी समाज के हाकिम भी हैं इसका मतलब यह हुआ कि जो उनका ख़लीफ़ा होगा वह राजनीतिक शासक भी होगा और लोगों को दीन व मज़हब की शिक्षा भी देगा।
इससे पता चलता है कि मशहूर फ़ुक़्हा की फ़िक़्ह और इमाम जाफ़र सादिक़ अ. की फ़िक़्ह में कोई मामूली अंतर नहीं था बल्कि बेसिक अंतर था, इमाम इसके द्वारा दो चीज़ों की तरफ़ ध्यान दिलाना चाहते थे एक तो यह कि मौजूदा हुकूमत, दीन के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानती और लोगों के बौद्धिक समस्याओं को हल नहीं कर सकती दूसरे यह बताना चाहते थे कि इस्लामी फ़िक़्ह में बड़ा फेर बदल और बदलाव किया गया है, फ़ुक़्हा अपने हितों को देखतो हुए दीनी अहकाम को सही तौर पर बयान नहीं करते बल्कि उसी तरह से कहते हैं जिस तरह हुकूमत चाहती है। इमाम सादिक़ अ. ने इस्लामी शिक्षाओं, फ़िक़्ही मसअलों और तफ़सीरे क़ुरआन का दर्स देकर अपने अमल से उनका मुक़ाबला किया। वह फ़िक़्ही मज़हब जो हुकूमत से जुड़े हुए थे उनकी काट की और यह भी साफ़ किया कि इस हुकूमत की कोई मज़हबी व दीनी बुनियाद नहीं है।
शिया अक़ीदों और विश्वासों के आधार पर एक अण्डर ग्राउंड या लॉजिक व राजनीतिक नेटवर्क बनाना
बनी उमय्या की हुकूमत के आख़िरी दिनों में इमाम सादिक़ अ. ने एक मज़बूत नेटवर्क बनाया जिसका काम इमाम अली अ. और उनकी संतानों की इमामत को लोगों के लिये बयान करना था इस नेटवर्क ने सारे इस्लामी शहरों ख़ास कर इराक़, ख़ुरासान और उसके क़रीबी शहरों में इमामत के मसले का प्रचार करने में काफ़ी अच्छा रोल निभाया। अलबत्ता इमाम ने जो अण्डर ग्राउंड राजनीतिक और आइडियालॉजिक नेटवर्क बनाया था यह इसकी एक मिसाल थी वरना हर इमाम की तरह इमाम सादिक़ अ. ने एक ऐसा सिस्टम बनाया था जो निगाहों से छुपा हुआ था और ख़ास लोग ही उसके बारे में जानते थे। अलबत्ता इसे किसी इतिहासिक सुबूत से साबित करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उस ज़माने में सोचा भी नहीं जा सकता था कि कोई इमाम या उनका चाहने वाला इस तरह के किसी सिस्टम और नेटवर्क के बारे में खुल कर कुछ कहता बल्कि उम्मीद थी अगर दुश्मन को इस तरह के किसी सिस्टम के बारे में पता चलता और वह इमाम अ. के किसी ख़ास आदमी से उसके बारे में पूछता, वह साफ़ इन्कार कर देता और कहता कि इस तरह का कोई सिस्टम है ही नहीं।
इसे समझने के लिये कुछ इतिहासिक घटनाओं में बहुत ग़ौर करने की ज़रूरत है जिनसे पता चलेगा कि कुछ काम थे जो अंडर ग्राउंड अंजाम दिये जा रहे थे लेकिन लोग उससे बेख़बर थे हर ज़माने में एक ऐसा सिस्टम और नेटवर्क रहा है जो इमाम के अण्डर काम करता रहा है।



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