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Date of publication : 12/9/2018 14:21
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मोहर्रम और सफ़र से इस्लाम ज़िंदा है

हमारी ज़िम्मेदारी है कि इस मोहर्रम और सफ़र के महीने में जो इस्लाम के ज़िंदा होने का महीना है कर्बला के शहीदों की मुसीबतों को याद करते हुए बातिल परस्तों के ज़ुल्म को बे नक़ाब कर के दीन को और मज़बूत करें क्योंकि अहलेबैत अ.स. के मसाएब के ज़िक्र से ही मज़हब बाक़ी हैl


 विलायत पोर्टल : इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने अपनी किताबों और बयान में इस्लाम को बचाने में इमाम हुसैन अ.स. की क़ुर्बानी की अहम भूमिका की ताकीद की है और साथ ही इमाम हुसैन अ.स. की याद में अज़ादारी और मजलिसों को बातिल और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ जंग में बेहद प्रभावशाली बताया हैl

आशूर के दिन सारे लोगों का सड़क पर उतर कर इमाम हुसैन अ.स. के लिए अज़ादारी करना बहुत बड़ी बरकत हैl (सहीफ़ए इमाम ख़ुमैनी र.ह., जिल्द 13, पेज 326)

हमारी ज़िम्मेदारी है कि इस मोहर्रम और सफ़र के महीने में जो इस्लाम के ज़िंदा होने का महीना है कर्बला के शहीदों की मुसीबतों को याद करते हुए बातिल परस्तों के ज़ुल्म को बे नक़ाब कर के दीन को और मज़बूत करें क्योंकि अहलेबैत अ.स. के मसाएब के ज़िक्र से ही मज़हब बाक़ी हैl

मोहर्रम और सफ़र ही है जिसने इस्लाम को बचाया है और यह इमाम हुसैन अ.स. की ही क़ुर्बानी जिसने इस्लाम को उसके असली चेहरे के साथ हम तक पहुंचाया हैl

इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने अपने इन विचारों को दलीलों से अपनी कई तक़रीरों में साबित किया है, आपकी एक तक़रीर का एक भाग कुछ इस तरह है:

आशूरा के विरोधी हक़ीक़त में उन्हीं बातिल हुक्मरानों की पैरवी करने वाले हैं जो मोहर्रम और सफ़र के महीने में डरते हैं, यह मजलिसें हैं जिससे लोगों को एकता का सबक़ मिलता है, अगर किसी मैसेज द्वारा इस्लाम की सेवा करनी हो और किसी मैसेज को पूरे देश या पूरी दुनिया में फैलाना हो तो इन्हीं ख़तीबों ज़ाकिरों और इमामे जुमा और जमाअत द्वारा एक ही समय में पूरे देश यहां तक पूरी दुनिया में फैलाया जा सकता है जिससे सारे लोग उसी इलाही और हुसैनी परचम के नीचे जमा हो कर एकता की मिसाल पेश कर सकें, लेकिन इसके लिए एक सिस्टम का होना ज़रूरी है ताकि सभी उसी सिस्टम के मुताबिक़ एक ही ओर चलेंl

अगर कोई जमाअत या सियासी पार्टी या कोई भी मज़हबी दीनी गिरोह अपने किसी मैसेज को पहुंचाने के लिए किसी सम्मेलन का आयोजन करना चाहता है तो उसे हफ्तों कभी कभी महीनों की दौड़ भाग और लाखों करोड़ों के ख़र्च के बाद भी केवल हज़ारों की तादाद ही दिखाई देगीl

लेकिन आपने देखा होगा कि इन्हीं मजलिसों और अज़ादारी द्वारा दस बीस पचास नहीं बल्कि पूरे पूरे केवल एक ऐलान सुनते ही पूरे जोश और पूरी तैयारी और हौसले और बिना किसी कष्ट के और बिना किसी पैसे के ख़र्च के केवल इमाम हुसैन अ.स. के नाम पर और आपके क़ुर्बानी के मक़सद को सुनने जमा हो जाते हैं और उनमें ऐसा ख़ुलूस होता है कि न किसी तरह की लालच होती है न कुछ मिलने का इंतेज़ारl

 इसी तरह कि जैसे किसी इमाम अ.स. ने शायद इमाम बाक़िर अ.स. ने फ़रमाया कोई इंसान मेरे लिए मेना के मैदान में नौहा पढ़े, वहां पर मेरे लिए आंसू बहाए और अज़ादारी करे इसका मतलब यह नहीं है कि इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स. को इसकी कोई ज़रूरत थी या आपका कोई निजी फ़ायदा थाl

लेकिन इमाम अ.स. की बसीरत देखिए आपने मेना का ज़िक्र किया जहां हर साल पूरी दुनिया के लोग जमा होते हैं अगर वहां अहलेबैत अ.स. की दीन के लिए पेश की गई क़ुर्बानी और उसके मक़सद को बयान किया जाए तो वह मैसेज पूरी दुनिया के लोगों तक पहुंच जाएगाl

यूरोप के लोग हमें रोने वाली क़ौम कहते हैं शायद वह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि हमारे एक आंसू का क़तरा कितना अज़ीम मक़सद रखना है, एक मजलिस कितना सवाब रखती है, वह उन चीज़ों को हज़म नहीं कर सकते हैं जिनका ज़िक्र दुआ और मुनाजात में हुआ है और उस सवाब को जो दो लाइन की दुआ में बयान हुआ है, वह लोग न ही इसे समझ सकते हैं और न ही हज़म कर सकते हैंl

इन दुआओं और अल्लाह की ओर ध्यान देने का सियासी रुख़ यह है कि क़ौम में फ़िक्र करने की रूह को जगाया जा सके ताकि किसी अहम मक़सद को समझने में ध्यान दे सकें, इमाम हुसैन अ.स. की मजलिस केवल आप पर आंसू बहाने और उसके नतीजे में सवाब हासिल कर लेने का नाम नहीं है (हालांकि इमाम अ.स. पर रोना बहुत सवाब रखता है) बल्कि वही सियासी रुख़ अहम है जिसको मासूमीन अ.स. ने दुआ और हदीसों द्वारा बयान किया है और वह यह कि हमारे समाज हमारी सोंच में इत्तेहाद और एकता दिखाई देनी चाहिए, और इस काम में जितना इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी का असर है किसी भी दूसरी चीज़ का असर नहीं हैl

और इन मजलिसों के अलावा इस क़ौम (जिसको मिटाने के लिए पूरा साम्राज्यवाद हाथ में हाथ दे चुका है और सर से सर जोड़ चुका है) के पास कोई दूसरी ताक़त और जज़्बा नहीं है जो साम्राज्यवादी शक्तियों की साज़िशों को नाकाम कर सकेl

यह इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी और दुआओं (दुआए कुमैल वग़ैरह है जिसने हमारी क़ौम को ऐसा मज़बूत बनाया कि मां अपने जवान बेटे, बूढ़ा बाप अपने बुढ़ापे के सहारे और नई नवेली बीवी अपने शौहर को दीन की हिफ़ाज़त के लिए क़ुर्बान करने को तैयार नज़र आते हैं, इसलिए अज़ादारी के मक़सद को समझना और समझाना पड़ेगा कि यह अज़ादारी है किस लिए और इस रोने की अहमियत क्या है और इमामों ने इसकी क्यों इतनी अहमियत बयान की है और अल्लाह के नज़दीक इसका क्या सवाब हैl

जब यह सब हमारे समझ में आ जाएगा तो उस समय दुनिया हमको रोने वाली नहीं बल्कि एक बेदार और ज़िंदा क़ौम कहेगीl


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